





शंकर सोनी, अधिवक्ता
अन्ना आंदोलन की तरह कॉकरोच प्रदर्शन भी आने वाले समय में भीड़ के मनोविज्ञान को समझने के लिए एक बड़ा उदाहरण बनेगा। भविष्य में सरकार, प्रशासन और पुलिस को ऐसे प्रदर्शनों से संवेदनशीलता के साथ निपटने के तरीके सीखने होंगे। वहीं, प्रदर्शनकारियों को भी अपने मुद्दों तक सीमित रहने और आंदोलन को अनुशासित बनाए रखने के तरीके सीखने पड़ेंगे। जजों, नेताओं और अधिकारियों को भी किसी पर कटाक्ष करने से पहले उसके संभावित परिणामों पर विचार करना होगा। देश में नीट परीक्षा से जुड़े युवाओं की एक बड़ी आबादी है। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे अभ्यर्थियों की है, जो वर्षों से परीक्षा व्यवस्था में अनियमितताओं और अपने भविष्य को लेकर असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। धीरे-धीरे यह एक अलग समुदाय का रूप ले चुका है। नीट परीक्षा में अनियमितताओं के आरोप भी नए नहीं हैं। पहले परीक्षा केंद्रों पर परीक्षार्थियों की उत्तर पुस्तिकाएं बदले जाने जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं।
इन समस्याओं के समाधान के लिए बच्चों ने चंदा एकत्रित किया और याचिकाओं के माध्यम से अदालत की शरण ली, लेकिन उन्हें अपेक्षित न्याय नहीं मिला। वर्षों से नीट परीक्षार्थियों के दिलों में तेल से भीगी बातियों की तरह सुलग रहा असंतोष किसी संदेश और एक आह्वान से चिंगारी पाकर भड़क उठा। प्रदर्शनकारियों की मांगें उचित मानी गईं और अंततः एक मंत्री को त्यागपत्र देना पड़ा।
फिलहाल यह आंदोलन हाइपरपॉलिटिक्स यानी राजनीतिक ध्रुवीकरण की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। लंबे समय से निष्क्रिय नजर आ रहे विपक्ष को भी इसमें अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता वापस पाने की संभावना दिखाई दी और राहुल गांधी जैसे नेता युवाओं के इस आंदोलन से जुड़ गए। चूंकि युवा आंदोलनों में वामपंथी संगठनों की सक्रिय भागीदारी का लंबा इतिहास रहा है, इसलिए नेहा बोरा ने भी प्रभावी ढंग से इसमें प्रवेश किया।
अब सवाल यह है कि क्या आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है? नीट परीक्षा में पेपर लीक जैसी घटनाओं और कथित अनियमितताओं को रोकने के लिए शुरू हुआ आंदोलन अब सत्ता परिवर्तन तक की मांगों से जुड़ता दिखाई दे रहा है। यह स्थिति एक बड़ी सीख देती है कि यदि किसी आंदोलन की रूपरेखा अधूरी हो और उसके पास स्पष्ट नेतृत्व, संगठनात्मक ढांचा तथा अनुशासन न हो, तो उसके मूल उद्देश्य पर दूसरे हित हावी हो सकते हैं। नतीजतन, आंदोलन का स्वरूप और प्रदर्शन का तरीका भी बदल जाता है।
बिना स्पष्ट रूपरेखा के सोशल मीडिया संदेशों के आधार पर रातोंरात जुटी भीड़ के पास कोई साझा रणनीति या सुविचारित नेतृत्व होना जरूरी नहीं है। भीड़ में अनुशासन और दिशा का अभाव हो सकता है। ऐसी स्थिति में जो व्यक्ति सबसे जोर से बोलकर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है, भीड़ उसके पीछे चल पड़ती है। इस आंदोलन में भी कुछ लोगों की भूमिका को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भीड़ में शामिल प्रत्येक व्यक्ति विवेकहीन होता है या हर आंदोलन नेतृत्वहीन ही होता है। लेकिन जब किसी प्रदर्शन में संगठनात्मक अनुशासन और स्पष्ट उद्देश्य कमजोर पड़ने लगते हैं, तो उसके भटकने की आशंका बढ़ जाती है।
इस प्रदर्शन में कुछ लोगों द्वारा संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए अत्यधिक आक्रामक और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन में सरकार की आलोचना, असहमति और विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है। लेकिन जब रचनात्मक सुधारों की मांग पीछे छूटने लगे और सरकारी संस्थानों पर अराजक तरीके से दबाव बनाने की रणनीति हावी हो जाए, तो आंदोलन की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। प्रदर्शन का उद्देश्य व्यवस्था में सुधार होना चाहिए, न कि संस्थाओं को अपमानित करना या संवाद की संभावनाएं समाप्त करना। सरकार और उसके प्रतिनिधियों को भी यह समझना होगा कि कटाक्ष, उपेक्षा और असंवेदनशील टिप्पणियां असंतोष को कम करने के बजाय उसे और भड़का सकती हैं।
मीडिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया पर प्रसारित दावों में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान कथित हिंसक घटनाओं तथा पाकिस्तान से संचालित बताए जा रहे कुछ सोशल मीडिया हैंडल्स की गतिविधियों का उल्लेख किया गया है। ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच जरूरी है। यदि किसी आंदोलन की आड़ में विदेशी या भारत-विरोधी तत्व भ्रामक सामग्री फैलाते हैं, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
