





डॉ. अर्चना गोदारा
एक दौर था, जब शाम ढलते ही मोहल्लों का रंग बदल जाता था। दिनभर काम में लगे लोग घर लौटते, हाथ-मुँह धोते और घर के बाहर चारपाई या कुर्सी डालकर बैठ जाते। किसी को बुलाने के लिए फोन नहीं करना पड़ता था। बस बाहर बैठ जाइए, धीरे-धीरे दो-चार लोग अपने आप आ जाते थे। कोई दिनभर की बात सुनाता, कोई किसी की खिंचाई करता, तो कोई यूँ ही बैठा रहता। बातों का कोई विषय तय नहीं होता था, फिर भी घंटों निकल जाते थे। घरों की औरतें भी शाम को इकट्ठी हो जातीं। किसी के घर की बात होती, किसी के बच्चों का जिक्र, तो कभी हँसी-मजाक में ही समय बीत जाता। बच्चे गलियों में खेलते रहते और बड़े अपनी बातचीत में लगे रहते। किसी को यह चिंता नहीं होती थी कि इस समय का कोई उपयोग भी हो रहा है या नहीं।
उस समय लोग कभी-कभी कह देते थे, ‘आज तो बोर हो रहे हैं, क्या करें? पड़ोस में बैठकर आते हैं।’ आज वही आदमी कहता है, ‘भाई, समय ही नहीं है।’ आखिर ऐसा क्या बदल गया कि पहले समय काटना मुश्किल लगता था और अब समय निकालना? क्या सचमुच काम इतना बढ़ गया है या हमने अपनी जिंदगी को इतना उलझा लिया है कि अपने लोगों के लिए जगह ही नहीं बची? पहले पड़ोसी के घर से नमक, चीनी या चायपत्ती माँग लेना कोई बड़ी बात नहीं थी। किसी के घर में कुछ बनता तो कटोरी में थोड़ा-सा दूसरे घर भी पहुँच जाता। कोई कई दिन दिखाई न दे तो पूछ लिया जाता कि सब ठीक तो है। आज कई बार एक ही दीवार के दोनों ओर रहने वाले लोगों को एक-दूसरे के हालचाल तक पता नहीं होते। पहले घरों के दरवाजे खुले रहते थे, अब दरवाजे ही नहीं, समय भी बंद हो गया है। मोहल्ले तो अब भी हैं, लेकिन मोहल्लेपन का वह सहज भाव धीरे-धीरे कम होता दिखाई देता है।
बदलाव केवल बड़ों की जिंदगी में नहीं आया है। बच्चों के पास भी अब खेलने के लिए पहले जैसा खुला समय नहीं है। स्कूल, पढ़ाई, गृहकार्य, प्रतियोगिता और मोबाइल की दुनिया के बीच उनका बचपन भी एक तय समय-सारणी में सिमटता जा रहा है। पहले बच्चे शाम होते ही घर से बाहर निकल पड़ते थे। खेलते-झगड़ते, रूठते और फिर कुछ देर बाद साथ हो जाते थे। खेल के मैदान में ही वे मिल-बाँटकर रहना, हार स्वीकार करना और अपनी बारी का इंतजार करना सीखते थे। आज संपर्क के साधन बहुत हैं, लेकिन सहज मेलजोल के अवसर हर जगह पहले जैसे नहीं रहे। आज हर व्यक्ति व्यस्त दिखाई देना चाहता है। किसी से मिलने की बात करो तो जवाब मिलता है कि बहुत काम है। फोन करो तो कहा जाता है कि अभी व्यस्त हूँ, बाद में बात करता हूँ। कई बार व्यस्तता वास्तविक होती है, लेकिन कहीं न कहीं हमने व्यस्त रहने को अपनी अहमियत का प्रमाण भी बना लिया है। खाली बैठना मानो समय की बर्बादी हो गया है। सोशल मीडिया पर हम अपनी उपलब्धियाँ, घूमना-फिरना, खुशियाँ और सफलता दिखाते हैं। हर कोई चाहता है कि लोग उसे अच्छा, सफल और खुशहाल समझें। अपनी जिंदगी का अच्छा पक्ष दिखाने की इस होड़ में हम यह भूल जाते हैं कि सामान्य-सी जिंदगी, साधारण-सी शाम और बिना किसी उपलब्धि के बिताया गया समय भी अपने आप में महत्त्वपूर्ण होता है।
