




डॉ. संतोष राजपुरोहित
जब भी किसी देश की अर्थव्यवस्था की चर्चा होती है, तो सबसे पहले सकल घरेलू उत्पाद, विकास दर, निवेश, उद्योग और रोजगार जैसे शब्द सामने आते हैं। अक्सर यह मान लिया जाता है कि यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है, तो वहाँ के लोग भी उतने ही खुश और संतुष्ट होंगे। लेकिन वास्तविक जीवन का अनुभव इससे कुछ अलग कहानी कहता है। आज भी ऐसे अनेक लोग हैं जिनकी आय पहले से अधिक है, घर में आधुनिक सुविधाएँ हैं, मोबाइल, इंटरनेट और वाहन हैं, फिर भी उनके जीवन में तनाव, असुरक्षा और असंतोष बढ़ता जा रहा है। दूसरी ओर, ऐसे परिवार भी मिल जाते हैं जिनकी आय सीमित है, लेकिन आपसी प्रेम, सामाजिक सहयोग और संतोष के कारण वे अधिक खुश दिखाई देते हैं। यही कारण है कि आज दुनिया केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि लोगों की वास्तविक खुशहाली को भी विकास का महत्वपूर्ण पैमाना मानने लगी है। इसी सोच से हैप्पीनेस इंडेक्स की अवधारणा सामने आई।
हैप्पीनेस इंडेक्स यह जानने का प्रयास करता है कि किसी देश के नागरिक अपने जीवन से कितने संतुष्ट हैं। यह केवल यह नहीं देखता कि लोगों की आय कितनी है, बल्कि यह भी देखता है कि उन्हें अच्छी शिक्षा मिल रही है या नहीं, स्वास्थ्य सेवाएँ कैसी हैं, रोजगार सुरक्षित है या नहीं, समाज में भरोसा है या नहीं, पर्यावरण स्वच्छ है या नहीं और लोग मानसिक रूप से कितना संतुलित जीवन जी रहे हैं। अर्थात यह विकास को केवल पैसों के बजाय इंसान के जीवन की गुणवत्ता से जोड़कर देखता है।
यदि हम अपने आसपास के समाज को देखें, तो इस बात को आसानी से समझ सकते हैं। एक किसान अच्छी फसल होने पर केवल इसलिए खुश नहीं होता कि उसकी आमदनी बढ़ गई, बल्कि इसलिए भी कि उसके बच्चों की पढ़ाई चल सकेगी, परिवार का इलाज हो सकेगा और भविष्य की चिंता कुछ कम होगी। एक मजदूर के लिए खुशी का अर्थ केवल रोज़ की मजदूरी नहीं, बल्कि नियमित रोजगार, बच्चों के लिए बेहतर जीवन और सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर भी है। एक छोटे दुकानदार के लिए खुशी केवल अधिक बिक्री नहीं, बल्कि यह भरोसा भी है कि कल उसका व्यवसाय सुरक्षित रहेगा। यही वास्तविक अर्थों में आर्थिक खुशहाली है।
आज का आम नागरिक भी केवल अधिक कमाई नहीं चाहता। वह चाहता है कि उसके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, परिवार को समय पर इलाज मिले, सुरक्षित वातावरण मिले, सड़कें अच्छी हों, पीने का स्वच्छ पानी मिले, बिजली की नियमित आपूर्ति हो और भविष्य को लेकर भरोसा बना रहे। यदि ये मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी नहीं होतीं, तो केवल आय बढ़ जाने से जीवन में संतोष नहीं आ सकता। इसलिए अर्थव्यवस्था का अंतिम उद्देश्य लोगों के जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए, न कि केवल आँकड़ों में वृद्धि दिखाना।
अर्थव्यवस्था और खुशहाली का संबंध निश्चित रूप से गहरा है। जब उद्योग बढ़ते हैं, निवेश आता है और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, तब लोगों की आय बढ़ती है। इससे उनकी क्रय शक्ति मजबूत होती है और वे अपने जीवन स्तर को सुधार पाते हैं। लेकिन यदि आर्थिक विकास के साथ महँगाई लगातार बढ़ती रहे, रोजगार अस्थिर हो जाएँ, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होने लगे और सामाजिक असमानता बढ़ती जाए, तो आर्थिक वृद्धि का लाभ सीमित लोगों तक ही पहुँचता है। ऐसी स्थिति में विकास के आँकड़े भले अच्छे दिखाई दें, लेकिन आम नागरिक का जीवन संघर्षपूर्ण बना रहता है।