इतिहास बताता है कि नेतृत्वहीन और आवेगपूर्ण जनसमूह का लाभ बाहरी या विरोधी ताकतें अपने हितों के लिए उठाने की कोशिश कर सकती हैं। इसलिए किसी भी आंदोलन में अनुशासन, पारदर्शिता और तथ्यात्मक संवाद आवश्यक हैं। हालांकि, किसी बाहरी हस्तक्षेप का निष्कर्ष ठोस प्रमाणों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
इस आंदोलन को संभालने में सरकार की भूमिका प्रभावी और संवेदनशील दिखाई नहीं दी। किसी भी जनआंदोलन के शुरुआती संकेत मिलते ही सरकार को सतर्कता के साथ संवाद की पहल करनी चाहिए। यदि आंदोलन गैर-राजनीतिक मुद्दों पर शुरू हुआ है, तो सरकार को उसके प्रतिनिधियों से बातचीत कर समाधान तलाशना चाहिए।
आंदोलन की मांगों पर सरकार को सार्वजनिक मंच पर आकर स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-सी मांगें स्वीकार की जा सकती हैं, किन पर निर्णय की प्रक्रिया चल रही है और किन मांगों को स्वीकार करने में क्या कठिनाइयां हैं। इससे अफवाहों और अविश्वास को कम करने में मदद मिल सकती है।
यदि आंदोलन की मांगें उचित हैं और सरकार उन्हें स्वीकार नहीं कर रही है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का विकल्प मौजूद है। यदि न्यायिक प्रक्रिया से भी अपेक्षित राहत नहीं मिलती, तो जनता के बीच जाकर अपने पक्ष में जनमत तैयार करना और आगामी चुनावों में मतदाताओं के सामने मुद्दे रखना लोकतांत्रिक रास्ता है। लेकिन किसी आंदोलन को अराजकता में बदल देना उचित नहीं ठहराया जा सकता। पश्चिम बंगाल के निर्वाचन से जुड़ी कानूनी प्रक्रियाओं और कथित त्रुटियों पर मैंने एक लेख लिखा है। उसे इस लिंक पर पढ़ा जा सकता हैरू ख्मूल लेख का लिंक यहां जोड़ें,
ऐसे मामलों में आरोपों और तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है। निर्वाचन प्रक्रिया में यदि कोई कानूनी त्रुटि हुई है, तो उसका परीक्षण संबंधित दस्तावेजों, कानून और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। लोकतंत्र में चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता और न्यायिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।
एक सवाल यह भी है कि यदि ज्ञानेश कुमार आंदोलन के दबाव में इस्तीफा नहीं देते, तो क्या प्रदर्शन जारी रहेगा? इस सवाल का जवाब केवल इस्तीफे से नहीं, बल्कि उन प्रक्रियागत सवालों के समाधान से जुड़ा होना चाहिए, जिनके कारण असंतोष पैदा हुआ।
ज्ञानेश कुमार को भी आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या उनसे प्रक्रिया संबंधी कोई भूल हुई है। यदि कोई त्रुटि हुई है, तो उसे स्वीकार कर सुधार करना संस्थागत गरिमा को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत करता है। दूसरी ओर, केवल दबाव बनाने के लिए किसी संवैधानिक पदाधिकारी के इस्तीफे की मांग करना भी समस्या के स्थायी समाधान की गारंटी नहीं है।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, दोनों का सम्मान जरूरी है। सरकार को असहमति सुननी चाहिए, प्रदर्शनकारियों को मर्यादा बनाए रखनी चाहिए और संस्थाओं को अपनी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता सुनिश्चित करनी चाहिए।
आंतरिक असंतोष जब अनियंत्रित होकर हिंसा, भ्रामक प्रचार और संस्थाओं के प्रति अविश्वास में बदलता है, तो उसका असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि पर भी पड़ सकता है। इसलिए जरूरी है कि सरकार, प्रशासन, पुलिस, प्रदर्शनकारी और संवैधानिक पदों पर बैठे सभी लोग अपनी जिम्मेदारी समझें।
कॉकरोच प्रदर्शन भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण सबक बन सकता है। सरकार को समय रहते संवाद करना सीखना होगा, प्रशासन और पुलिस को संवेदनशीलता के साथ भीड़ का प्रबंधन करना होगा, प्रदर्शनकारियों को अपने मूल मुद्दों पर टिके रहना होगा और नेताओं को असंतोष का इस्तेमाल केवल राजनीतिक लाभ के लिए करने से बचना होगा।
आंदोलन लोकतंत्र की ताकत हैं, लेकिन उनकी ताकत तभी सार्थक होती है, जब वे स्पष्ट उद्देश्य, अनुशासन और संवैधानिक मर्यादा के साथ आगे बढ़ें। अन्यथा, जिस मुद्दे को लेकर लोग सड़कों पर उतरते हैं, वही मुद्दा भीड़, राजनीति और दूसरे हितों के बीच कहीं पीछे छूट जाता है। आगे देखते हैं कि यह आंदोलन किस दिशा में जाता है। जय हिंद!







