





डॉ. सुचेता जैन
हनुमानगढ़ की गलियों में इन दिनों एक ही सुगबुगाहट है। कहीं पोस्टर लग रहे हैं, कहीं चाय की थड़ियों पर नाम उछल रहे हैं, तो कहीं मोहल्ले की छत पर बैठकें हो रही हैं कि इस बार वार्ड से टिकट किसे मिलेगा। नगर परिषद के साठ वार्डों में आरक्षण की लॉटरी निकल चुकी है, हर वार्ड का हिसाब-किताब साफ हो चुका है, और अब बस इंतज़ार है उन नामों का जो असल में इन गलियों में उतरेंगे, वोट मांगेंगे, और पांच साल के लिए हमारी आवाज़ बनेंगे। लेकिन सवाल यह है कि हम वोट किसे दें, और क्यों दें।
अक्सर हम भूल जाते हैं कि पार्षद कोई विधायक या सांसद नहीं होता। वो हमारे घर के सबसे नज़दीक बैठा जनप्रतिनिधि होता है। जिस गली में हम रोज़ चलते हैं, जिस नाली का पानी दहलीज़ तक आ जाता है, जिस स्ट्रीट लाइट के नीचे शाम को अंधेरा रहता है, यह सब उसी वार्ड सदस्य के दायरे में आता है। एक वार्ड में सैकड़ों घर होते हैं, और अगर सच में सोचा जाए तो यह कोई बहुत बड़ा इलाका नहीं होता। यह उतना बड़ा होता है जितना एक ईमानदार, मेहनती और जागरूक इंसान पांच साल में पूरी तरह बदल सकता है। सोचिए, अगर हर वार्ड सदस्य बस अपने वार्ड की तीन-चार बुनियादी समस्याओं को उठाकर उन्हें जड़ से सुलझाने में जुट जाए, सड़क, सीवरेज, सफाई, पानी की टंकी, स्ट्रीट लाइट, तो पांच साल में पूरा वार्ड बदल सकता है। यह कोई असंभव सपना नहीं, बल्कि एक बहुत ही व्यवहारिक लक्ष्य है, बशर्ते इरादा साफ हो।

पर हमारे यहां चुनाव आते ही सबसे पहले बात पार्टी की होने लगती है। कौन बीजेपी से है, कौन कांग्रेस से, कौन निर्दलीय। झंडे ऊंचे हो जाते हैं, नारे तेज़ हो जाते हैं, और असली मुद्दा कहीं पीछे छूट जाता है। जबकि सच यह है कि वार्ड का चुनाव पार्टी की विचारधारा से कहीं ज़्यादा उस इंसान की नीयत का चुनाव है। जो सामने खड़ा है, वो सुबह-शाम आपकी गली में दिखेगा या सिर्फ चुनाव के वक्त? वो आपकी नाली की शिकायत पर फोन उठाएगा या पांच साल गायब रहेगा? वो अपने वार्ड को अपना घर समझेगा या सिर्फ एक सीढ़ी, जिससे आगे बढ़कर किसी और कुर्सी तक पहुंचना है? यह सवाल पार्टी के झंडे से बड़ा है, और यही सवाल हर वोटर को खुद से पूछना चाहिए इस बार।

एक चमक-दमक वाले चेहरे और बड़े-बड़े वादों में फर्क करना सीखना होगा। जो उम्मीदवार सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करे, विकास के सपने दिखाए, पूरे शहर को बदलने का दावा करे, उससे ज़्यादा भरोसे का वो इंसान होना चाहिए जो छोटी-छोटी बात करे, अपने वार्ड की असल तकलीफ़ की बात करे, और यह बताए कि वो इसे कैसे हल करेगा। जो अपने वार्ड की हर गली का नाम जानता हो, हर बुज़ुर्ग को पहचानता हो, हर मां की चिंता समझता हो कि उसका बच्चा स्कूल तक सुरक्षित सड़क से जाए। असली नेता वही है जो चुनाव जीतने से पहले भी वार्ड में मौजूद था, और जीतने के बाद भी वहीं रहेगा।

महिलाओं के लिए आरक्षित वार्डों में भी यह बात उतनी ही अहम है। कई बार देखा गया है कि टिकट किसी महिला के नाम पर होता है, लेकिन काम कोई और करता है, फैसले कहीं और लिए जाते हैं। इस बार वोटरों को यह भी परखना होगा कि जिस महिला उम्मीदवार को वोट दे रहे हैं, वो खुद अपने वार्ड की समस्याओं को समझती है या सिर्फ एक नाम भर है। असली प्रतिनिधित्व वही है जहां आवाज़ और अधिकार दोनों उसी के हाथ में हों जिसे जनता ने चुना है।

यह चुनाव सिर्फ पांच साल के लिए एक कुर्सी तय नहीं करता, यह तय करता है कि अगले पांच साल हमारी गलियों में रोशनी रहेगी या अंधेरा, हमारे बच्चे साफ पानी पिएंगे या दूषित, हमारी सड़कें चलने लायक रहेंगी या गड्ढों से भरी। तो जब भी वोट डालने जाएं, झंडे और नारे भूल जाइए, बस इतना याद रखिए कि सामने खड़ा इंसान आपके वार्ड को अपना मानता है या नहीं। क्योंकि असली बदलाव पार्टी के दफ्तर से नहीं, आपकी गली के उस एक ईमानदार चेहरे से आता है, जिसे आप चुनते हैं।
हनुमानगढ़ की गलियां अब इंतज़ार में हैं, ऐसे प्रतिनिधियों की जो वादे कम करें, काम ज़्यादा करें, और जिनके लिए उनका वार्ड सिर्फ एक चुनावी नक्शा नहीं, बल्कि अपना घर हो।





