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हनुमानगढ़ नगरपरिषद चुनाव में नामांकन दाखिल करने के लिए अब सिर्फ दो दिन शेष हैं। शनिवार 29 अगस्त और सोमवार 31 अगस्त को ही प्रत्याशी नामांकन दाखिल कर सकेंगे। शुक्रवार 28 अगस्त को रक्षाबंधन का अवकाश होने के कारण नामांकन प्रक्रिया नहीं हो सकी। ऐसे में प्रत्याशियों को वास्तव में नामांकन के लिए महज तीन कार्यदिवस ही मिल रहे हैं। इस सीमित समय ने राजनीतिक दलों के दावेदारों की बेचैनी बढ़ा दी है।
निकाय चुनाव की घोषणा के बाद संभावित प्रत्याशियों ने अपने-अपने स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी थीं, लेकिन प्रमुख राजनीतिक दलों भाजपा और कांग्रेस ने अभी तक प्रत्याशियों की सूची जारी नहीं की है। ऐसे में पार्टी टिकट की उम्मीद लगाए बैठे दावेदार असमंजस में हैं। उन्हें यह भी स्पष्ट नहीं है कि टिकट मिलेगा या फिर निर्दलीय मैदान में उतरने का फैसला करना पड़ेगा। नामांकन के लिए समय पहले ही सीमित है। ऐसे में टिकट का इंतजार करने वाले दावेदारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे जनसंपर्क कब शुरू करें और चुनावी रणनीति को कब जमीन पर उतारें।

भाजपा और कांग्रेस के सामने भी टिकट वितरण आसान नहीं है। अधिकांश वार्डों में दो से चार तक गंभीर दावेदार बताए जा रहे हैं। टिकट अंततः किसी एक को ही मिलना है। ऐसे में टिकट से वंचित दावेदारों के बागी होकर निर्दलीय मैदान में उतरने का खतरा बना हुआ है।
यही वजह मानी जा रही है कि दोनों प्रमुख दल टिकटों की घोषणा में अंतिम समय तक रणनीति अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी नेतृत्व की कोशिश रहती है कि टिकट वितरण के बाद नाराजगी को संभाला जा सके और बगावत करने वालों की संख्या कम से कम रहे। यदि कोई दावेदार निर्दलीय नामांकन दाखिल कर देता है तो बाद में उसे मनाकर नाम वापस करवाना भी पार्टी नेताओं के लिए चुनौती बन जाता है।

हालांकि टिकट वितरण में देरी से पार्टियों को संभावित बगावत रोकने में मदद मिल सकती है, लेकिन इसका दूसरा पहलू दावेदारों के लिए नुकसानदेह है। इस बार निकाय चुनाव अचानक सामने आए हैं और चुनाव प्रक्रिया में भी काफी देरी हुई है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद चुनाव कराने का निर्णय होने के कारण अधिकांश संभावित उम्मीदवार पहले से पूरी तरह तैयार नहीं थे। कई दावेदारों ने चुनाव लड़ने का मन तो बना लिया, लेकिन टिकट तय नहीं होने के कारण उनका समय जनसंपर्क के बजाय पार्टी नेताओं से मुलाकात और टिकट की जुगाड़ में बीत रहा है। ऐसे में जिन उम्मीदवारों को अंतिम समय में टिकट मिलता है, उन्हें प्रचार और मतदाताओं तक पहुंचने के लिए बेहद कम समय मिलेगा।

इस पूरे चुनावी परिदृश्य में थर्ड फ्रंट के अगुवा विधायक गणेशराज बंसल फिलहाल बढ़त लेते नजर आ रहे हैं। उन्होंने अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है और उनकी टीम जनसंपर्क में भी सक्रिय हो चुकी है। यानी जहां भाजपा और कांग्रेस के दावेदार अभी टिकट के इंतजार में पार्टी कार्यालयों और नेताओं के चक्कर लगा रहे हैं, वहीं बंसल समर्थित प्रत्याशी सीधे मतदाताओं के बीच पहुंच रहे हैं। चुनाव में शुरुआती जनसंपर्क को महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रत्याशी जितनी जल्दी अपने वार्ड में सक्रिय होता है, उतना ही अधिक समय उसे मतदाताओं से संवाद और अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए मिलता है।

अब शनिवार और सोमवार के दो दिन ही नामांकन के लिए बचे हैं। ऐसे में अगले 48 घंटे भाजपा और कांग्रेस के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। टिकटों की घोषणा में और देरी हुई तो दावेदारों के पास जनसंपर्क और चुनावी तैयारी के लिए समय और कम हो जाएगा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टिकट वितरण में बगावत रोकने की रणनीति के अपने फायदे हैं, लेकिन इसका नुकसान भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एक तरफ पार्टियां नाराज दावेदारों को साधने में जुटेंगी, वहीं दूसरी ओर थर्ड फ्रंट पहले से मैदान में उतरकर बढ़त बनाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में इस निकाय चुनाव में टिकट की घोषणा कितनी देर से होती है, यह केवल उम्मीदवार तय नहीं करेगा, बल्कि चुनावी मुकाबले की दिशा भी प्रभावित कर सकता है।





