



डॉ. अर्चना गोदारा
मान लीजिए किसी को तीन दिन से तेज़ बुखार है। घर वाले तुरंत चिंतित हो जाएंगे। कोई तापमान नापेगा, कोई डॉक्टर का नंबर ढूँढ़ेगा, कोई दवा लाने दौड़ पड़ेगा। अगर डॉक्टर कुछ जाँच लिख दे, तो बिना ज़्यादा सवाल किए जाँच भी करवा ली जाएगी। क्योंकि हम जानते हैं कि शरीर की बीमारी को नज़रअंदाज़ करना ठीक नहीं।
लेकिन ज़रा एक दूसरी स्थिति की कल्पना कीजिए। जब वही व्यक्ति पिछले कई महीनों से ठीक से सो नहीं पा रहा। छोटी-छोटी बातों पर घबरा जाता है। लोगों से मिलना बंद कर देता है। बात-बात पर गुस्सा करता है। बिना वजह चिड़चिड़ा हो जाता है। कभी-कभी उसे लगता है कि जीवन में कुछ अच्छा नहीं बचा। वह अपने भीतर की उलझन बताने की कोशिश करता है, लेकिन सामने से जवाब मिलता है-‘क्या हो गया’, ‘इतना मत सोचो’, ‘ष्थोड़ा घूम-फिर लो’, ‘सबके जीवन में तनाव होता है’, ‘तुम्हें क्या कमी है?’ और बात वहीं खत्म कर दी जाती है।
यही वह जगह है जहाँ हम सबसे बड़ी गलती कर बैठते हैं। शरीर की तकलीफ़ को हम बीमारी मान लेते हैं, लेकिन मन की तकलीफ़ को आदत, कमजोरी या ज़्यादा सोचने का नाम दे देते हैं। आज का समय तेज़ रफ़्तार का समय है। प्रतियोगिता बढ़ी है, अपेक्षाएँ बढ़ी हैं, आर्थिक दबाव हैं, रिश्तों में संवाद कम हुआ है और अकेलापन बढ़ा है। सबसे बड़ी बात यह है कि किसी के पास समय ही नहीं है। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है। लोग मुस्कुराते हैं, काम पर जाते हैं, तस्वीरें साझा करते हैं, सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं, व्हाट्सऐप पर शानदार फोटो शेयर करते हैं। लेकिन भीतर से टूट रहे होते हैं। एंजायटी, डिप्रेशन और लगातार तनाव अब केवल किताबों के शब्द नहीं रहे, बल्कि हमारे समाज की वास्तविकता बन चुके हैं।

इसका एक ताज़ा उदाहरण हाल ही (15-6-26 ) में सामने आया, जब टीवी अभिनेत्री ’संचिता उगले’ की आत्महत्या की खबर ने सभी को स्तब्ध कर दिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि घटना से कुछ घंटे पहले ही उन्होंने सोशल मीडिया पर मुस्कुराते हुए, गाने पर थिरकते हुए अपना एक वीडियो साझा किया था। उसे देखकर शायद ही कोई अंदाज़ा लगा सकता था कि उनके भीतर कोई गहरी उथल-पुथल चल रही होगी। यह घटना हमें एक बार फिर याद दिलाती है कि हर मुस्कुराता चेहरा वास्तव में खुश हो, यह ज़रूरी नहीं। कई लोग अपनी तकलीफ़ों को भीतर ही भीतर समेटे रहते हैं और दुनिया के सामने सामान्य बने रहने की कोशिश करते हैं। इसलिए किसी के बाहरी व्यवहार को देखकर उसके मानसिक स्वास्थ्य का अनुमान लगा लेना उचित नहीं है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में करोड़ों लोग चिंता और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। भारत में भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। चिंताजनक बात यह है कि इनमें से अधिकांश लोग समय पर मदद नहीं लेते। कारण बीमारी नहीं, बल्कि उससे जुड़ी झिझक है। उन्हें डर होता है कि लोग क्या कहेंगे। कहीं उन्हें ष्कमज़ोरष् या ष्पागलष् न समझ लिया जाए।
विडंबना यह है कि हम अपने मन को सबसे कम महत्व देते हैं, जबकि वही हमारे पूरे जीवन को प्रभावित करता है। हम छुट्टियों पर जाने में, महंगे मोबाइल खरीदने में, होटल में खाना खाने में, फैशन और दिखावे पर खर्च करने में संकोच नहीं करते। लेकिन जब कोई कहता है कि किसी काउंसलर या मनोवैज्ञानिक से मिल लेना चाहिए, तो अचानक हमें उनकी फीस ज़्यादा लगने लगती है। हम सोचते हैं कि ‘इतने पैसे क्यों खर्च करें?’ जबकि सच यह है कि मानसिक स्वास्थ्य पर किया गया खर्च खर्च नहीं, बल्कि अपने जीवन, रिश्तों और भविष्य में किया गया निवेश है।

