



डॉ. एमपी शर्मा
डॉ. बिधान चंद्र रॉय भारतीय इतिहास के उन विरले व्यक्तित्वों में से थे, जिनके लिए सेवा केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन का अनुशासन थी। वे महान चिकित्सक, प्रख्यात शिक्षाविद्, समाजसेवी और कुशल प्रशासक थे। चिकित्सा उनके लिए पेशा नहीं, तपस्या थी। सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा उनके व्यक्तित्व की पहचान रही। संयोग देखिए कि उनका जन्म और महाप्रयाण, दोनों 1 जुलाई को हुआ; मानो जीवन ने स्वयं पूर्ण विराम उसी दिन चुना हो।

डॉ. रॉय का जन्म 1 जुलाई 1882 को पटना में हुआ, जो उस समय बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। पिता प्रकाश चंद्र रॉय अनुशासनप्रिय थे और माता अघोरकामिनी देवी संस्कारों की धुरी। घर का वातावरण सादा था, पर सोच ऊँची। प्रारम्भिक शिक्षा पटना में हुई। आगे चलकर उन्होंने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा की पढ़ाई की। मेहनत उनकी आदत थी, और सादगी उनकी शान। यही कारण रहा कि वे भीड़ में भी अलग दिखे, बिना शोर किए।

उच्च चिकित्सा शिक्षा के लिए वे इंग्लैंड गए। सेंट बार्थाेलोम्यूज़ अस्पताल, लंदन में अध्ययन करते हुए उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय प्रतिभा किसी से कम नहीं। सीमित साधनों और कठिन प्रतिस्पर्धा के बीच उन्होंने अल्प समय में दो प्रतिष्ठित उपाधियाँ, चिकित्सक महाविद्यालय की सदस्यता और शल्यचिकित्सक महाविद्यालय की फैलोशिप, प्राप्त कीं। यह केवल डिग्री नहीं थीं, बल्कि परिश्रम की मुहर थीं। लौटकर भारत आए तो ज्ञान को कमाने नहीं, बाँटने का संकल्प लेकर।

डॉ. रॉय एक कुशल चिकित्सक ही नहीं, प्रेरक शिक्षक भी थे। उन्होंने चिकित्सा शिक्षा को सुदृढ़ करने और अस्पतालों के विकास में अग्रणी भूमिका निभाई। उनका मानना था कि रोगी के बिस्तर के पास खड़ा चिकित्सक ही सच्चा उपासक होता है। फीस से अधिक उन्हें विश्वास प्रिय था। वे कहते थे, यदि रोगी ने भरोसा किया, तो आधी बीमारी वहीं हार जाती है। चिकित्सा को उन्होंने मानवीय करुणा से जोड़ा और सेवा को सर्वाेच्च मूल्य बनाया।

23 जनवरी 1948 को वे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने और 1 जुलाई 1962 तक इस दायित्व पर रहे। यह कालखंड विभाजन के बाद की कठिनाइयों से भरा था। शरणार्थियों का पुनर्वास, प्रशासन का पुनर्गठन और भविष्य की रूपरेखा। डॉ. रॉय ने स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग और नगर-नियोजन पर समान बल दिया। दुर्गापुर, कल्याणी और बिधाननगर जैसे आधुनिक नगरों का विकास उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण है। उन्होंने योजनाएँ काग़ज़ पर नहीं छोड़ीं, ज़मीन पर उतारीं, यही पुरानी परंपरा की सच्ची कसौटी है।

1961 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके पद का नहीं, उनके मूल्यों का था। भारत में प्रतिवर्ष 1 जुलाई को राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस मनाया जाता है, जो उनकी जयंती और पुण्यतिथि दोनों का प्रतीक है। यह दिन स्मरण कराता है कि चिकित्सा बाजार नहीं, मिशन है। उनका प्रेरक संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, ‘चिकित्सक का सबसे बड़ा धर्म रोगी की निस्वार्थ सेवा और मानवता की रक्षा है।
डॉ. बिधान चंद्र रॉय का जीवन बताता है कि सादगी में भी शिखर छूए जा सकते हैं, बशर्ते नीयत साफ़ हो और श्रम अडिग। आज के शोरगुल में उनकी खामोश दृढ़ता एक सीख हैकृकाम बोलना चाहिए, विज्ञापन नहीं। यही परंपरा है, और परंपरा ही टिकती है।
-लेखक कुशल सर्जन और आईएमए राजस्थान के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष हैं






