







गोपाल झा
सुबह नींद खुली। व्हाट्सऐप चेक किया। एक वीडियो सामने आया। हनुमानगढ़ के निर्दलीय पार्षद शहर पहुंच रहे थे। स्टेशन से गुरुद्वारा सिंह सभा तक के दृश्य थे। कुछ चेहरे तनाव में थे। महिला पार्षद भी परेशान नजर आ रही थीं। पूर्व सभापति सुमित रणवां के माथे पर बेचैनी पसरी थी। वीडियो देखकर पहला सवाल यही उठा। आखिर माहौल इतना तनावपूर्ण क्यों है?
इस सवाल का जवाब अभी किसी एक पक्ष के पास नहीं है। चुनाव परिणाम सामने हैं। हनुमानगढ़ नगर परिषद में 60 वार्ड हैं। बहुमत का आंकड़ा 31 है। उपलब्ध परिणामों के मुताबिक निर्दलीय 34 सीटों के साथ सबसे बड़ा समूह हैं। भाजपा के पास 15 और कांग्रेस के पास 10 सीटें हैं। यानी गणित निर्दलीयों के पक्ष में है।
सभापति का चुनाव सीधे जनता नहीं करती। निर्वाचित पार्षद मतदान करते हैं। 21 सितंबर यानी आज यही मतदान होना है। मतदान सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक निर्धारित है। यहीं से असली कहानी शुरू होती है।
चुनाव परिणाम आने के बाद किसी भी राजनीतिक दल या समूह की कोशिश स्वाभाविक रूप से बोर्ड बनाने की होगी। भाजपा भी अपने पक्ष में समर्थन जुटाने की कोशिश कर सकती है। निर्दलीय भी अपने समूह को एकजुट रखने की कोशिश करेंगे। कांग्रेस की अपनी रणनीति होगी।
यह राजनीति का सामान्य हिस्सा है। सवाल वहां खड़ा होता है, जहां राजनीतिक मुकाबला प्रशासनिक कार्रवाई की आशंका में बदल जाए। पिछले कुछ दिनों से हनुमानगढ़ में यही चिंता दिखाई दे रही है। अलग-अलग पक्षों की ओर से पुलिस और प्रशासन की भूमिका को लेकर आरोप लगाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ प्रशासनिक और पुलिस कार्रवाई को कानून के तहत की जा रही कार्रवाई बताया जा रहा है।
इस पूरे विवाद में एक बात बहुत महत्वपूर्ण है। आरोप और प्रमाण एक चीज नहीं हैं। किसी पर दबाव डाला गया या नहीं। किसी पार्षद को मतदान से रोकने की कोशिश हुई या नहीं। पुलिस ने किसी के साथ पक्षपात किया या नहीं। इन सवालों का जवाब तथ्यों से ही मिलेगा।
फिलहाल सबसे बड़ी जिम्मेदारी प्रशासन की है। क्योंकि चुनाव केवल मतदान की तारीख का नाम नहीं है। चुनाव एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में हर निर्वाचित पार्षद को सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए। वह अपने विवेक से मतदान कर सके। किसी बाहरी दबाव के बिना मतदान कर सके। इसी संदर्भ में अदालत का दरवाजा खटखटाया गया है। रविवार को अदालत में पार्षदों से जुड़ा मामला पहुंचा। रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने राहत देते हुए उन्हें मतदान से रोकने जैसी स्थिति से सुरक्षा दी।
अब असली परीक्षा आदेश के पालन की है। अदालत का आदेश कागज पर नहीं रहना चाहिए। उसका असर जमीन पर दिखाई देना चाहिए। पार्षद भयमुक्त होकर मतदान केंद्र तक पहुंचें। सुरक्षित पहुंचें। बिना दबाव पहुंचें। और मतदान करें। बस इतना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी अपेक्षा है।
निर्दलीय खेमे की चिंता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि किसी समूह को लगता है कि उसके पार्षदों पर दबाव है, तो वह अदालत जा चुका है। निर्वाचन प्रक्रिया में शिकायत दर्ज करा सकता है। चुनाव आयोग और प्रशासन के सामने अपनी बात रख सकता है। लेकिन जब अधिकांश दरवाजे सत्ता के ‘दबाव’ में दिखे तो ? टीम गणेशराज ने जनता के दरवाजे पर दस्तक दी है। जनता से की गई इसी अपील ने चिंता बढ़ाई है। संदेश यह है कि जिन लोगों ने अपने वोट से पार्षद चुने हैं, वे अब उनके वोट की रक्षा के लिए सामने आएं।
भावना समझी जा सकती है। हालात भी ऐसे ही हैं, जो दिख रहे हैं। लेकिन लोकतंत्र में भीड़ और मतदान के बीच एक महीन रेखा होती है। यदि बड़ी संख्या में लोग मतदान केंद्रों के आसपास जमा होते हैं, तो स्थिति बिगड़ सकती है। पुलिस से टकराव हो सकता है। कानून-व्यवस्था का सवाल खड़ा हो सकता है। इसका नुकसान अंततः उसी जनता को होगा, जिसके वोट की रक्षा की बात कही जा रही है।
इसलिए 21 सितंबर को सबसे जरूरी चीज ताकत का प्रदर्शन नहीं है। सबसे जरूरी है शांतिपूर्ण मतदान। किसके पास कितने पार्षद हैं, इसका फैसला संख्या करेगी। कौन किसे वोट देता है, यह पार्षद तय करेंगे। कौन सभापति बनता है, इसका फैसला मतदान करेगा। जनता ने अपना काम कर दिया है। उसने पार्षद चुने हैं।
अब व्यवस्था की बारी है। सरकार के लिए भी यह एक परीक्षा है। विपक्ष के लिए भी। निर्दलीय खेमे के लिए भी। पुलिस और प्रशासन के लिए भी।
सरकार पर यह जिम्मेदारी है कि किसी पक्ष को विशेष लाभ न मिले। लेकिन वह लाभ लेने के लिए नियमों को ताक पर रख चुकी है। विपक्ष पर जिम्मेदारी है कि आरोपों को प्रमाण के साथ सामने रखे। स्थानीय स्तर पर विपक्ष ने आंखों पर पटटी बांध रखी है। निर्दलीयों पर जिम्मेदारी है कि अपने समर्थकों को संयमित रखें। पुलिस पर जिम्मेदारी है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखे। और प्रशासन पर जिम्मेदारी है कि मतदान निष्पक्ष माहौल में कराए।
21 सितंबर इसलिए महत्वपूर्ण है। सिर्फ इसलिए नहीं कि सभापति चुना जाएगा।
इसलिए भी कि यह देखा जाएगा कि चुनाव परिणाम के बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया कितनी सहजता से आगे बढ़ती है। जनादेश का अर्थ केवल जीतने वाले का नाम नहीं होता। जनादेश का अर्थ यह भी है कि जिस व्यवस्था ने जनता से वोट लिया, वह उस वोट की मर्यादा रखे।
आज हनुमानगढ़ में असली सवाल यही है। कौन बोर्ड बनाएगा? यह सवाल कुछ घंटों में खत्म हो जाएगा। लेकिन उससे बड़ा सवाल है, क्या हर निर्वाचित पार्षद बिना डर, दबाव और रोक-टोक के अपना वोट डाल पाएगा? 21 सितंबर का असली इतिहास शायद इसी सवाल के जवाब में लिखा जाएगा।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं







