






गोपाल झा
चुनावी शोर था। कांग्रेस थी। भाजपा थी। और निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल की टीम भी। कांग्रेस के पास पंजा था। भाजपा के पास कमल फूल। बंसल के पास अपना कोई स्थायी चुनाव चिन्ह नहीं था। रणनीति बनी कि सभी 57 वार्डों में एक ही निशान लिया जाए। सहमति बनी बांसुरी पर। समय भी साथ था। जन्माष्टमी का माहौल था। वार्डों में बांसुरी बांटी गई। बच्चों के हाथ में बांसुरी पहुंची। गलियों में इसकी आवाज सुनाई देने लगी।
देखते ही देखते बांसुरी चुनाव चिन्ह से आगे बढ़कर पहचान बन गई। बंसल के प्रत्याशी ‘बांसुरीवाला’ के नाम से चर्चा में आ गए। फिर नतीजे आए। दिन था गणेश चतुर्थी का। संयोग से ज्यादा इसे सियासी संकेत मानने वालों की कमी नहीं। हनुमानगढ़ में यह परिणाम इसलिए भी खास है कि पहली बार किसी निर्दलीय नेता ने अपने बूते ‘शहर की सरकार’ बनाने लायक बहुमत हासिल किया है। कुल 60 वार्डों में बंसल गुट को 34 सीटें मिलीं। माकपा की एक सीट भी उनके साथ है। यानी आंकड़ा 35 तक पहुंच गया।
भाजपा को पिछली बार के 18 के मुकाबले इस बार 15 सीटों पर रुकना पड़ा। कांग्रेस के लिए राहत यह रही कि कमजोर टीम, बिना किसी गंभीरता के उसने 10 सीटें हासिल कर लीं। नतीजों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि शहर ने दलों के बजाय एक चेहरे पर भरोसा किया। लेकिन चुनाव जीतना और सरकार चलाना दो अलग बातें हैं।
अब बंसल के सामने पहला बड़ा फैसला सभापति का है। सबसे मजबूत नाम सोनू बंसल का माना जा रहा है। उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़कर राजनीति में कदम रखा है। वह गणेशराज की बेटी हैं। सवाल यह है कि महज पार्षद बनने के लिए कोई बैंक की नौकरी क्यों छोड़ेगा? इसी वजह से सोनू को बड़ा दावेदार माना जा रहा है।
दूसरा नाम संतोष बंसल का है। वह चुनाव हार चुकी हैं, लेकिन सभापति बनने के लिए तत्काल निर्वाचित पार्षद होना जरूरी नहीं है। नियमों के तहत उन्हें बाद में पार्षद बनाया जा सकता है। संतोष बंसल की हार हालांकि बंसल के लिए एक अहम संकेत भी है। माना जा रहा है कि स्थानीय टीम पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया गया। ‘जीत तो पक्की है’ वाला आत्मविश्वास शायद भारी पड़ गया।
जिस टीम को जमीनी ताकत समझा गया, वह कई जगह सिर्फ चेहरे के आसपास दिखाई दी। जमीन पर उसकी पकड़ उतनी मजबूत नहीं थी। नतीजा सामने है।
खैर। संभावित सभापति के तौर पर तीसरा नाम मंजू रणवां का है। वह बंसल के करीबी सुमित रणवां की पत्नी हैं और पिछली परिषद में पार्षद रह चुकी हैं।
सुमित और बंसल का राजनीतिक तालमेल पुराना है। बंसल विधायक बनने के बाद सुमित को सभापति बना चुके हैं। इसलिए मंजू की दावेदारी को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता।
चौथा नाम सोनल अग्रवाल का है। वार्ड 47 से जीती सोनल, पूर्व सभापति पवन अग्रवाल की पुत्रवधू और आदित्य अग्रवाल की पत्नी हैं। गणेशराज और पवन अग्रवाल की दोस्ती भी किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में यह नाम भी सियासी समीकरण में फिट बैठता है।
एक फार्मूला यह हो सकता है कि सभापति पद परिवार के पास रहे और मंजू रणवां को उपसभापति बनाया जाए। इससे सुमित रणवां की भूमिका भी प्रभावी बनी रह सकती है। पिछले बोर्ड में भी बंसल ने इसी तरह सत्ता का संतुलन साधा था। सुमित को निर्माण से जुड़े मामलों में खासा प्रभाव मिला था। अखबारों में उन्हें निर्माण कमेटी के अध्यक्ष तक के रूप में लिखा गया, जबकि परिषद में कमेटियों का औपचारिक गठन ही नहीं हुआ था।
वैसे भी अब हालात अलग हैं। इस बार बंसल के पास साफ बहुमत है। बोर्ड बनाने में कोई अड़चन नहीं है। जनता ने उन्हें फ्री हैंड दिया है। लेकिन यही बहुमत सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है। अब शहर की हर सड़क का सवाल बंसल से होगा। हर नाली, सफाई, निर्माण और विकास का हिसाब भी उन्हीं से मांगा जाएगा। इसलिए सभापति का चुनाव केवल एक कुर्सी भर नहीं है। यह बंसल की राजनीतिक सूझबूझ की परीक्षा है। सही फैसला लिया तो यह बोर्ड उनकी ताकत बनेगा। गलत फैसला हुआ तो यही बहुमत सिरदर्द भी बन सकता है। खासकर विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह फैसला बेहद अहम है। नगर परिषद की राजनीति सीधे मोहल्लों तक जाती है। यहां का असर विधानसभा की सियासत पर पड़ता है। यही वजह है कि सभापति के नाम को लेकर इतनी चर्चा है।
फिलहाल तस्वीर साफ है। बांसुरी ने चुनावी मैदान में बंसल का साथ दिया। जनता ने बहुमत देकर उनकी राह आसान कर दी। अब बारी गणेशराज की है। बांसुरी की धुन से चुनाव जीता जा चुका है। अब शहर की सरकार चलाने के लिए सुर भी साधना होगा। कौन सभापति बनेगा, यह फैसला फिलहाल गणेशराज के पास है। और सियासत में असली खेल अक्सर चुनाव जीतने के बाद ही शुरू होता है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं






