








गोपाल झा
राजस्थान की नौकरशाही में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी चर्चा किसी पद के साथ कम और उनकी कार्यशैली के साथ ज्यादा होती है। 1993 बैच के आईएएस शिखर अग्रवाल भी इसी श्रेणी में आते हैं। तीन दशक से ज्यादा लंबी प्रशासनिक पारी में उन्होंने जिला कलेक्टर से लेकर केंद्र की प्रतिनियुक्ति और राज्य के बड़े विभागों तक कई भूमिकाएं निभाई हैं। फिलहाल वे उद्योग, एमएसएमई, निवेश और प्रवासी राजस्थानी मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
शिखर अग्रवाल की अफसरी का एक दिलचस्प पहलू यह है कि उनके खाते में मैदानी प्रशासन और सचिवालयी कामकाज, दोनों का पर्याप्त अनुभव है। बीकानेर, उदयपुर, जालौर और हनुमानगढ़ जैसे जिलों में कलेक्टर रहने के बाद उन्होंने जयपुर विकास प्राधिकरण, जल संसाधन, जनजातीय क्षेत्रीय विकास और वन जैसे विभागों में भी काम किया। यानी फाइलों की दुनिया से लेकर जमीन पर प्रशासन की हकीकत तक, दोनों से उनका वास्ता रहा है।
उनकी कार्यशैली को समझने के लिए जयपुर विकास प्राधिकरण का दौर भी अक्सर याद किया जाता है। उनके कार्यकाल में जेडीए की आय बढ़ाने और आवासीय योजनाओं के विस्तार को लेकर काफी चर्चा रही। इसी तरह जल संसाधन और इंदिरा गांधी नहर से जुड़े दायित्वों ने उन्हें ऐसे विभागों में काम करने का मौका दिया, जहां फैसलों का असर सीधे आम आदमी, किसान और शहरों पर पड़ता है।
दिलचस्प बात यह भी है कि सत्ता के साथ अफसरों की भूमिका बदलना राजस्थान की नौकरशाही की पुरानी कहानी है।
वसुंधरा राजे के कार्यकाल में अग्रवाल को कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं। 2008 के बाद वे केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर चले गए और करीब पांच साल दिल्ली में रहे। 2013 में राजस्थान में फिर सरकार बदली तो वे वापस राज्य में आ गए। बाद के वर्षों में उनकी पोस्टिंग अपेक्षाकृत कम राजनीतिक रूप से दिखाई देने वाले पदों पर भी रही। यही वजह है कि उनके करियर को केवल ‘एक सरकार के पसंदीदा अफसर’ के चश्मे से देखना पूरी तस्वीर नहीं देता।
भजनलाल शर्मा सरकार बनने के बाद फरवरी 2024 में उन्हें मुख्यमंत्री का अतिरिक्त मुख्य सचिव बनाया गया। मुख्यमंत्री कार्यालय में एसीएस की नियुक्ति उस समय प्रशासनिक ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखी गई। अगस्त 2024 में मुख्यमंत्री सचिवालय में कामकाज के बंटवारे में भी अग्रवाल के पास कई महत्वपूर्ण विभागों की फाइलें रहीं।
हालांकि नौकरशाही में कोई कुर्सी स्थायी नहीं होती। नवंबर 2025 के बड़े प्रशासनिक फेरबदल में उन्हें मुख्यमंत्री कार्यालय से हटाकर उद्योग विभाग की जिम्मेदारी दी गई और अखिल अरोड़ा को मुख्यमंत्री का एसीएस बनाया गया। इसके बाद जुलाई 2026 से अग्रवाल को उद्योग, एमएसएमई, निवेश, घरेलू एवं प्रवासी राजस्थानी मामलों सहित कई जिम्मेदारियां मिलीं।
अब भुवनेश्वर की प्रवासी राजस्थानी मीट में उनकी मौजूदगी को इसी पृष्ठभूमि में देखना दिलचस्प है। उद्योग और निवेश के साथ प्रवासी राजस्थानियों को जोड़ने की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनकी भूमिका फाइलों से निकलकर निवेशकों, उद्यमियों और प्रवासी समुदाय के बीच संवाद की भी हो गई है। हाल ही में राजस्थान संपर्क 181 कॉल सेंटर के निरीक्षण के दौरान परिवादियों से सीधे संवाद करना भी उनकी मौजूदा कार्यशैली का एक उदाहरण है।
ब्यूरोक्रेसी की गलियों में उनके बारे में सबसे ज्यादा चर्चा शायद यही रहती है कि पद चाहे बदले, काम का दायरा बदले या सरकार बदले, शिखर अग्रवाल प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर अपनी जगह बनाने का रास्ता तलाश लेते हैं। यही उनकी तीन दशक से अधिक लंबी अफसरी का सबसे रोचक पहलू है। और शायद नौकरशाही का यही पुराना उसूल भी है, सरकारें आती-जाती हैं, कुर्सियां बदलती हैं, लेकिन अनुभवी अफसर की असली पूंजी उसकी फाइलों से ज्यादा उसका प्रशासनिक अनुभव होता है।







