



डॉ. संतोष राजपुरोहित.
राजस्थान में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर गेहूं खरीद का उद्देश्य राज्य के वास्तविक किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराना है। इस व्यवस्था के अंतर्गत केवल राजस्थान में पंजीकृत किसानों से ही सरकारी खरीद की अनुमति है। वर्तमान रबी विपणन सत्र 2026-27 में केंद्र सरकार ने गेहूं का एमएसपी 2,585 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया है। इसके अतिरिक्त राजस्थान सरकार द्वारा 150 रुपए प्रति क्विंटल का राज्य बोनस भी दिया जा रहा है। इस प्रकार राजस्थान के किसानों को सरकारी खरीद में कुल 2,735 रुपए प्रति क्विंटल का भुगतान प्राप्त हो रहा है। यही कारण है कि यह व्यवस्था किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी है। किंतु पिछले सप्ताह हनुमानगढ़ जिले की धान मंडियों से ऐसी खबरें सामने आईं, जिनमें आरोप लगाया गया कि हरियाणा और पंजाब के कुछ किसानों अथवा व्यापारियों ने फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से राजस्थान का किसान बनकर एमएसपी एवं राज्य बोनस का लाभ उठाते हुए गेहूं बेचा। इन आरोपों के बाद प्रशासन ने जांच प्रारंभ की तथा कई स्थानों पर खरीद प्रक्रिया और दस्तावेजों के सत्यापन को तेज कर दिया।

हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर राजस्थान के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक जिलों में शामिल हैं। भाखड़ा एवं इंदिरा गांधी नहर परियोजना से सिंचित यह क्षेत्र उच्च उत्पादकता के लिए जाना जाता है। पंजाब और हरियाणा से लगी सीमा होने के कारण यहां अनाज का आवागमन भी अधिक रहता है। यदि बाहरी राज्यों के किसान या व्यापारी फर्जी गिरदावरी, भू-अभिलेख अथवा अन्य दस्तावेजों के माध्यम से राजस्थान का किसान बनकर सरकारी खरीद में भाग लेते हैं, तो इसका सीधा नुकसान राज्य के वास्तविक किसानों को होता है। इतना ही नहीं, राज्य सरकार द्वारा दिए जा रहे 150 रुपए प्रति क्विंटल बोनस का भी अनुचित लाभ बाहरी लोगों तक पहुंच सकता है, जिससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ता है।
पिछले सप्ताह प्रकाशित समाचारों के अनुसार प्रशासन को कई संदिग्ध पंजीकरणों, भूमि रिकॉर्ड और खरीद संबंधी दस्तावेजों की शिकायतें प्राप्त हुईं। इसके बाद विभिन्न खरीद केंद्रों पर रिकॉर्ड का मिलान, भूमि सत्यापन तथा किसानों के पंजीकरण की जांच शुरू की गई हैं

आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो हनुमानगढ़ जिले में इस खरीद सीजन में 56 हजार से अधिक किसानों से सरकारी खरीद दर्ज की गई है। इतनी बड़ी खरीद व्यवस्था में यदि थोड़ी मात्रा में भी फर्जी खरीद होती है तो करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान संभव है। उदाहरण के लिए यदि एक लाख क्विंटल गेहूं भी फर्जी तरीके से खरीदा जाए तो केवल एमएसपी और राज्य बोनस के आधार पर लगभग 27.35 करोड़ रुपए का सरकारी भुगतान होगा। यदि ऐसी मात्रा और अधिक हो तो वित्तीय क्षति भी कई गुना बढ़ सकती है।

इस प्रकार की अनियमितताओं के पीछे कई कारण हो सकते हैं। पहला, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा की सीमाएं आपस में जुड़ी हुई हैं, जिससे उपज का आवागमन सरल हो जाता है। दूसरा, यदि गिरदावरी, भूमि रिकॉर्ड और किसान पंजीकरण का डिजिटल सत्यापन प्रभावी ढंग से न हो तो फर्जी दस्तावेजों का उपयोग संभव हो जाता है। तीसरा, यदि खरीद केंद्रों पर निगरानी कमजोर हो या स्थानीय स्तर पर अधिकारियों एवं व्यापारियों की मिलीभगत हो तो ऐसी घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है।
इस कथित फर्जीवाड़े का सबसे अधिक प्रभाव राजस्थान के वास्तविक किसानों पर पड़ता है। खरीद केंद्रों की क्षमता सीमित होने के कारण बाहरी उपज की खरीद होने से स्थानीय किसानों को लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। कई बार उन्हें खुले बाजार में कम कीमत पर गेहूं बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इससे एमएसपी व्यवस्था की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है तथा किसानों का सरकार पर विश्वास कमजोर पड़ सकता है।

इस समस्या के समाधान के लिए राज्य सरकार को किसान पंजीकरण को पूरी तरह भूमि रिकॉर्ड, गिरदावरी, जन आधार, आधार कार्ड और बैंक खाते से डिजिटल रूप से जोड़ना चाहिए। खरीद केंद्रों पर जीपीएस आधारित सत्यापन, ऑनलाइन स्लॉट प्रणाली, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित जोखिम विश्लेषण तथा नियमित सामाजिक ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं लागू की जानी चाहिए।
एमएसपी और राज्य बोनस की व्यवस्था किसानों की आय सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए इसकी पारदर्शिता बनाए रखना सरकार और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है।
कुल मिलाकर यह प्रकरण स्पष्ट करता है कि आधुनिक तकनीक, डिजिटल सत्यापन, प्रभावी निगरानी और पारदर्शी प्रशासन के बिना एमएसपी एवं बोनस जैसी महत्वपूर्ण किसान कल्याण योजनाओं का लाभ केवल वास्तविक पात्र किसानों तक पहुंचाना कठिन होगा। अतः किसान हितों की रक्षा के लिए पारदर्शी और जवाबदेह खरीद व्यवस्था समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं





