



डॉ. संतोष राजपुरोहित
1990 के दशक में जब वैश्वीकरण का दौर शुरू हुआ, तब यह विश्वास पैदा किया गया कि दुनिया अब सीमाओं से मुक्त एक विशाल बाजार में बदल जाएगी। कहा गया कि वस्तुएँ, पूँजी, तकनीक और सेवाएँ बिना किसी बाधा के एक देश से दूसरे देश में जाएँगी और इससे सभी देशों की समृद्धि बढ़ेगी। भारत ने भी 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद इसी सोच को अपनाया। लेकिन तीन दशक बाद विश्व अर्थव्यवस्था जिस मोड़ पर खड़ी है, वह एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करती है, क्या वैश्वीकरण वास्तव में उतना ही निष्पक्ष और सार्वभौमिक था, जितना हमें बताया गया था?
आज की वास्तविकता यह है कि वैश्वीकरण की चमक फीकी पड़ती दिखाई दे रही है। विश्व व्यापार संगठन के नियमों की बात तो होती है, लेकिन जब बड़े देशों के हित प्रभावित होते हैं, तब वही देश इन नियमों को दरकिनार कर देते हैं। अमेरिका द्वारा चीन पर लगाए गए प्रतिबंध, रूस पर आर्थिक प्रतिबंध, ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध,यूरोप द्वारा कार्बन टैक्स जैसी व्यवस्थाएँ तथा तकनीकी निर्यात पर नियंत्रण यह दर्शाते हैं कि वैश्विक बाजार वास्तव में राजनीतिक शक्ति से संचालित होते हैं। इसलिए यह कहना कि बाजार पूरी तरह स्वतंत्र हैं, अब एक मिथक जैसा लगता है।

वास्तव में वैश्वीकरण का आदर्श और उसका व्यवहार दो अलग-अलग चीजें हैं। सिद्धांत कहता है कि बाजार प्रतिस्पर्धा के आधार पर चलते हैं, लेकिन व्यवहार में शक्ति और राजनीति का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। जब चीन विश्व की फैक्ट्री बन गया और अमेरिकी उद्योगों को चुनौती मिलने लगी, तब मुक्त व्यापार की जगह व्यापार युद्ध ने ले ली। इससे स्पष्ट हो गया कि वैश्वीकरण तब तक स्वीकार्य है, जब तक वह शक्तिशाली देशों के हितों के अनुकूल हो।

कोविड-19 महामारी ने इस व्यवस्था की कमजोरियों को दुनिया के सामने ला दिया। भारत सहित अनेक देशों ने महसूस किया कि आवश्यक दवाओं, चिकित्सा उपकरणों, चिप्स और अन्य वस्तुओं के लिए अत्यधिक विदेशी निर्भरता संकट का कारण बन सकती है। जब आपूर्ति शृंखलाएँ बाधित हुईं, तब यह प्रश्न उठने लगा कि क्या केवल सस्ते आयातों के भरोसे आर्थिक विकास संभव है? इसी अनुभव ने आत्मनिर्भरता और स्थानीय उत्पादन की आवश्यकता को पुनः स्थापित किया।

इसी संदर्भ में आज ‘डी-ग्लोबलाइजेशन’ और ‘री-ग्लोबलाइजेशन’ जैसे शब्द चर्चा में हैं। डी-ग्लोबलाइजेशन का अर्थ विश्व से कट जाना नहीं है, बल्कि अंधाधुंध वैश्विक निर्भरता को कम करना है। वहीं री-ग्लोबलाइजेशन का अर्थ है वैश्वीकरण को नए रूप में व्यवस्थित करना, जहाँ राष्ट्रीय हित, आर्थिक सुरक्षा और विश्वसनीय साझेदारी को महत्व दिया जाए।
भारत का अनुभव इस बहस को समझने में मदद करता है। वैश्वीकरण ने भारत को आईटी सेवाओं, फार्मास्यूटिकल्स, स्टार्टअप और विदेशी निवेश के क्षेत्र में लाभ पहुँचाया है। लेकिन दूसरी ओर चीन से सस्ते आयातों ने अनेक घरेलू उद्योगों को कमजोर भी किया। राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के अनेक लघु उद्योग विदेशी उत्पादों से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए। इसका अर्थ यह नहीं कि वैश्वीकरण गलत था, बल्कि यह कि बिना तैयारी के वैश्विक प्रतिस्पर्धा घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकती है।

प्रख्यात स्वदेशी अर्थचिंतक अश्विनी महाजन अपने लेखों में लिखते हैं कि वैश्वीकरण का वर्तमान स्वरूप समानता पर आधारित नहीं है। उनके अनुसार विकसित देशों ने विकासशील देशों को मुक्त व्यापार का पाठ पढ़ाया, लेकिन स्वयं अपने कृषि क्षेत्र, उद्योगों और तकनीकी कंपनियों को भारी संरक्षण प्रदान किया। उनका मानना है कि आर्थिक नीति का उद्देश्य केवल सस्ता आयात प्राप्त करना नहीं, बल्कि रोजगार, उत्पादन क्षमता और राष्ट्रीय आर्थिक शक्ति को बढ़ाना भी होना चाहिए।
फिर भी यह मान लेना उचित नहीं होगा कि भारत के लिए पूर्ण डी-ग्लोबलाइजेशन समाधान है। भारत आज विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और उसका विकास वैश्विक व्यापार, निवेश तथा तकनीकी सहयोग से जुड़ा हुआ है। यदि भारत स्वयं को विश्व अर्थव्यवस्था से अलग कर ले, तो निर्यात, रोजगार और नवाचार प्रभावित होंगे। इसलिए भारत को न तो अंध वैश्वीकरण की आवश्यकता है और न ही पूर्ण डी-ग्लोबलाइजेशन की।

भारत के लिए अधिक व्यवहारिक मार्ग स्ट्रेटेजिक ग्लोबलाइजेशन का है। इसका अर्थ है कि जहाँ वैश्विक जुड़ाव से लाभ हो, वहाँ विश्व के साथ सहयोग किया जाए, लेकिन जिन क्षेत्रों का संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा और रोजगार से है, वहाँ आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दी जाए। सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, सौर ऊर्जा, दवा उद्योग और कृषि जैसे क्षेत्रों में यही नीति दिखाई देती है।
कहा जा सकता है कि आज विश्व वैश्वीकरण के अंत का नहीं, बल्कि उसके पुनर्गठन का साक्षी बन रहा है। बाजार अब केवल आर्थिक शक्तियों से नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक हितों से भी संचालित हो रहे हैं। इसलिए वैश्वीकरण का पुराना मॉडल कमजोर पड़ा है। भारत के लिए सबसे उपयुक्त मार्ग वह है जिसमें वैश्विक अवसरों का लाभ लिया जाए, लेकिन राष्ट्रीय हितों, रोजगार और आत्मनिर्भरता से समझौता न किया जाए। आने वाला समय वैश्विक सहभागिता और राष्ट्रीय सामर्थ्य के संतुलन का होगा, और यही वास्तविक अर्थों में री-ग्लोबलाइजेशन की दिशा है।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं





