






शंकर सोनी, एडवोकेट
हनुमानगढ़ जिले की संगरिया नगरपालिका में अध्यक्ष पद का चुनाव इस बार बेहद दिलचस्प और पेचीदा स्थिति में पहुंचता दिखाई दे रहा है। 35 सदस्यीय सदन में अध्यक्ष पद के लिए नौ पार्षद चुनाव मैदान में हैं। सामान्य तौर पर माना जाता है कि किसी भी चुनाव में जीत के लिए बहुमत जरूरी होता है, लेकिन जब मुकाबला बहुकोणीय हो और वोट कई उम्मीदवारों में बंट जाएं, तब स्थिति अलग हो सकती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 18 वोटों का आंकड़ा हासिल किए बिना भी कोई प्रत्याशी अध्यक्ष चुना जा सकता है?
इस प्रश्न का उत्तर राजस्थान नगरपालिका निर्वाचन से जुड़े कानूनी प्रावधानों में छिपा हुआ है। अध्यक्ष पद के चुनाव में मतदान के बाद मतगणना की प्रक्रिया राजस्थान नगरपालिका निर्वाचन नियमों के अनुसार की जाती है। रिटर्निंग ऑफिसर सबसे पहले मतपत्रों की जांच करता है और वैध तथा अवैध मतों को अलग करता है। जिन मतपत्रों पर मतदाता की पहचान का संकेत हो, एक से अधिक उम्मीदवारों के सामने निशान लगाया गया हो, निशान स्पष्ट न हो अथवा मतपत्र नकली हो, उन्हें अवैध घोषित किया जाता है।
इसके बाद वैध मतों की गणना होती है। नियमों के अनुसार जो भी मतपत्र निरस्त नहीं किया जाता, उसे एक वैध मत माना जाता है। यहीं से चुनाव परिणाम की तस्वीर स्पष्ट होने लगती है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान नियम 87(5) में है, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि “सबसे अधिक वोट प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित किया जाएगा।” इस प्रावधान में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि उम्मीदवार के लिए कुल सदस्यों के आधे से अधिक मत प्राप्त करना अनिवार्य है। अर्थात अध्यक्ष पद का चुनाव साधारण बहुलता (च्सनतंसपजल) के आधार पर होता है, न कि पूर्ण बहुमत के आधार पर।
इसी कारण संगरिया की वर्तमान स्थिति विशेष महत्व रखती है। यदि नौ उम्मीदवार चुनाव मैदान में बने रहते हैं और वोट विभिन्न प्रत्याशियों में बंट जाते हैं, तो ऐसा संभव है कि कोई भी उम्मीदवार 18 वोट तक न पहुंच सके। उदाहरण के लिए यदि आठ उम्मीदवारों को तीन-तीन वोट मिलते हैं, तो कुल 24 वोट बंट जाएंगे। ऐसी स्थिति में नौवें उम्मीदवार को यदि 11 वोट मिलते हैं तो वह सबसे अधिक वोट पाने वाला प्रत्याशी होगा और नियमों के अनुसार अध्यक्ष निर्वाचित घोषित किया जा सकता है, भले ही उसके पास 18 वोट न हों।
इसी तरह यदि किसी अन्य परिस्थिति में एक उम्मीदवार को 10 वोट और बाकी उम्मीदवारों को उससे कम वोट मिलते हैं, तो भी वह सबसे अधिक मत पाने की स्थिति में विजेता हो सकता है। चुनावी गणित में निर्णायक बात यह नहीं है कि उम्मीदवार ने कुल सदन का बहुमत हासिल किया या नहीं, बल्कि यह है कि उसने अन्य सभी प्रत्याशियों की तुलना में अधिक वोट प्राप्त किए या नहीं।
नियमों में बराबरी की स्थिति का भी प्रावधान है। यदि मतगणना के बाद दो या अधिक उम्मीदवारों को बराबर वोट मिलते हैं और एक अतिरिक्त वोट मिलने पर उनमें से कोई निर्वाचित हो सकता है, तो रिटर्निंग ऑफिसर लॉटरी के माध्यम से फैसला करेगा। जिस उम्मीदवार का नाम लॉटरी में निकलेगा, उसे एक अतिरिक्त वोट प्राप्त मानते हुए विजेता घोषित किया जाएगा।
यही कारण है कि संगरिया नगरपालिका का अध्यक्ष चुनाव केवल संख्या बल का नहीं बल्कि रणनीति, गठजोड़ और वोट प्रबंधन का भी चुनाव बन गया है। नौ उम्मीदवारों की मौजूदगी में वोटों का बिखराव तय माना जा रहा है। ऐसे हालात में 18 के जादुई आंकड़े तक पहुंचना कठिन हो सकता है, लेकिन कानून के अनुसार यह जीत के लिए अनिवार्य शर्त नहीं है। अंततः वही उम्मीदवार अध्यक्ष बनेगा, जिसके पक्ष में सबसे अधिक वैध मत होंगे, चाहे वह संख्या बहुमत से कम ही क्यों न हो।
इस प्रकार राजस्थान नगरपालिका निर्वाचन नियम स्पष्ट करते हैं कि बहुकोणीय मुकाबले में पूर्ण बहुमत के अभाव में भी अध्यक्ष का चुनाव जीता जा सकता है, बशर्ते उम्मीदवार अन्य सभी प्रतिद्वंद्वियों से अधिक वोट हासिल कर ले। संगरिया का चुनाव इसी कानूनी प्रावधान के कारण इस समय बेहद रोचक और चर्चा का विषय बना हुआ है।
-लेखक नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक व वरिष्ठ अधिवक्ता हैं







