







सतीश गर्ग की रिपोर्ट
संगरिया नगरपालिका चुनाव के नतीजों ने स्थानीय सियासत में नया मोड़ ला दिया है। 35 वार्डों वाली इस नगरपालिका में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने के बाद अब जोड़-तोड़ और रणनीतिक गोलबंदी चरम पर है। चुनावी नतीजों में मतदाताओं ने निर्दलीय प्रत्याशियों पर भारी भरोसा जताया है। कुल 35 सीटों में से निर्दलीयों ने 25 वार्डों में जीत दर्ज कर मुख्य दलों के समीकरण बिगाड़ दिए हैं। वहीं, कांग्रेस को 8 और भाजपा को महज 2 सीटों पर संतोष करना पड़ा है। इस त्रिशंकु जनादेश के बीच निर्दलीयों के बड़े धड़े के सहयोग से कांग्रेस अपना बोर्ड बनाने की बेहद मजबूत स्थिति में नजर आ रही है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, स्थानीय कांग्रेस विधायक अभिमन्यु पूनिया की रणनीतिक सक्रियता के चलते इस समय 20 पार्षद उनके खेमे में एकजुट हो चुके हैं। 35 सदस्यों वाले सदन में साधारण बहुमत के लिए 18 पार्षदों के समर्थन की दरकार है। ऐसे में 20 पार्षदों का आंकड़ा कांग्रेस के पक्ष में बोर्ड गठन की राह आसान करता दिख रहा है।
कांग्रेस विचारधारा वाले कुछ अन्य निर्दलीय पार्षद भी ऐन वक्त पर विधायक के समर्थन में आ सकते हैं। हालांकि, जोड़-तोड़ और क्राॉस-वोटिंग के अंदेशे को देखते हुए दोनों ही प्रमुख दलों ने अभी तक अपने पत्ते आधिकारिक तौर पर नहीं खोले हैं।
संगरिया में चेयरमैन पद के लिए सियासी गलियारों में चार नाम सबसे प्रमुखता से उभरकर सामने आए हैं। इन संभावित चेहरों के पीछे मजबूत पारिवारिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि है,
प्रिया जैन, पूर्व पालिकाध्यक्ष हेमराज जैन की पुत्रवधू हैं। जैन परिवार का पालिका की राजनीति में पुराना प्रभाव रहा है, जिसका लाभ उन्हें मिल सकता है। हेमराज जैन खुद दो बार पालिकाध्यक्ष रह चुके हैं।
सुमन सोनी, कांग्रेस के नगर मंडल अध्यक्ष संजीव सोनी की धर्मपत्नी हैं। संगठन के प्रति निष्ठा और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच पकड़ उनकी मजबूत दावेदारी मानी जा रही है।
अनीता कड़वा व पारुल माहेश्वरी, स्थानीय राजनीति में सक्रिय पूर्व पार्षद लखन कड़वा खुद भले ही चुनाव हार गए हों, लेकिन उनकी धर्मपत्नी अनीता कड़वा और पुत्री पारुल माहेश्वरी दोनों ने जीत दर्ज की है। एक ही परिवार से दो सीटें आने के चलते अनीता कड़वा और पारुल माहेश्वरी दोनों के नाम पर चेयरमैन पद के लिए गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
विपक्षी खेमों में बिखराव, भाजपा बैकफुट पर
दूसरी ओर, केवल 2 सीटें जीतने वाली भाजपा सीधे तौर पर मुकाबले से बाहर दिख रही है, लेकिन क्षेत्र के दिग्गज नेता अपने-अपने प्रभाव वाले पार्षदों को साधने में जुटे हैं। पूर्व जिलाध्यक्ष प्रदीप बेनीवाल के पास सर्वाधिक 7 पार्षदों का समर्थन बताया जा रहा है। पूर्व पालिकाध्यक्ष सुखवीर सिंह सिद्धू के साथ 5 पार्षद लामबंद हैं। पूर्व विधायक गुरदीप शाहपीनी के प्रभाव में 3 पार्षद हैं। चौटाला ग्रुप के सलवारा के पास 2 पार्षदों की मौजूदगी बताई जा रही है। निर्दलीय पार्षद अनिल भोबिया और प्रिंस भोबिया ने अभी तक अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है और वे पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।
विपक्षी धड़े का यह बिखराव सीधे तौर पर विधायक पूनिया और कांग्रेस के पक्ष को मजबूत कर रहा है। जब तक विरोधी गुट एकजुट होकर कोई साझा रणनीति नहीं बनाते, तब तक कांग्रेस को सत्ता की चाबी मिलने के आसार सबसे अधिक हैं।
समीकरणों के लिहाज से संगरिया की कुर्सी का फैसला अब पर्दे के पीछे चल रही सियासी बातचीत और वादों पर निर्भर करेगा। अंतिम समय में कौन सा निर्दलीय पाला बदलता है और विधायक पूनिया किस नाम पर अंतिम मुहर लगवाते हैं, इस पर पूरे कस्बे की निगाहें टिकी हैं।







