




एमएल शर्मा.
लीजिए जनाब, आखिरकार हनुमानगढ़ जिले में रावतसर नगरपालिका अध्यक्ष पद सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित हो ही गया। आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होते ही स्थानीय राजनीति के सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। लंबे समय से चुनावी तैयारियों में जुटे संभावित दावेदारों और उनके समर्थकों की सक्रियता बढ़ना स्वाभाविक है। अब आगामी नगरपालिका चुनाव में अध्यक्ष पद को लेकर मुकाबला खासा दिलचस्प होने के आसार नजर आ रहे हैं।
अध्यक्ष पद सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित होने से उन नेताओं के लिए भी राजनीतिक संभावनाओं के दरवाजे खुल गए हैं, जो आरक्षण की पिछली व्यवस्था के चलते सीधे तौर पर अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल नहीं हो पा रहे थे। ऐसे में आने वाले दिनों में बैठकों, मुलाकातों, जनसंपर्क और राजनीतिक समीकरण साधने का दौर तेज होने की संभावना है।
शहर की राजनीति में नीलम सहारण, भीमसिंह शेखावत, किरण मेघवाल, गौतम बंसल, विष्णु जोशी, गुरजीत बिडंग और जगदीश सोनी के नाम प्रमुख संभावित दावेदारों के रूप में चर्चा में हैं। वहीं सीडब्ल्यूसी अध्यक्ष जितेंद्र गोयल की संभावना भी मजबूत मानी जा रही है।
हालांकि अध्यक्ष पद के लिए अंतिम तस्वीर अभी साफ नहीं है। वार्डों के आरक्षण, चुनाव कार्यक्रम और राजनीतिक दलों की रणनीति सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कौन मैदान में उतरता है और किसे किस दल या राजनीतिक खेमे का समर्थन मिलता है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार इस बार अध्यक्ष पद का चुनाव केवल व्यक्तिगत दावेदारी तक सीमित रहने वाला नहीं है। अलग-अलग राजनीतिक खेमों के बीच बनने वाले गठजोड़ भी चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष व्यवस्था के अनुसार जिस तरह भी होगा, उसमें वार्ड स्तर के पार्षदों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है।

अध्यक्ष पद के लिए समर्थन जुटाने की कवायद चुनाव का निर्णायक पहलू बन सकती है। संभावित दावेदार अभी से अपने समर्थकों और प्रभावशाली लोगों के साथ संपर्क बढ़ाने में जुट सकते हैं। कौन कितने पार्षदों को अपने पक्ष में ला पाता है और अंतिम समय तक राजनीतिक समीकरणों को साधने में सफल रहता है, यह चुनाव की दिशा तय करेगा।
राजनीतिक सरगर्मी के बीच शहर के मूलभूत मुद्दे भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। विगत कार्यकाल में कस्बा उपेक्षा और राजनीतिक उठापटक का दंश झेलता रहा है। सफाई व्यवस्था, गंदे पानी और बरसाती पानी की निकासी, क्षतिग्रस्त सड़कों सहित कई मूलभूत समस्याएं आज भी लोगों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई हैं।

ऐसे में चुनावी दंगल में उतरने वाले संभावित ‘हुक्मरानों’ के सामने केवल अध्यक्ष की कुर्सी हासिल करने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि जनता के सवालों का जवाब देने की भी बड़ी जिम्मेदारी होगी। शहरवासी अब यह पूछ सकते हैं कि पिछले कार्यकाल में जिन समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, उनके लिए जिम्मेदार कौन है और आगामी कार्यकाल में उनका समाधान किस तरह किया जाएगा। आरक्षण स्पष्ट होने के बाद राजनीतिक दावेदारों के लिए भले ही संभावनाओं का नया अध्याय खुल गया हो, लेकिन जनता का मूड भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभाएगा। केवल बड़े-बड़े वादों और चुनावी जुमलों के सहारे मतदाताओं को साधना आसान नहीं होगा। शहर को बेहतर सफाई, सुचारु जल निकासी, अच्छी सड़कों और मूलभूत सुविधाओं की जरूरत है।

यही कारण है कि इस बार मतदाता दावेदारों से उनके राजनीतिक परिचय से अधिक उनके विजन और काम की योजना पर सवाल कर सकते हैं। आखिरकार चुनावी मौसम में वादे तो हर बार होते हैं, लेकिन जनता अब परिणाम चाहती है।
फिलहाल सामान्य वर्ग के लिए अध्यक्ष पद आरक्षित होने के साथ ही नगरपालिका की सियासत ने करवट ले ली है। संभावित दावेदारों के बीच जोड़-तोड़, संपर्क और समर्थन जुटाने की कवायद आने वाले दिनों में और तेज होने की उम्मीद है। किसके पक्ष में समीकरण बनते हैं, कौन मजबूत टीम खड़ी करता है और कौन पार्षदों का भरोसा जीतता है, इन सवालों के जवाब चुनावी तस्वीर साफ होने के साथ सामने आएंगे। क्योंकि आखिर ये पब्लिक है भई… सब जानती है।





