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हनुमानगढ़ शहरी निकाय के पार्षद पद के चुनावी परिणाम सामने आने के बाद हनुमानगढ़ की स्थानीय राजनीति में जबरदस्त हलचल देखी जा रही है। एक तरफ जहां परिणामों से उत्साहित निर्दलीय गुट विजयोत्सव मना रहा है, वहीं भाजपाई खेमा पूरी तरह शांत नजर आ रहा है। दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के भीतर हार के बाद आत्ममंथन करने के बजाय नेताओं और कार्यकर्ताओं में अंतर्कलह खुलकर सामने आ गई है और सोशल मीडिया पर एक-दूसरे के खिलाफ जमकर ‘भड़ास’ निकाली जा रही है।
ताजा मामला जिला कांग्रेस कमेटी (डीसीसी) के पूर्व महामंत्री व उपभोक्ता होलसेल भंडार के पूर्व चेयरमैन मोहम्मद मुश्ताक जोईया की एक फेसबुक पोस्ट से शुरू हुआ। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री चौधरी विनोद कुमार के शीर्ष तीन सिपहसालारों में गिने जाने वाले मोहम्मद मुश्ताक ने अपनी पोस्ट में लिखा, ‘आप कितना सहमत हैं? हनुमानगढ़ में न तो कांग्रेस हारी और न लीलावाली परिवार। कुछ तो हारी साजिशें, कुछ हुई घमंडी तत्वों की हार!’
मुश्ताक जोईया के इस बयान के बाद वरिष्ठ कांग्रेसियों और कार्यकर्ताओं ने खुलकर अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दीं, जिससे पार्टी के अंदरूनी मतभेद जगजाहिर हो गए। मुश्ताक की पोस्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कांग्रेस सेवादल से जुड़े अनिल तिवाड़ी ने लिखा, ‘मैं दोस्ती के लिए बढ़ा हुआ हर हाथ चूमता हूं, पर शर्त ये है कि बंदा नमक हराम ना हो’ इसी कड़ी में जमीनी स्तर पर भीतरघात की ओर इशारा करते हुए अरशद भाटी ने लिखा, ‘वार्ड नंबर 5 में जो पुराने कांग्रेस कार्यकर्ता थे, वे वोट निर्दलीय को दिए हैं।’
इस पर मुश्ताक जोईया ने पलटवार करते हुए जवाब दिया, ‘अरशद भाटी, और जिनको कांग्रेस का सिम्बल मिला वो विधानसभा चुनाव में कहां थे ? ये भी पता करना।’
पार्टी के मौजूदा ढांचे पर पूर्व आईएएस सूबे सिंह यादव ने धरातल पर काम करने की नसीहत देते हुए लिखा, ‘कांग्रेस को धरातल पर मजबूत करने की आवश्यकता है, क्योंकि वर्तमान निर्दलीय एमएलए गणेश बंसल सहित कभी कांग्रेसी ही थे। शहर कांग्रेस को धरातल पर मजबूत करना होगा। युवा को मौका देना होगा। निःसंदेह विनोदजी भले आदमी हैं, लकिन मुकाबला ऐसे आदमी से हो जो कीचड़ में सना हुआ हो तो आपको कीचड़ में उतरना ही होगा, सफाई के लिए।’ इस टिप्पणी का जवाब देते हुए मोहम्मद मुश्ताक ने संगठन के पदाधिकारियों पर निशाना साधा और लिखा, ‘सूबे सिंह यादव, लेकिन आज संगठन में बैठे लोगों ने शायद संगठन का मतलब संगठ रहने वालों से ठन जाना या ठाना लेना समझ लिया है। खासकर शहर वालों ने, धरातल पर काम करने का खुद का तो छोड़ों, जो करना चाहते हैं, शायद उनको भी हतोत्साहित किया जाता है।’
इसके बाद सोशल मीडिया पर चर्चा का रुख सीधे तौर पर स्थानीय नेतृत्व और कार्यप्रणाली की ओर मुड़ गया। संदीप भांभू ने पार्टी के तीसरे स्थान पर खिसकने पर सवाल उठाते हुए लिखा, ‘हनुमानगढ़ में कांग्रेस नहीं हारी है, यहां सिर्फ लीलावाली हारी है। बहुत से लोग हैं जो कांग्रेस से जुड़े हुए थे, उनकी रूह में कांग्रेस में थी, पर उनको कांग्रेस छोड़ने के लिए मजबूर किया गया है। जो नेता कांग्रेस से है, जिस पंचायत से है, उसी पर ध्यान देना चाहिए। दूसरी पंचायत पर राजनीति करने का हकम नहीं होता है पर यहां तो कुछ लोगों ने दूसरी पंचायत में विरोधी के साथ मिलकर राजनीति की है इसका नतीजा आपके सामने है। इन दो हार पर बहुत गौर से मंथन करने की जरूरत है। जो छोड़ गए हैं, हो सकता है, उनकी भी कमी रही हो, पर ये सोचने पर मजबूर करता है कि पार्टी तीसरे नंबर पर आ गई, कुछ तो कमी रही होगी।’
प्रोफेसर विजय ऐरी ने भी नेतृत्व की योजना पर सवाल खड़े किए और लिखा, ‘हार तो लीलावाली की ही हुई है, उनकी प्लानिंग की हुई है, उनके चयन की हुई है, यदि आप नहीं मानते तो आप भी दूसरी श्रेणी के अंधभक्तों में ही गिने जाएंगे।’
आम कार्यकर्ताओं की उपेक्षा पर अपना दर्द बयां करते हुए कांग्रेस के रिछपाल मान ने लिखा, ‘काम के लिए आम वर्कर जाते थे, उस समय उस गरीब की बात सुने बिना ही काले पीले भगा देते थे।’
वहीं, एडवोकेट सुरेश यादव ने मजाकिया अंदाज में लिखा, ‘लगता है भाई साहब, आप आत्ममंथन में मुग्ध हो गए हैं।’ वहीं, कांग्रेस नेता विजय सिगची ने मुश्ताक जोईया के बदले रुख पर हैरानी जताते हुए लिखा, ‘बड़े भाई मुश्ताक जी जोईया, आप तो कांग्रेस पार्टी व चौधरी साहब के विश्वासपात्र थे, आपका मन कैसे बदल गया। आपको तो हर जगह हर स्थिति में मान सम्मान मिला है। आपकी नाराजगी का कारण क्या है। हार या जीत होना यह तो चुनावी प्रक्रिया है, लेकिन जनाब, आपका मन क्यों बदला।’
इस विवाद के बीच बैराम खान ने जिलाध्यक्ष का पक्ष लेते हुए लिखा, ‘जिला अध्यक्ष मनीष मक्कासर सर ने बहुत मेहनत की है, पार्टी जो मृत अवस्था में पड़ी थी, उसमें जान फूंकने की कोशिश की। एक तरफ हवेली में टिकट दिया जा रहा था, दूसरी तरफ जिलाध्यक्षजी कह रहे थे कि कांग्रेस पार्टी के कार्यालय में आना चाहिए था, और मिल बैठकर टिकट बंटनी चाहिए थी। यहां तो जिलाध्यक्ष को ही ठिकाने लगाने की साजिश हो रही थी, और इसके साथ-साथ वार्ड नंबर 5 समझ नहीं आया।’
कांग्रेस के पूर्व जिला महामंत्री कृष्ण नेहरा ने जमीनी हकीकत उजागर करते हुए लिखा, ‘यह कहकर कब तक अपना मन भरमाते रहेंगे भ्राताश्री। हार सभी की हुई है, जिसमें आप और हम, सभी शामिल हैं। लेकिन मैं दावे के साथ कहता हूं कि हमेशा की तरह ना तो इस हार पर कोई मंथन होगा और ना ही किसी को कोई फर्क पड़ेगा। फर्क पडेगा तो सिर्फ कार्यकर्ताओं पर, ना आपके द्वारा कथित साजिश कर्ताओं पर और ना ही नेताओं पर।’
इस प्रकार, निकाय चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस का यह अंतर्विरोध खुलकर सामने आ रहा है। जानकारों का मानना है कि पार्टी में वर्चस्व के लिए अंदरुनी लड़ाई चल रही है, पहले यह सब अंदरखाने थी लेकिन परिणाम आने के बाद संघर्ष खुलकर सामने आ रहा है।








