



गोपाल झा
किसी नगर का नाम उसके स्वभाव, संस्कार और सामूहिक चेतना का दर्पण होता है। हनुमानगढ़ का नाम स्वयं महावीर हनुमान की स्मृति से जुड़ा है। वे हनुमान, जिनके पास अपार शक्ति थी, पर उस शक्ति में अहंकार का लेशमात्र भी नहीं था। उन्हें अपनी सामर्थ्य का स्मरण भी दूसरों को कराना पड़ता था। शायद यही स्वभाव इस जिले की मिट्टी ने भी आत्मसात किया है। यहां के लोग परिश्रमी हैं, सामर्थ्यवान हैं, किंतु उतने ही विनम्र और शांत भी। दुर्भाग्य यह है कि उनकी विनम्रता को कई बार उनकी कमजोरी समझ लिया जाता है।
यह दोष जनता का नहीं, बल्कि उन लोगों का है जो इस माटी के संस्कारों को समझने में असफल रहे। लोकतंत्र में सज्जनता तभी प्रभावी होती है, जब उसके साथ सजगता भी जुड़ी हो। अधिकारों के प्रति मौन समाज अक्सर अपेक्षित विकास से वंचित रह जाता है। इसलिए आज आवश्यकता विरोध की नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक चेतना की है।
जिला बनने के बाद हनुमानगढ़ ने विकास की अनेक सीढ़ियाँ चढ़ी हैं। मेडिकल कॉलेज, सरकारी और निजी महाविद्यालयों का विस्तार, निजी विश्वविद्यालय और प्रशासनिक सुविधाओं का विकास इसकी उपलब्धियाँ हैं। यह परिवर्तन स्वागतयोग्य है। किंतु विकास का सही आकलन केवल इमारतों से नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन में आए वास्तविक परिवर्तन से होता है।

वेदना इस बात की है कि जिस जिले में कभी औद्योगिक गतिविधियों की रौनक थी, वहाँ आज सन्नाटा पसरा दिखाई देता है। स्पिनिंग मिल का बंद होना केवल एक उद्योग का बंद होना नहीं था, बल्कि हजारों परिवारों की आशाओं का मुरझा जाना था। छोटे निवेशकों के लिए भी अनुकूल वातावरण नहीं बन पाया। परिणामस्वरूप रोजगार के अवसर सिकुड़ते गए और युवाओं का पलायन बढ़ा। बेरोजगारी केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक विकृतियों की भी जननी होती है।

कृषि प्रधान जिले के रूप में हनुमानगढ़ की पहचान पूरे प्रदेश में है। यहाँ की धरती अन्न उगलती है, किसान परिश्रम की नई परिभाषा लिखते हैं, फिर भी कृषि विश्वविद्यालय का अभाव आज भी खलता है। नकली बीज और खाद, सिंचाई जल की अनिश्चितता तथा उपज के विपणन की समस्याएँ किसानों के संघर्ष को और कठिन बना देती हैं। यदि कृषि को वैज्ञानिक अनुसंधान और स्थानीय नवाचार का सहारा मिले, तो यह जिला कृषि समृद्धि का राष्ट्रीय मॉडल बन सकता है।

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी गंभीर चिंतन की अपेक्षा रखती है। मेडिकल कॉलेज होने के बावजूद गंभीर रोगों के उपचार के लिए लोगों को श्रीगंगानगर, भटिंडा, लुधियाना और जयपुर की ओर देखना पड़ता है। जिला अस्पताल तभी सार्थक होगा, जब वह प्रत्येक प्रमुख बीमारी के उपचार में सक्षम बने। स्वास्थ्य सुविधा किसी भी विकसित समाज की पहली पहचान होती है।

परिवहन और शहरी विकास के क्षेत्र में भी अपेक्षाएँ अधूरी हैं। एयरपोर्ट की माँग वर्षों पुरानी है। रेलवे सुविधाओं का विस्तार अपेक्षित गति से नहीं हो पाया। नगर विकास न्यास जैसी संस्थागत व्यवस्था समय की आवश्यकता बन चुकी है। सीमावर्ती जिले के रूप में हनुमानगढ़ का महत्व लगातार बढ़ रहा है, इसलिए आधारभूत ढाँचे का विस्तार भी उसी गति से होना चाहिए।
किसी भी जिले का भविष्य केवल सरकारें नहीं लिखतीं। जनप्रतिनिधियों की दूरदृष्टि, प्रशासन की संवेदनशीलता और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी मिलकर विकास का इतिहास रचती है। जब समाज उदासीन हो जाता है, तब अव्यवस्थाएँ धीरे-धीरे व्यवस्था का स्वरूप धारण कर लेती हैं।

हनुमानगढ़ के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है। उपजाऊ भूमि, मेहनतकश किसान, प्रतिभाशाली युवा, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सौहार्द इसकी सबसे बड़ी पूँजी हैं। आवश्यकता केवल इन्हें एक साझा विकास-दृष्टि से जोड़ने की है। यदि जनप्रतिनिधि संकल्पित हों, प्रशासन जवाबदेह बने और नागरिक सजग रहें, तो यह जिला केवल राजस्थान ही नहीं, पूरे देश के लिए विकास का आदर्श बन सकता है।
अब समय केवल अपेक्षाएँ व्यक्त करने का नहीं, बल्कि सामूहिक दायित्व निभाने का है। हनुमानगढ़ का मौन उसकी कमजोरी नहीं, उसकी गरिमा का प्रतीक है। आवश्यकता है कि यह मौन जनचेतना में परिवर्तित हो, अपेक्षाएँ संकल्प बनें और संकल्प उपलब्धियों का इतिहास रचें। जब समाज अपने अधिकारों के साथ अपने दायित्वों का भी निर्वहन करता है, तभी विकास कागज़ों से निकलकर जनजीवन की वास्तविकता बनता है। यही हनुमानगढ़ की पहचान होनी चाहिए, और यही उसके उज्ज्वल भविष्य का पथ भी।