रीमा की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। अच्छी नौकरी, अच्छा परिवार और बाहर से बिल्कुल व्यवस्थित जीवन। लेकिन भीतर बेचौनी बढ़ती जा रही थी। उसे लगता था कि शायद यह सब अपने आप ठीक हो जाएगा। उसने खुद को व्यस्त रखने की कोशिश की, घूमने गई, दोस्तों से मिली, लेकिन राहत नहीं मिली। अंत में उसने काउंसलर से मिलने का निर्णय लिया। कुछ सत्रों के बाद उसे समझ आया कि मदद माँगना कमजोरी नहीं है। सही समय पर मिला सहयोग उसके जीवन को फिर से संतुलन की ओर ले आया। लेकिन ऐसा करने वाले लोग बहुत कम है या ना के बराबर है।

हमारे समाज को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है। यदि कोई व्यक्ति बार-बार कह रहा है कि वह परेशान है, उसे घबराहट होती है, उसका किसी काम में मन नहीं लगता या वह लगातार उदास रहता है, तो उसे सलाह देने से पहले उसकी बात सुनना ज़रूरी है। कई बार व्यक्ति को समाधान से पहले संवेदना की आवश्यकता होती है। उसे यह भरोसा चाहिए होता है कि उसकी परेशानी को गंभीरता से लिया जा रहा है। प्रख्यात लिखिका महादेवी वर्मा ने लिखा था कि दुःख मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। शायद यही संवेदना आज सबसे अधिक आवश्यक है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि जैसे शरीर बीमार पड़ सकता है, वैसे ही मन भी थक सकता है, बीमार हो सकता है। और जैसे बुखार होने पर डॉक्टर के पास जाना सामान्य बात है, वैसे ही मानसिक परेशानी होने पर काउंसलर या विशेषज्ञ से मिलना भी उतना ही सामान्य होना चाहिए।
अब समय आ गया है कि हम ष्सब ठीक हो जाएगाष् कहकर बात टालने के बजाय यह पूछें-‘क्या तुम सचमुच ठीक हो?’ और यदि उत्तर ‘नहीं’ हो, तो बिना झिझक मदद लेने और मदद दिलाने का साहस दिखाएँ। क्योंकि स्वस्थ जीवन का अर्थ केवल स्वस्थ शरीर नहीं, बल्कि एक शांत, सुरक्षित और स्वस्थ मन भी है।
‘चेहरों की मुस्कान हर बार ख़ुशी का पता नहीं देती,
बाहर की रोशनी भीतर के अँधेरों को मिटा नहीं देती।
‘लोग क्या कहेंगे’ की आवाज़ से ऊपर उठना सीखिए,
वक़्त पर लिया गया उपचार कई बुझती ज़िंदगियों को जीना सिखा देता है।;
-लेखिका राजकीय एनएमपीजी कॉलेज में सहायक आचार्य हैं






