






गोपाल झा
हनुमानगढ़ की फिज़ाओं में इस वक्त सियासत की तपिश साफ महसूस की जा सकती है। टाउन से लेकर जंक्शन तक, गलियों में चर्चा एक ही है। दोनों पारंपरिक दल, भाजपा और कांग्रेस, अजीब सी कशमकश और बेचौनी से घिरे हैं। वजह बिल्कुल साफ है। एक निर्दलीय विधायक का बढ़ता कद दोनों खेमों की नींद उड़ाए हुए है।
शहरी निकाय के इस दंगल में बिसात पूरी शिद्दत से बिछाई गई थी। भाजपा ने दांव खेलने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। उम्र के इस पड़ाव पर भी पूर्व मंत्री डॉ. रामप्रताप का जज्बा देखने लायक था। वे अपने पूरे कुनबे के साथ वार्ड-दर-वार्ड खाक छानते दिखे। हर कोई उनके समर्पण और सक्रियता का कायल था। उधर भाजपा नेता अमित चौधरी के तर्कों में दम था। वे तथ्यों की धार पर अपनी बात रख रहे थे। लगा था, भगवा खेमा इस बार कोई करिश्मा करेगा।
मगर कांग्रेस की हालत जुदा थी। पार्टी आज यहां नेतृत्वविहीन खड़ी नजर आती है। न संगठन में वह धार दिखी, न दशकों तक सत्ता सुख भोगने वाले नेताओं में परिपक्वता। चंद चाटुकारों की संकीर्ण और निजी स्वार्थ से अटी रणनीति ने पार्टी का भट्ठा पूरी तरह बिठा दिया।
नतीजों ने दोनों दलों के दावों को आईना दिखा दिया। भाजपा अपनी पुरानी साख भी न बचा सकी। वह पिछली बार की 18 सीटों तक भी नहीं पहुंच पाई और महज 15 पर सिमट गई। वहीं, पिछले चुनाव में 35 सीटों का जादुई आंकड़ा छूने वाली कांग्रेस तो जैसे ताश के पत्तों की तरह ढह गई। वह बमुश्किल दहाई छू सकी, सिर्फ 10 सीटें।
सियासत में सीटों का गणित तात्कालिक होता है। वह सिर्फ आज का ‘तख्त’ तय करता है। मगर वोटों का बिखराव आने वाले कल की इबारत लिखता है। इस आईने में देखें तो तस्वीर दोनों दलों को डराती है। कुल 60 वार्डों में 1 लाख 7 हजार 586 नागरिकों ने मताधिकार का इस्तेमाल किया।
आंकड़ों की जुबानी समझिए। निर्दलीय विधायक खेमा 51,414 वोट (47.79 प्रतिशत), भारतीय जनता पार्टी 34,322 वोट (31.91 प्रतिशत) व कांग्रेस 21,364 वोट (19.86 प्रतिशत)। करीब 48 फीसदी वोट अकेले निर्दलीय के पाले में चले गए। यह सिर्फ जीत नहीं, दोनों दलों के खिलाफ जनता की खामोश बगावत का खुला इजहार था।
अब शहर की सरकार बनने की दहलीज पर है। सभापति और उप-सभापति की कुर्सियों के लिए बिसात बिछाई जा रही है। शहर की धड़कनों को साधने वाले नुमाइंदे आखिर हैं कैसे? उनकी तालीम और उम्र का मिजाज क्या कहता है? यह जानना बेहद दिलचस्प है। तालीम की बात करें तो मिला-जुला गुलदस्ता दिखता है, 20 पार्षद 10वीं पास हैं। छह पार्षदों ने 12वीं तक पढ़ाई की है जबकि 13 पार्षद स्नातक हैं। वहीं, 9 पार्षदों के पास स्नातकोत्तर की डिग्री है। जबकि 3 पार्षद प्रोफेशनल डिग्रीधारी हैं।
उम्र के पड़ाव पर नजर डालें तो सदन में जोश और तजुर्बे का अनूठा संगम दिखेगा। युवा यानी 25 वर्ष की दहलीज वाले सिर्फ 2 चेहरे हैं, 26 से 35 वर्ष के 12 पार्षद हैं, 36 से 50 वर्ष की उम्र वाले सबसे ज्यादा 30 चेहरे हैं। यानी सदन के पास ऊर्जा और समझ दोनों हैं जबकि 51 से 60 वर्ष के 12 और 60 पार वाले 4 अनुभवी बुजुर्ग भी सदन की गरिमा बढ़ाएंगे।
इस बार शहर की संसद की सबसे खूबसूरत तस्वीर उसका सामाजिक संतुलन है। 60 सदस्यों वाले बोर्ड में 31 महिला पार्षद जीतकर आई हैं। यानी सदन में आधी आबादी अब बहुमत में है। वहीं 28 पुरुष पार्षद हैं और एक सीट पर थर्ड जेंडर नुमाइंदे ने जीत का परचम लहराया है।
फैसले की घड़ी करीब है। शहर की सरकार का चेहरा जल्द सामने होगा। पर इतना तय है कि घग्घर के कछार में बहती इस सियासी हवा ने जमे-जमाए दरख्तों को जड़ से हिला दिया है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं






