




गोपाल झा
जिले के ‘बड़े साहब’ की पहचान एक शांत, संतुलित और विवादों से दूर रहने वाले ऑफिसर की है। वे सुर्खियों से ज्यादा काम में विश्वास रखते हैं और जिले के लिए कुछ नया करने की मंशा भी रखते हैं। लेकिन प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक अलग ही चर्चा तैर रही है। सवाल यह है कि उनके काम का श्रेय आखिर किसे मिल रहा है? कहते हैं, ‘बड़े साहब’ का दिल बड़ा है और भरोसा उससे भी बड़ा। लेकिन यही भरोसा अब उनकी सबसे बड़ी परीक्षा बनता दिखाई दे रहा है। चर्चा है कि जिस ‘अफसर’ पर साहब सबसे ज्यादा मेहरबान हैं, वही पर्दे के पीछे उनकी छवि को ‘फीका’ करने में जुटा है। अच्छे कामों की रोशनी कहीं और मोड़ दी जाती है और कमियों की परछाई सीधे साहब तक पहुंच जाती है। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखता है, लेकिन अंदर की कहानी कुछ और ही बताई जा रही है। जानकार मुस्कुराते हुए कहते हैं कि प्रशासन में विरोधी से ज्यादा सावधानी अपने करीबी लोगों से बरतनी पड़ती है। क्योंकि बाहर वाला सामने से वार करता है, जबकि अंदरखाने व आत्मीयता से चाल चल देता है। ‘बड़े साहब’ की सादगी और सहजता की तारीफ तो हर कोई करता है, लेकिन यही सादगी कहीं उनके खिलाफ हथियार न बन जाए, यही चिंता उनके शुभचिंतकों को भी है। फिलहाल सत्ता और प्रशासन के गलियारों में एक ही फिल्मी पंक्ति खूब दोहराई जा रही है, ‘गैरों पे करम, अपनों पे सितम… ऐ जाने वफ़ा, ये ज़ुल्म न कर।’ अब देखना यह है कि ‘बड़े साहब’ इस इशारे को सिर्फ गीत समझते हैं या संदेश भी।
‘टाइगर’ की ‘सिंघम’ शैली, कब तक ?
हनुमानगढ़ पुलिस महकमे में नए ‘टाइगर’ की एंट्री के साथ ही गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। पुराने कप्तान की विदाई वैसे तो एक तबादला भर थी, लेकिन जिस तरह पुलिस मुख्यालय में उसके कारणों की पड़ताल हुई, उसने कई सवाल छोड़ दिए। आखिर में चर्चा वहीं जाकर थमी, ‘पॉलिटिकल प्रेशर’।
अब नजरें नए साहब पर हैं। शहर में चर्चा है कि नए ‘टाइगर’ का अंदाज बिल्कुल फिल्मों वाले ‘सिंघम’ जैसा है। कुर्सी पर बैठकर आदेश देने से ज्यादा उन्हें मैदान में उतरना पसंद है। वे पुलिसकर्मी की मोटरसाइकिल पर पीछे बैठकर सीधे कार्रवाई के लिए निकल पड़ते हैं। यही वजह है कि महकमे में हलचल है और बाहर भी। बीते कुछ दिनों में अवैध नशे के कारोबारियों पर जिस तेजी से कार्रवाई हुई है, उससे सप्लायरों के बीच बेचैनी साफ दिखाई दे रही है। जिन धंधों पर अब तक ‘नजर-ए-इनायत’ होने की चर्चा होती थी, वहां अचानक सख्ती बढ़ गई है। पुलिस की सक्रियता से यह संदेश जरूर गया है कि फिलहाल ढिलाई की गुंजाइश नहीं है। हालांकि एक सवाल बार-बार सुनाई दे रहा है, क्या यह सख्ती लंबे समय तक कायम रहेगी या फिर कुछ दिनों बाद सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आएगा? हनुमानगढ़ ने पहले भी कई तेज-तर्रार अधिकारियों की शुरुआत देखी है। इसलिए लोग फिलहाल नतीजा निकालने के बजाय इंतजार करना ही बेहतर समझ रहे हैं। फिलहाल इतना तय है कि नए कप्तान ने अपनी मौजूदगी का अहसास करा दिया है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि ‘सिंघम’ वाला यह अंदाज कितने दिनों तक बरकरार रहता है।
चाहत जाति विशेष के अफसर की
हनुमानगढ़ में इन दिनों पंचायतीराज विभाग के मुखिया की खाली कुर्सी चर्चा का सबसे बड़ा विषय बनी हुई है। कुर्सी खाली है, लेकिन उस पर बैठने वाले चेहरे से पहले उसकी जाति पर ज्यादा मंथन हो रहा है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि सत्तापक्ष के भीतर ही दो अलग-अलग राय बन गई हैं। एक खेमा जाति विशेष के अधिकारी की पैरवी कर रहा है, तो दूसरा किसी दूसरे सामाजिक समीकरण को साधने के पक्ष में है। बस, इसी खींचतान में फाइल मंजिल तक पहुंचने से पहले ही ‘सरकार’ के ‘दरबार’ में अटक गई बताई जा रही है।
इधर एक और दिलचस्प चर्चा भी जोर पकड़ रही है। कहा जा रहा है कि अगर राजनीतिक रस्साकशी ज्यादा लंबी चली तो इस बार जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की कुर्सी पर किसी आईएएस अधिकारी की तैनाती हो सकती है। अगर ऐसा हुआ तो जिला बनने के बाद पहली बार पंचायतीराज विभाग की कमान आईएएस अधिकारी के हाथ में होगी और जिले में एक साथ दो आईएएस अधिकारी सेवाएं देते दिखाई देंगे। हालांकि जानकार यह भी याद दिलाते हैं कि यह पहली बार नहीं है, जब इस कुर्सी पर आईएएस अधिकारी की मांग उठी हो। पहले भी कई बार ऐसी चर्चाएं चलीं, लेकिन मामला चर्चा से आगे नहीं बढ़ पाया। अब निगाहें स्वतंत्रता दिवस से पहले होने वाली संभावित प्रशासनिक फेरबदल पर टिक गई हैं। सवाल यही है कि आखिर कुर्सी पर किसकी ताजपोशी होगी, जातीय समीकरण जीतेंगे, राजनीतिक पसंद चलेगी या फिर प्रशासनिक अनुभव को प्राथमिकता मिलेगी? फिलहाल जवाब सत्ता के गलियारों में बंद फाइलों के बीच ही छिपा है।







