







गोपाल झा
शोर थम चुका है। झंडे-बैनर सिमट गए हैं। लेकिन हनुमानगढ़ की फिजां में पसरा यह सन्नाटा सुकून वाला नहीं है। इस खामोशी के पेट में जबरदस्त उथल-पुथल मची है। बीजेपी, कांग्रेस और निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल खेमे के दिलों की धड़कनें तेज हैं। बीपी अप-डाउन हो रहा है।
साल 1994 के बाद यह पहला ऐसा चुनाव है, जिसकी तासीर बेहद अजीब रही। शहर के चुनावी इतिहास में ऐसी चुप्पी पहले कभी नहीं देखी गई।
इस दफा अवाम ने गजब की खामोशी ओढ़ रखी थी। मतदाता का मूड भांपना सियासी पंडितों के बस की बात नहीं रही। दरवाजे पर जो भी उम्मीदवार हाथ जोड़कर पहुंचा, वोटर ने मुस्कुराकर हामी भर दी। सर्वे टीम सामने आई, तो लोग एकदम न्यूट्रल हो गए। ‘कोई नृप होइ, हमें का हानी’, यानी राज किसी का भी आए, हमें क्या फर्क पड़ता है!
बाहर से सब बिल्कुल शांत, पर अंदरखाने क्या खिचड़ी पकी, किसी को भनक तक नहीं लगी। जब अवाम इतना गहरा मौन साध ले, तो समझ लीजिए किसी बड़े धमाके की जमीन तैयार हो रही है। क्या हनुमानगढ़ की लोकल सियासत में कोई बड़ा विस्फोट होने वाला है? यह सवाल हर चौक-चौराहे पर तैर रहा है।
पखवाड़े भर की जी-तोड़ मेहनत के बाद प्रत्याशियों को लगा था कि अब चैन की सांस लेंगे। बैठकर वोटों का हिसाब-किताब लगाएंगे। लेकिन सियासत में सुकून कहां! वोटिंग खत्म होते ही हाईकमान का फरमान आ गया, ‘बैग पैक करो और तुरंत बताए ठिकाने पर पहुंचो।’
अधिकांश प्रत्याशी सूटकेस उठाकर अज्ञात ठिकानों की तरफ रवाना हो गए। यानी सीधा अज्ञातवास। अभी वे लग्जरी होटलों या रिजॉर्ट्स में आराम फरमा रहे हैं। खातिरदारी पूरी चल रही है। पर यह सुकून सिर्फ 14 सितंबर तक का है।
फिलहाल तीनों खेमों के लिए सभी 60 वार्डों के प्रत्याशी आंखों के तारे हैं। हर किसी को दुलारा जा रहा है। जैसे ही ईवीएम खुलेगी, कई ‘तारों’ की चमक फीकी पड़ जाएगी। जो हारेगा, वह दूध में से मक्खी की तरह बाहर कर दिया जाएगा। और जो जीतेगा? वह ‘सिकंदर’ कहलाएगा। लेकिन उस सिकंदर की आजादी भी छिन जाएगी। जीतने वाले तुरंत 21 सितंबर यानी सभापति के चुनाव तक फिर से ‘बाड़ाबंदी’ में कैद हो जाएंगे।
‘भटनेर पोस्ट’ के जमीनी सर्वे के आंकड़े किसी के लिए भी एकतरफा राहत लेकर नहीं आए। रुझान साफ बता रहे हैं कि नगरपरिषद में किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलना नामुमकिन सा दिख रहा है। सबसे तगड़ा झटका कांग्रेस को लगता दिख रहा है। पिछले चुनाव में 35 सीटें जीतकर बोर्ड बनाने वाली पार्टी इस बार दहाई का आंकड़ा छूने के लिए हांफ रही है। 8 से 12 सीटों पर सिमटती दिख रही कांग्रेस का हाल अंदरूनी कलह ने बिगाड़ दिया।
पिछले चुनाव में 18 सीटों पर सिमटने वाली बीजेपी को इस बार कुछ फायदा जरूर होता दिख रहा है। पार्टी 22 से 25 सीटों के दायरे में पहुंच सकती है। सत्ता की हनक का फायदा दिख रहा है, लेकिन बहुमत का 31 का आंकड़ा अभी भी दूर है।
सबसे ज्यादा चौंकाने वाला रुझान निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल के खेमे का है। यह गुट 23 से 26 सीटें हासिल करता दिख रहा है। लोकल लेवल पर विधायक की मजबूत पकड़ ने दोनों पार्टियों का खेल फंसा दिया है।
अगर यह चुनावी गणित नतीजों में तब्दील हुआ, तो बोर्ड बनाना टेढ़ी खीर साबित होगा। कांग्रेस भले ही रेस से बाहर दिख रही हो, लेकिन उसके जीते हुए 8-10 पार्षद ‘किंगमेकर’ बन जाएंगे। उनकी पूछ बढ़ सकती है। बीजेपी के कुछ पार्षदों के इधर-उधर खिसकने की चर्चाएं भी गर्म हैं। हालांकि बीजेपी सूबे की सत्ता में है। उसके पास ताकत है, सरकारी तंत्र है यानी सत्ता का ग्लैमर भी। वह किसी भी सूरत में निर्दलीय बोर्ड नहीं बनने देना चाहेगी। लेकिन दूसरी तरफ विधायक गणेशराज बंसल भी लोकल पॉलिटिक्स के पुराने और मंझे हुए खिलाड़ी हैं। जोड़-तोड़ और शह-मात के खेल में उन्हें महारत हासिल है।
फिलहाल सब कुछ थमा हुआ है। लेकिन यह तूफान से पहले की शांति है। 14 सितंबर को जब ईवीएम का पिटारा खुलेगा, तब असली पिक्चर शुरू होगी। पार्षदों की खींचतान, रिसॉर्ट पॉलिटिक्स और सौदेबाजी का असली रोमांच उसी दिन से शुरू होगा।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं








