



डॉ. अर्चना गोदारा
‘वो सुबह कभी तो आएगी…’, यह गीत केवल उम्मीद का प्रतीक नहीं, बल्कि हर युग के बदलाव का भी संकेत है। लेकिन आज सवाल यह है कि जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) भविष्य की सुबह लेकर आएगी, तो क्या उसकी रोशनी सब तक समान रूप से पहुँचेगी? या फिर समाज दो हिस्सों में बँट जाएगा। एक वह है जो एआई के सहारे आगे बढ़ेगा और दूसरा वह है जो अवसरों की दौड़ में पीछे छूट जाएगा। यही है एआई की अदृश्य खाई।
इतिहास बताता है कि हर तकनीकी क्रांति अपने साथ नई संभावनाएँ लेकर आई है, लेकिन इसके साथ ही उसने नई असमानताएँ भी पैदा की हैं। औद्योगिक क्रांति ने मशीनों के मालिक और श्रमिक के बीच अंतर बढ़ाया, डिजिटल क्रांति ने इंटरनेट से जुड़े और उससे वंचित लोगों के बीच दूरी पैदा की। अब एआई एक ऐसे दौर की शुरुआत कर रहा है, जहाँ विभाजन धन से पहले ज्ञान और तकनीकी दक्षता के आधार पर तय होगा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने विश्लेषण में संकेत दिया है कि एआई दुनिया भर में उत्पादकता बढ़ा सकता है, लेकिन यदि इसके लाभ समान रूप से नहीं पहुँचे, तो आय और अवसरों की असमानता भी बढ़ सकती है। दूसरी ओर यूनेस्को ने एआई के नैतिक उपयोग पर बल देते हुए चेताया है कि शिक्षा और डिजिटल संसाधनों तक समान पहुँच के बिना यह तकनीक सामाजिक विषमता को गहरा कर सकती है। यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चुनौती भी है।

भारत इस परिवर्तन के केंद्र में खड़ा है। एक ओर देश एआई प्रतिभा और स्टार्टअप के क्षेत्र में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर लाखों लोग ऐसे हैं जिन्हें अभी तक यह नहीं मालूम कि एआई उनकी पढ़ाई उनकी खेती, छोटे व्यवसाय या रोज़गार में किस प्रकार सहायक हो सकता है। यही असमान जानकारी भविष्य की सबसे बड़ी असमानता बन सकती है। इस परिवर्तन का सबसे गहरा प्रभाव मनोविज्ञान पर पड़ता है। मनुष्य केवल आय से नहीं, अपनी उपयोगिता की भावना से भी जीता है। जब उसे लगे कि मशीन उससे अधिक तेज़, अधिक सटीक और अधिक उपयोगी है, तो उसके भीतर असुरक्षा, आत्म-संदेह और भविष्य का भय जन्म लेने लगता है। मनोवैज्ञानिक इसे ‘तकनीकी असुरक्षा’ का एक रूप मानते हैं। यदि समाज का बड़ा वर्ग स्वयं को तकनीक से बाहर महसूस करने लगे, तो यह दूरी केवल डिजिटल नहीं रहेगी, बल्कि मानसिक और सामाजिक भी हो जाएगी। इसके संकेत दुनिया में दिखाई देने लगे हैं। एनवीडिया जैसी कंपनी का दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनियों में शामिल होना केवल एक व्यावसायिक उपलब्धि नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था में एआई केंद्रीय भूमिका निभाने जा रहा है। वहीं माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और अन्य तकनीकी कंपनियाँ अपने लगभग हर प्रमुख उत्पाद में एआई को शामिल कर चुकी हैं। स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में एआई जानना एक अतिरिक्त योग्यता नहीं, बल्कि मूलभूत कौशल माना जाएगा।

सामाजिक दृष्टि से भी यह बदलाव गंभीर है। यदि अच्छी शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ, सरकारी योजनाएँ और रोजगार के अवसर एआई आधारित होते गए, तो वे लोग जो डिजिटल संसाधनों, इंटरनेट, भाषा या प्रशिक्षण से वंचित हैं, अनजाने में मुख्यधारा से दूर होते जाएँगे। यह खाई दिखाई नहीं देगी, लेकिन इसका प्रभाव जीवन के लगभग हर क्षेत्र में महसूस होगा। आर्थिक दृष्टि से देखें तो एआई केवल बड़ी कंपनियों का उपकरण ही नहीं है बल्कि आज एक छोटा दुकानदार भी अपनी ग्राहक सेवा को बेहतर कर सकता है, किसान मौसम और फसल संबंधी सलाह प्राप्त कर सकता है, शिक्षक पाठ सामग्री तैयार कर सकता है और विद्यार्थी कठिन विषयों को सरल भाषा में समझ सकता है। लेकिन जो व्यक्ति इन साधनों का उपयोग करना नहीं सीख पाएगा, उसकी प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ सकती है। भविष्य में वेतन का अंतर केवल डिग्री से नहीं, बल्कि सीखने की क्षमता और एआई कौशल से भी तय हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि एआई स्वयं समस्या है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब नई तकनीक तक पहुँच कुछ लोगों तक सीमित रह जाती है। समाधान एआई का विरोध नहीं, बल्कि उसका लोकतंत्रीकरण है। स्थानीय भाषाओं में एआई का विकास, सरकारी विद्यालयों में एआई साक्षरता, ग्रामीण क्षेत्रों तक डिजिटल प्रशिक्षण और सस्ती इंटरनेट सुविधाएँ इस खाई को कम करने के सबसे प्रभावी उपाय हो सकते हैं।

महाकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखा था-‘शक्ति नहीं तब तक, जब तक भाग न सबका सम हो।’ यह पंक्ति आज एआई के संदर्भ में पहले से अधिक प्रासंगिक लगने लगी है। तकनीक की वास्तविक सफलता तब होगी, जब उसका लाभ केवल महानगरों के कुछ लोगों तक सीमित न रहकर गाँवों, छोटे कस्बों, विद्यार्थियों, किसानों, महिलाओं और छोटे उद्यमियों तक भी पहुँचे। एआई की सबसे बड़ी चुनौती मशीनों का बुद्धिमान होना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि मनुष्य अवसरों से वंचित न रह जाए। यदि तकनीक समाज के एक वर्ग को आगे और दूसरे को पीछे छोड़ने लगे, तो यह विकास नहीं, विभाजन होगा। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि एआई कितना शक्तिशाली बनेगा ? बल्कि प्रश्न यह है कि क्या हम ऐसा समाज बना पाएँगे जहाँ एआई सबके लिए अवसर बने, किसी के लिए अदृश्य दीवार नहीं। यही प्रश्न आने वाले भारत की दिशा भी तय करेगा और दशा भी।