इसी बदलते माहौल में एक नई बात सामने आई है। लोग अब चैटजीपीटी जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित माध्यमों से भी बातें करने लगे हैं। कोई अपने मन की उलझन पूछता है, कोई रिश्तों के बारे में सलाह लेता है, कोई अपने व्यवहार को समझना चाहता है और कोई केवल इसलिए बातचीत करता है कि उसकी बात सुनने वाला कोई हो। कई बार व्यक्ति अपने परिचितों से वह बात नहीं कह पाता, जो किसी डिजिटल माध्यम पर लिख देता है। यहाँ उसे तुरंत जवाब मिल जाता है और अपनी बात कहने के लिए किसी के खाली होने का इंतजार भी नहीं करना पड़ता। यह बदलाव अपने आप में आज के समय की एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक सच्चाई है। चैटजीपीटी से बातचीत करना गलत नहीं है। यह जानकारी लेने, विचार स्पष्ट करने और अपनी उलझनों को समझने का उपयोगी माध्यम हो सकता है। लेकिन यह स्थिति सोचने पर जरूर मजबूर करती है कि जब बातचीत के इतने साधन उपलब्ध हैं, तब भी लोगों को अपनी बात कहने के लिए नए माध्यमों की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? क्या हमारी दिनचर्या में लोगों के लिए समय कम पड़ गया है? क्या हम दूसरों की बात सुनने के बजाय अपनी बात कहने में अधिक रुचि लेने लगे हैं? या फिर हम ऐसे संबंध चाहते हैं जिनमें हमें किसी की नाराजगी, असहमति और अपेक्षाओं का सामना न करना पड़े?असल जिंदगी में हर व्यक्ति हमारी बात से सहमत नहीं होगा। कोई हमारी गलती भी बताएगा, कोई हमारी बात काटेगा और कभी-कभी कोई हमारी परेशानी सुनने के बावजूद उसका समाधान नहीं दे पाएगा। मानवीय संबंधों में धैर्य, समझौता और एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करने की जरूरत होती है। इसके लिए समय भी चाहिए और मन भी। डिजिटल माध्यमों पर बातचीत करना अपेक्षाकृत आसान है। इसलिए यह जरूरी है कि हम सुविधा के साथ-साथ अपने वास्तविक संबंधों के लिए भी समय निकालें। हर व्यक्ति अकेला है, ऐसा कहना गलत होगा, लेकिन व्यस्तता और दिखावे के बीच सच्चे संवाद के अवसर कम होने पर विचार करना जरूरी है।
शायद हमें अपनी जिंदगी में कुछ छोटी-छोटी चीजें वापस लाने की जरूरत है। शाम को थोड़ी देर बाहर बैठना, पड़ोसी का हाल पूछ लेना, बच्चों को बिना किसी अतिरिक्त उद्देश्य के खेलने देना, किसी मित्र से यूँ ही मिलने चले जाना और घर के लोगों के साथ बिना मोबाइल देखे बातचीत करना। इसके लिए बहुत पैसा नहीं चाहिए, न किसी विशेष आयोजन की जरूरत है। केवल थोड़ा समय और एक-दूसरे के प्रति सहज रुचि चाहिए। कभी लोग कहते थे, ‘आज बोर हो रहे हैं, चलो बैठकर बातें करते हैं।’ आज कहते हैं, ‘समय ही नहीं है।’ इन दोनों वाक्यों के बीच केवल समय का अंतर नहीं, हमारे सामाजिक जीवन में आए बदलाव की पूरी कहानी छिपी है। तकनीक आगे बढ़ती रहेगी, नए माध्यम आते रहेंगे और हम उनसे संवाद भी करते रहेंगे। लेकिन इस भागदौड़ में इतना ध्यान जरूर रखना होगा कि कहीं ऐसा न हो कि हमारे पास दुनिया से जुड़ने के हजार रास्ते हों, मगर अपने ही मोहल्ले में किसी के पास बैठने के लिए दस मिनट भी न बचें।






