




गोपाल झा.
हनुमानगढ़ नगरपरिषद में सामान्य महिला वर्ग के लिए सभापति पद आरक्षित होते ही शहर की सियासी गतिविधियां तेज हो गई है। प्रस्तावित नगरपरिषद चुनाव का बिगुल बजना बाकी है, लेकिन सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि आखिर नगरपरिषद की कुर्सी पर इस बार कौन-सा महिला चेहरा काबिज होगा? संभावित दावेदारों के नामों पर कयासबाजी शुरू हो चुकी है। टिकट की दौड़ से लेकर पार्षदों के समर्थन और चुनाव बाद के समीकरणों तक, हर तरफ इसी कुर्सी का हिसाब-किताब लगाया जा रहा है।
हालांकि भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, यह चुनाव नतीजे ही बताएंगे, लेकिन हनुमानगढ़ नगरपरिषद का इतिहास खंगालें तो महिला सभापतियों का सफर अपने आप में कम दिलचस्प नहीं रहा। बल्कि यह कहना गलत नहीं होगा कि महिला आरक्षण ने कई बार स्थानीय राजनीति की तस्वीर बदली और कुछ नेताओं के सियासी सफर को नई उड़ान भी दी।
1994 से अब तक के नगर निकाय चुनावों के इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 1999 वह साल था, जब पहली बार चेयरमैन पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित हुआ। चुनाव परिणाम आए तो कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। इसके बाद शुरू हुआ चेयरमैन की कुर्सी को लेकर जोड़-तोड़ और अंदरखाने की सियासत का दौर।

उस समय संतोष बंसल, नीरू बंसल, सुषमा बैद और संगीता मिढ़ा प्रमुख दावेदारों में थीं। इन दावेदारियों के पीछे उनके परिवारों की राजनीतिक सक्रियता भी अहम थी। संतोष बंसल के पति गणेशराज बंसल, नीरू बंसल के ससुर अमीचंद बंसल, सुषमा बैद के पति राजेंद्र बैद और संगीता मिढ़ा के पति सगन मिढ़ा अपने-अपने स्तर पर सियासी बिसात बिछा रहे थे।
जंक्शन के औद्योगिक क्षेत्र स्थित आरएल इंडस्ट्रीज में तत्कालीन वरिष्ठ कांग्रेस नेता चौधरी आत्माराम की मौजूदगी में दावेदारों के नामों की लॉटरी निकाली गई। इस लॉटरी में किस्मत ने संगीता मिढ़ा का साथ दिया और वे चेयरमैन बन गईं।

खास बात यह थी कि संगीता मिढ़ा का सक्रिय राजनीति से कोई वास्ता नहीं था। वे एक कुशल गृहिणी थीं। लेकिन आरक्षण की बदली हुई तस्वीर ने उन्हें सीधे नगरपरिषद की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंचा दिया। यहीं से कहानी में असली ट्विस्ट आया।
संगीता मिढ़ा के चेयरमैन बनने के बाद गणेशराज बंसल ने इसे अपनी हार के तौर पर लिया। उन्होंने पार्षदों से संपर्क बनाए रखा और सही मौके का इंतजार किया। इसके बाद अविश्वास प्रस्ताव और न्यायालय तक पहुंची लड़ाई ने नगरपरिषद की सियासत में खूब उबाल पैदा किया।

आखिरकार संगीता मिढ़ा को पद छोड़ना पड़ा और गणेशराज बंसल अपनी पत्नी संतोष बंसल को चेयरमैन बनाने में कामयाब हो गए। इस सियासी उठापटक के बीच कुछ समय के लिए गिरदावरी देवी भोबिया को भी चेयरमैन बनने का अवसर मिला। गिरदावरी देवी भोबिया के पति तुलसीराब भोबिया भी पार्षद रहे और तत्कालीन मंत्री डॉ. रामप्रताप के करीबी भी।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि नगरपरिषद की इसी सियासत ने गणेशराज बंसल के राजनीतिक सफर को नई दिशा दी। 1999 के बाद उनका सियासी कद बढ़ा और आगे चलकर वे विधानसभा तक पहुंचे। यानी स्थानीय निकाय की एक कुर्सी किसी नेता के राजनीतिक सफर का लॉन्चिंग पैड भी बन सकती है।

इसके बाद वर्ष 2009 में सभापति की कुर्सी ओबीसी महिला के लिए आरक्षित हुई। इस चुनाव की खासियत यह थी कि पहली बार सभापति का चुनाव सीधे आम जनता ने किया। भाजपा प्रत्याशी सुरेंद्र कौर ने कांग्रेस की भानु भादू और निर्दलीय नर्बदा देवी तंवर को हराकर जीत दर्ज की। सुरेंद्र कौर वरिष्ठ नेता भाई जसपाल सिंह की धर्मपत्नी हैं। वहीं भानु भादू के ससुर घनश्याम भादू टाउन के प्रमुख अनाज व्यापारियों में रहे हैं, जबकि नर्बदा देवी तंवर के पति राज कुमार तंवर पहले पालिकाध्यक्ष रह चुके थे। यानी मुकाबला सिर्फ तीन महिला चेहरों का नहीं था, बल्कि इनके पीछे खड़े राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव का भी था।
1994 से अब तक नगरपरिषद के इतिहास में महज चार महिलाओं को चेयरमैन या सभापति की कुर्सी पर बैठने का मौका मिला है। अब सामान्य महिला वर्ग के लिए सीट आरक्षित होने के बाद पांचवीं महिला सभापति की तलाश शुरू हो गई है।
यहीं से असली सियासी खेल शुरू होता है। टिकट किसे मिलेगा? कौन मजबूत वार्ड से मैदान में उतरेगा? किस महिला के पीछे पार्टी का संगठन खड़ा होगा? और सबसे अहम, चुनाव के बाद कितने पार्षद किसके पाले में जाएंगे?

हनुमानगढ़ की सियासत का पुराना मिजाज बताता है कि सिर्फ चुनाव जीतना काफी नहीं होता, असली इम्तिहान उसके बाद शुरू होता है। 1999 का घटनाक्रम इसकी नजीर है। लिहाजा इस बार भी सभापति पद की दावेदारी में महिला चेहरा सामने होगा, लेकिन उसके पीछे खड़ी सियासी ताकत ही बाजी पलटने में अहम किरदार निभा सकती है।
फिलहाल दावेदारों के नामों को लेकर कयासों का बाजार गर्म है। कई चेहरे पर्दे के पीछे से अपनी बिसात बिछाने में जुटे हैं। चुनाव की तारीख नजदीक आते-आते यह तस्वीर और साफ होगी। इतना जरूर तय है कि इस बार हनुमानगढ़ नगरपरिषद को पांचवीं महिला सभापति मिलने जा रही है, अब सवाल सिर्फ इतना है कि वह चेहरा कौन होगा और उसके पीछे कौन-सी सियासी ताकत खड़ी होगी?





