







डॉ. एमपी शर्मा
राजस्थान के शहरी निकाय चुनावों के नतीजे किसी एक दल की पारंपरिक जीत या हार से कहीं आगे की दास्तान बयां करते हैं। यदि इन परिणामों को केवल भारतीय जनता पार्टी बनाम कांग्रेस के चश्मे से देखा जाए, तो हम उस ज़मीनी हकीकत को नजरअंदाज कर देंगे जो मतदाताओं ने मतपेटियों के ज़रिये दर्ज कराई है। इस बार चुनावी अखाड़े में असली विजेता कोई राजनीतिक दल नहीं, बल्कि जागरूक मतदाता रहा है, जिसने साफ कर दिया कि स्थानीय सरकार में पार्टी का झंडा नहीं, बल्कि काम करने वाला चेहरा मायने रखता है।
हनुमानगढ़ शहर का जनादेश खासा विचारणीय है। मतदाताओं ने दोनों प्रमुख दलों को स्पष्ट बढ़त न देकर निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल के प्रभाव पर भरोसा जताया और उनका राजनीतिक डंका बजा। मगर लोकतंत्र का मिजाज कभी एकतरफा नहीं होता। उसी चुनाव में विधायक की धर्मपत्नी की पराजय ने एक मौन किंतु गहरा संदेश दिया। व्यक्तिगत प्रभाव अपनी जगह है और जनता का स्वतंत्र विवेक अपनी जगह। लोकतंत्र में कोई भी नेता इतना बड़ा नहीं हो सकता कि जनता उसके हर फैसले पर आंख मूंदकर मुहर लगा दे। जनता किसी की जेब में नहीं होती।
इन नतीजों ने यह भ्रम भी तोड़ दिया कि रसूखदार नाम ही चुनाव जिताते हैं। जनता ने कई बड़े नामों को दरकिनार कर आराम दे दिया, वहीं दूसरी ओर उन प्रत्याशियों को दोबारा सिर-आंखों पर बिठाया जो पिछले पांच साल सुख-दुख में साथ खड़े रहे और गलियों-मोहल्लों की समस्याओं से जूझते रहे। चुनाव के वक्त हाथ जोड़ना बहुत आसान है, पर पांच साल तक जनता के बीच डटे रहना मुश्किल, मतदाता इस अंतर को बखूबी पहचानता है।
जिले के व्यापक परिदृश्य पर नजर डालें तो तस्वीर और मुखर हो जाती है। सत्तारूढ़ भाजपा रावतसर और टिब्बी में अपना खाता तक नहीं खोल सकी, जबकि नोहर और भादरा में भी किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। हालांकि गोलूवाला में भाजपा अपनी कुछ साख बचाने में कामयाब रही, पर निर्दलीयों की मौजूदगी ने साबित कर दिया कि कोई भी क्षेत्र किसी दल की स्थायी जागीर नहीं है। टूटी सड़कें, बजबजाती नालियां, पेयजल संकट, भाई-भतीजावाद और चुनावी वादों की अनदेखी, जनता की राजनीतिक स्मृति बहुत लंबी होती है और वह वक्त आने पर हर बात का हिसाब लेती है।
अब नई शहरी सरकारों का गठन होना है। जनता ने केवल कुर्सियां भरने के लिए जनादेश नहीं दिया, बल्कि शहर बदलने, भ्रष्टाचार पर नकेल कसने और व्यवस्था में पारदर्शिता लाने की उम्मीद से चुना है। जनता का सीधा संदेश है, हमें भाषण नहीं, परिणाम चाहिए।
लोकतंत्र की यही सबसे बड़ी खूबसूरती है कि वह किसी को स्थायी राजा नहीं बनाता और न ही किसी को हमेशा के लिए हारा हुआ मानता। आज जो परिणाम आया है, कल उसके काम का कड़ा हिसाब होगा। क्योंकि,
‘आज नहीं तो कल, महकेगी ख्वाबों की महफ़िल, नया ज़माना आएगा।’ और शायद इस नए ज़माने की शुरुआत इन्हीं शहरी निकाय चुनावों से हो चुकी है।
-लेखक सीनियर सर्जन व आईएमए के नेशनल वाइस प्रेसिडेंट हैं






