





डॉ. मिताली अग्रवाल
‘नारी सशक्तिकरण’ आज हमारे समाज के सबसे चर्चित शब्दों में से एक है। मंचों पर भाषण होते हैं, सेमिनार आयोजित किए जाते हैं, महिला नेतृत्व की बातें होती हैं और हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल आज भी उतनी ही मजबूती से खड़ा है, क्या नारी वास्तव में सशक्त हो रही है या हम केवल सशक्तिकरण की तस्वीर बनाने में व्यस्त हैं?
मेरे लिए सशक्त नारी का अर्थ केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना नहीं है। किसी पद पर होना, किसी संस्था की सदस्य बनना या चुनाव जीतकर प्रतिनिधि बन जाना भी अपने आप में सशक्तिकरण नहीं है। सशक्त महिला वह है, जो अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं लेने का साहस और अधिकार रखती है। वह अपनी बात कह सके, असहमति व्यक्त कर सके, जरूरत पड़ने पर ‘न’ कह सके और अपने निर्णयों की जिम्मेदारी भी स्वीकार कर सके।
आज भी हमारा समाज पूरी तरह पुरुष प्रधान मानसिकता से मुक्त नहीं हुआ है। इसका एक ज्वलंत उदाहरण नगरीय निकाय चुनावों में दिखाई देता है। जब किसी वार्ड में महिला सीट आती है तो बड़ी संख्या में महिलाएँ चुनावी मैदान में उतरती हैं। यह निश्चित रूप से लोकतंत्र और महिला भागीदारी के लिए सकारात्मक संकेत है। लेकिन इसके साथ एक गंभीर सवाल भी खड़ा होता है, क्या वह महिला स्वयं राजनीति कर रही है या उसके नाम पर कोई पुरुष राजनीति कर रहा है? कहीं पति आगे होता है, कहीं पिता, कहीं पुत्र और कहीं ससुर। महिला निर्वाचित प्रतिनिधि होती है, लेकिन निर्णय लेने वाला कोई और। कुर्सी महिला की, नाम महिला का, हस्ताक्षर महिला के, लेकिन निर्णय किसी और के। तो क्या इसे वास्तविक महिला सशक्तिकरण कहा जा सकता है?

महिला को चुनाव लड़वा देना सशक्तिकरण नहीं है। उसे निर्वाचित करवा देना भी पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सशक्तिकरण तब होगा, जब वह महिला अपने पद पर बैठकर अपने विवेक से निर्णय ले सके और उसके निर्णयों को किसी पुरुष की स्वीकृति की जरूरत न पड़े।
यह समस्या केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। सामाजिक संस्थाओं और समितियों में भी कई बार महिलाओं को जिम्मेदारी तो दी जाती है, लेकिन अधिकार की सीमा कोई और तय करता है। महिला को मंच पर बैठाना आसान है, लेकिन उसे मंच से अपनी बात कहने की स्वतंत्रता देना कठिन है। समिति में शामिल करना आसान है, लेकिन उसके निर्णय को स्वीकार करना कठिन है।
आर्थिक स्वतंत्रता निस्संदेह महिला सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण आधार है। शिक्षा, रोजगार, संपत्ति पर अधिकार और आर्थिक निर्णयों में भागीदारी आवश्यक हैं। लेकिन केवल आर्थिक स्वतंत्रता ही अंतिम कसौटी नहीं हो सकती। यदि महिला कमाती है, फिर भी अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं नहीं ले सकती, तो उसकी स्वतंत्रता अधूरी है।

इसी तरह यदि महिला किसी संस्था में पद पर है, लेकिन अपनी बात रखने के लिए किसी पुरुष की स्वीकृति की जरूरत है, तो उसका सशक्तिकरण अधूरा है। यदि वह चुनाव जीतती है, लेकिन निर्णय कोई दूसरा करता है, तो उसका प्रतिनिधित्व भी अधूरा है।
नारी की पहचान किसी रिश्ते की पहचान से बड़ी होनी चाहिए। उसे केवल “फलां की पत्नी”, “फलां की बेटी”, “फलां की बहू” या “फलां की माँ” के रूप में नहीं, बल्कि उसके अपने नाम, व्यक्तित्व और निर्णयों के लिए पहचाना जाना चाहिए।
हमें यह भी समझना होगा कि नारी सशक्तिकरण का अर्थ पुरुष के विरुद्ध खड़ा होना नहीं है। समानता का अर्थ किसी को हराना नहीं, बल्कि बराबरी से खड़ा होना है। सशक्त समाज वह नहीं, जहाँ महिलाएँ केवल संख्या में पुरुषों के बराबर दिखाई दें; सशक्त समाज वह है जहाँ उनकी आवाज, निर्णय और स्वतंत्र पहचान को भी बराबर महत्व मिले।

इसलिए अब केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि ‘महिलाएँ आगे आ रही हैं।’ हमें पूछना होगा, क्या वे स्वयं आगे आ रही हैं? क्या वे स्वयं निर्णय ले रही हैं? क्या उनकी अपनी आवाज है? क्या उनकी अपनी पहचान है?
किसी महिला के हाथ में पद दे देना आसान है, लेकिन उसके हाथ में निर्णय की शक्ति देना कठिन। उसका नाम सूची में लिख देना आसान है, लेकिन उसकी स्वतंत्र पहचान स्वीकार करना कठिन। और उसे ‘सशक्त’ कह देना सबसे आसान है, लेकिन वास्तव में उसे सशक्त मान लेना शायद आज भी हमारे पुरुष प्रधान समाज की सबसे बड़ी परीक्षा है। यही सशक्त नारी का सच है, प्रतिनिधित्व से आगे निर्णय-शक्ति, अवसर से आगे अधिकार और पहचान से आगे स्वतंत्र अस्तित्व।




