




भटनेर पोस्ट पॉलिटिकल डेस्क
राजस्थान में पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों की आहट के बीच कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति एक बार फिर खुलकर सामने आने लगी है। बीएपी (भारत आदिवासी पार्टी) से जुड़े नेताओं की कांग्रेस में वापसी और मुलाकात को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सार्वजनिक बयानबाजी, सोशल मीडिया पोस्ट और गुटीय शक्ति प्रदर्शन तक पहुंच गया है। राजनीतिक हलकों में इसे केवल एक जॉइनिंग विवाद नहीं, बल्कि प्रदेश कांग्रेस में उभरते नए शक्ति समीकरणों के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के हालिया बयानों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। डोटासरा ने बिना किसी का नाम लिए कहा कि जो लोग अपनी ष्सेल्फ ब्रांडिंगष् के लिए काम करते हैं, उन्हें वह मुबारक हो। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि महेंद्रजीत सिंह मालवीय की कांग्रेस में वापसी उनकी सिफारिश के बिना संभव नहीं थी और व्यक्ति से बड़ा संगठन होता है।
डोटासरा के बयान के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि बीएपी के कुछ नेताओं ने उनसे मिलने की जिद की थी। महेंद्रजीत सिंह मालवीय के आग्रह पर उन्होंने मुलाकात के लिए समय दिया। गहलोत के अनुसार, नेताओं ने पीसीसी अध्यक्ष से मिलने की भी बात कही थी और वहां भी जाने की योजना थी।

गहलोत ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक सामान्य मुलाकात थी, न तो किसी की औपचारिक जॉइनिंग हुई और न ही ऐसी कोई चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ता मिलने आते रहते हैं, जबकि औपचारिक जॉइनिंग नेताओं की होती है। इस बयान को डोटासरा के दावों के जवाब के रूप में देखा गया।
विवाद तब और गहरा गया जब जयपुर में मीडिया से बातचीत के दौरान डोटासरा ने कहा कि राहुल गांधी ने उनके और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के काम की सराहना की है। उन्होंने कहा कि जब उनका शीर्ष नेतृत्व उन पर भरोसा जता रहा है तो उन्हें किसी ‘ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे’ से प्रमाणपत्र लेने की जरूरत नहीं है। राजनीतिक गलियारों में इस बयान को अशोक गहलोत पर परोक्ष टिप्पणी माना गया।

इसके अगले ही दिन कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष संदीप चौधरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बिना किसी का नाम लिए लिखा, ‘ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे कुछ बन जाते हैं तो पागल हो जाते हैं।’ संदीप चौधरी पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी समर्थकों में गिने जाते हैं और कांग्रेस महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला के भी निकट माने जाते हैं। ऐसे में उनकी पोस्ट ने संगठन के भीतर जारी खींचतान को और उजागर कर दिया।

राजस्थान कांग्रेस में गुटबाजी का यह पहला मामला नहीं है। इसी वर्ष हुए यूथ कांग्रेस चुनावों में भी विभिन्न पदों के लिए अलग-अलग खेमों के उम्मीदवारों ने ताल ठोकी। प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए पायलट समर्थक अनिल चौपड़ा, डोटासरा समर्थक अभिषेक चौधरी और संदीप चौधरी समर्थित राजेंद्र फरसवाल मैदान में उतरे। अभी मतों की स्क्रूटनी जारी है, लेकिन चुनाव के दौरान ही संगठन के भीतर वर्चस्व की लड़ाई खुलकर सामने आ गई थी।

इसी तरह 21 जुलाई को राहुल गांधी के समर्थन में जयपुर में आयोजित कांग्रेस के प्रदर्शन में अशोक गहलोत, गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे, जबकि सचिन पायलट इसमें शामिल नहीं हुए। अगले ही दिन पायलट ने छात्रों के मुद्दे पर संविधान क्लब में अलग कार्यक्रम किया, जिसके पोस्टरों में प्रदेश कांग्रेस के अन्य बड़े नेताओं की तस्वीरें नहीं थीं। इन घटनाओं ने यह संकेत दिया कि पार्टी के भीतर अलग-अलग राजनीतिक ध्रुव अभी भी सक्रिय हैं।
20 अगस्त से राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होने वाला है। इसके बाद सितंबर में नगरीय निकाय और अक्टूबर में पंचायत चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे समय में कांग्रेस के भीतर लगातार सामने आ रही गुटबाजी विपक्षी भाजपा को राजनीतिक हमला करने का अवसर दे सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते पार्टी नेतृत्व ने मतभेदों को नहीं सुलझाया तो टिकट वितरण के दौरान यह खींचतान और खुलकर सामने आ सकती है। राजनीतिक विश्लेषक विमल चौहान ‘भटनेर पोस्ट डॉट कॉम’ से कहते हैं कि अब तक कांग्रेस गहलोत बनाम पायलट की खींचतान से पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकी थी, लेकिन अब डोटासरा के तेवरों ने संगठन में एक नए शक्ति केंद्र की चर्चा शुरू कर दी है। उनके अनुसार, चुनावी वर्ष में इस तरह की सार्वजनिक बयानबाजी कांग्रेस की संगठनात्मक एकजुटता पर सवाल खड़े करती है और इसका सीधा असर चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है।