आज भारत जैसे विकासशील देश के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक कैसे पहुँचाया जाए। देश ने आधारभूत संरचना, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप, उद्योग, सेवा क्षेत्र और तकनीक के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। करोड़ों लोग बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े हैं, डिजिटल भुगतान सामान्य जीवन का हिस्सा बन चुका है और अनेक नई योजनाओं ने आम नागरिक तक सरकारी सहायता पहुँचाने का मार्ग आसान बनाया है। फिर भी बेरोजगारी, ग्रामीण-शहरी असमानता, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, शिक्षा की गुणवत्ता और पर्यावरण प्रदूषण जैसी समस्याएँ अभी भी चिंता का विषय हैं। यदि इन चुनौतियों का समाधान नहीं किया गया, तो केवल आर्थिक विकास दर बढ़ जाने से लोगों की वास्तविक खुशहाली सुनिश्चित नहीं हो सकेगी।
हैप्पीनेस इंडेक्स हमें यह भी सिखाता है कि समाज में विश्वास और सामाजिक संबंधों का भी आर्थिक महत्व होता है। जहाँ लोग एक-दूसरे की सहायता करते हैं, परिवार मजबूत होते हैं और समुदाय मिलकर समस्याओं का समाधान करता है, वहाँ जीवन अधिक संतुलित और सुखद होता है। इसके विपरीत यदि समाज में अविश्वास, अपराध, भ्रष्टाचार और असुरक्षा का वातावरण हो, तो आर्थिक समृद्धि भी लोगों को मानसिक शांति नहीं दे पाती।
भूटान का उदाहरण इस संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस छोटे से देश ने विकास का आधार केवल आय को नहीं, बल्कि सकल राष्ट्रीय खुशहाली को बनाया। वहाँ सरकार आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक मूल्यों, सुशासन और सामाजिक संतुलन को भी समान महत्व देती है। यह संदेश केवल भूटान के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है कि विकास का अंतिम उद्देश्य मनुष्य का सुख और संतोष होना चाहिए।
आज के समय में मानसिक स्वास्थ्य भी खुशहाली का महत्वपूर्ण आधार बन गया है। तेज़ प्रतिस्पर्धा, भागदौड़, नौकरी का दबाव और सामाजिक तुलना के कारण तनाव बढ़ रहा है। यदि अर्थव्यवस्था ऐसी हो जो लोगों को पर्याप्त रोजगार, उचित कार्य-जीवन संतुलन, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन प्रदान करे, तो नागरिक अधिक संतुष्ट और उत्पादक बनते हैं। वास्तव में खुश नागरिक ही किसी देश की सबसे बड़ी आर्थिक पूँजी होते हैं।
सरकारों के लिए भी यह आवश्यक है कि वे ऐसी नीतियाँ बनाएँ जो केवल उत्पादन और आय बढ़ाने तक सीमित न हों, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक सुरक्षा और समान अवसरों को भी प्राथमिकता दें। जब विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचता है, तभी वास्तविक अर्थों में समावेशी विकास संभव होता है।
अर्थव्यवस्था का उद्देश्य केवल धन का सृजन नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाना है। यदि किसी देश का नागरिक सुरक्षित, स्वस्थ, शिक्षित, सम्मानजनक और संतोषपूर्ण जीवन जी रहा है, तभी उस देश को वास्तव में विकसित कहा जा सकता है। हैप्पीनेस इंडेक्स बताता है कि विकास का मूल्यांकन केवल आर्थिक आँकड़ों से नहीं, बल्कि आम आदमी के चेहरे की मुस्कान, उसके मन की शांति और उसके जीवन के संतोष से भी होना चाहिए। जब आर्थिक प्रगति और मानवीय खुशहाली साथ-साथ आगे बढ़ेंगी, तभी किसी राष्ट्र का विकास पूर्ण, संतुलित और स्थायी माना जाएगा।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं









