



डॉ. अर्चना गोदारा.
किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी ऊंची इमारतों, बढ़ती आय या आधुनिक तकनीक से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वहां रिश्तों में सम्मान कितना है, संवाद कितना है और असहमति को स्वीकार करने का संस्कार कितना है। इस तरह का समाज हमें गढ़ना होगा, जिसके लिए सामूहिक प्रयासों की दरकार रहेगी।
हाल के वर्षों में राजा रघुवंशी, सौरभ राजपूत जैसे चर्चित मामलों ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इन मामलों में अंतिम निर्णय न्यायालय करेगा, लेकिन इन घटनाओं ने समाज के सामने एक ऐसा प्रश्न खड़ा कर दिया है, जिसे केवल कानून के सहारे नहीं समझा जा सकता। क्या हमारे रिश्तों की बुनियाद पहले से अधिक कमजोर होती जा रही है? क्या हम ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ संवाद की जगह संदेह, सहमति की जगह दबाव और धैर्य की जगह आवेग ने ले ली है? विडंबना यह है कि रिश्तों में हिंसा भारत के लिए कोई नई घटना नहीं है। दशकों तक दहेज, घरेलू प्रताड़ना और तथाकथित पारिवारिक सम्मान के नाम पर महिलाओं की हत्या या उन्हें आत्महत्या के लिए विवश करने की घटनाएँ समाज का कड़वा सच रही हैं। उस समय भी वे घटनाएँ उतनी ही भयावह थीं, किंतु उन्हें अक्सर परिवार की चारदीवारी का मामला मानकर व्यापक सामाजिक विमर्श का विषय नहीं बनाया गया। आज जब कुछ मामलों में महिलाएँ भी पति या मंगेतर की हत्या के आरोपों में सामने आती हैं, तो पूरा समाज स्तब्ध हो जाता है। यह स्तब्धता किसी एक वर्ग के अपराध की नहीं, बल्कि इस बात की है कि हमारे पारिवारिक रिश्तों का चरित्र तेजी से बदल रहा है। इसलिए अब समय केवल अपराधी खोजने का नहीं, बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों को समझने का है जो ऐसे अपराधों की जमीन तैयार करती हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2023 के आँकड़े बताते हैं कि देश में महिलाओं के विरुद्ध 4.48 लाख से अधिक अपराध दर्ज हुए, जिनमें लगभग 30 प्रतिशत मामले पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता से जुड़े थे। यह आँकड़ा बताता है कि परिवारों के भीतर तनाव कोई नई समस्या नहीं है। दूसरी ओर, हाल के चर्चित हत्याकांड यह संकेत देते हैं कि रिश्तों में हिंसा अब केवल एक दिशा तक सीमित नहीं रही।

समाजशास्त्र की दृष्टि से यह केवल अपराध का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का संकेत है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम का मानना था कि अपराध केवल व्यक्ति की विफलता नहीं, बल्कि समाज की संरचना में मौजूद असंतुलन का भी दर्पण होता है। जब सामाजिक मूल्य बदल रहे हों, पुरानी मान्यताएँ टूट रही हों और नई मान्यताएँ अभी पूरी तरह स्थापित न हुई हों, तब सामाजिक तनाव बढ़ना स्वाभाविक है। आज भारत भी कुछ ऐसी ही संक्रमण अवस्था से गुजर रहा है।

एक ओर युवा पीढ़ी शिक्षा, रोजगार और जीवनसाथी के चयन में स्वतंत्रता चाहती है, वहीं दूसरी ओर अनेक परिवार अब भी विवाह को व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न मानते हैं। ऐसे में कई युवक-युवतियाँ अपनी वास्तविक इच्छा व्यक्त ही नहीं कर पाते। बाहर से रिश्ता सामान्य दिखाई देता है, किंतु भीतर असहमति, घुटन, अविश्वास और मानसिक दबाव लगातार बढ़ता रहता है।

समस्या का दूसरा पहलू हमारे बदलते पारिवारिक जीवन में छिपा है। आज अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा, महँगे विद्यालय, कोचिंग, मोबाइल फोन और बेहतर आर्थिक सुविधाएँ देने में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते। लेकिन अनजाने में वे सबसे महत्वपूर्ण निवेश-संवाद -से दूर होते जा रहे हैं। घरों में साथ बैठकर बातचीत करने का समय घट रहा है। बच्चों को सफल करियर बनाना सिखाया जा रहा है, लेकिन असफलता को स्वीकार करना, मतभेदों को संभालना, रिश्तों में धैर्य रखना और सम्मानपूर्वक अलग होना बहुत कम सिखाया जाता है। डिजिटल युग ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। सोशल मीडिया ने रिश्तों की ऐसी कृत्रिम दुनिया बना दी है, जहाँ सब कुछ आकर्षक, रोमांचक और परिपूर्ण दिखाई देता है। वास्तविक जीवन जब इस कल्पना से मेल नहीं खाता, तब निराशा, असुरक्षा और क्रोध जन्म लेते हैं। मनोवैज्ञानिक लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि संवादहीनता, भावनात्मक अकेलापन और अनियंत्रित आवेग, विशेषकर युवाओं में, संबंधों को गंभीर संकट की ओर धकेल सकते हैं। इसलिए हर अपराध के पीछे केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परतों को भी समझना आवश्यक है।

यह भी उतना ही आवश्यक है कि हम किसी एक घटना के आधार पर पूरे पुरुष समाज या पूरे महिला समाज के बारे में निष्कर्ष न निकालें। अपराध का कोई लिंग नहीं होता; उसका उत्तरदायित्व केवल अपराधी का होता है। लेकिन समाज का उत्तरदायित्व यह अवश्य है कि वह ऐसी परिस्थितियाँ बनने ही न दे, जहाँ रिश्ते हिंसा में बदल जाएँ। विवाह को सामाजिक दबाव नहीं, बल्कि दोनों पक्षों की स्वतंत्र और स्पष्ट सहमति का निर्णय माना जाए। बच्चों को यह विश्वास मिले कि वे बिना भय के अपनी बात कह सकते हैं। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भावनात्मक शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और संबंधों की समझ को भी उतना ही महत्व मिले, जितना अंक और रोजगार को दिया जाता है। आखिरकार किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों, बढ़ती आय या आधुनिक तकनीक से नहीं होती; उसकी पहचान इस बात से होती है कि वहाँ रिश्तों में सम्मान कितना है, संवाद कितना है और असहमति को स्वीकार करने का संस्कार कितना है। यदि हम इस मूल प्रश्न को समझने में सफल हो गए, तो संभव है कि भविष्य में अख़बारों की सुर्खियाँ किसी और दर्दनाक हत्याकांड की नहीं, बल्कि ऐसे समाज की हों जहाँ रिश्ते भय से नहीं, विश्वास से जिए जाते हों।




