






गोपाल झा
चुनाव खत्म हुए। ईवीएम ऑन हुईं। नतीजे सामने आ गए। हनुमानगढ़ नगरपरिषद की कुल 60 सीटों का हिसाब था। सबसे अधिक 35 पर निर्दलीयों ने परचम लहरा दिया। जनता ने अपनी बात कह दी। फैसला साफ था। लगा था कि अब शोरगुल थम जाएगा। शहर चैन की सांस लेगा। लेकिन खेल तो असल में अब शुरू हुआ। जीत के बाद जो तस्वीर उभरी, वह हैरान करने वाली है। जहाँ जश्न होना था, वहाँ तनातनी पसर गई, खौफ का मंजर नजर आने लगा। हनुमानगढ़ की आबोहवा में अजीब सा भारीपन है। गलियों और चौपालों पर फुसफुसाहटें हैं। लोग पूछ रहे हैं कि यह कैसा तमाशा है?
संख्याबल का गणित शीशे की तरह साफ दिखता है। जब 35 चेहरे किसी एक झंडे के नीचे नहीं, तो बोर्ड किसका? दावा सत्ताधारी दल यानी भाजपा का भी है। दावेदारी कोई बुरी बात नहीं। राजनीति में हर कोई अपनी बिसात बिछाता है। लेकिन जब दावों में जिद नजर आने लगे, तो सवाल उठते हैं। क्या जनादेश की कोई कीमत नहीं? जब जनता ने निर्दलीयों की झोली भर दी, तो फिर यह बेचैनी क्यों? क्या सिर्फ अपनी ‘चौधराहट’ चमकाने के लिए हर कायदा ताक पर रख दिया जाएगा?
इस पूरे अखाड़े में कांग्रेस ने होंठ सी रखे हैं। उसकी यह चुप्पी रहस्यमयी है। दूसरी तरफ निर्दलीय खेमा गुस्से में उबल रहा है। माकपा ने खुलेआम ताल ठोक दी है। उसने निर्दलीय विधायक के साथ हाथ मिलाया है। अब लाल झंडे सड़कों पर लहरा रहे हैं, फिर लहराएंगे। कलेक्ट्रेट और थाने के बाहर नारेबाजी हुई है, और होगी भी। पर सबसे बड़ा सवाल अपनी जगह कायम है। निर्दलीय विधायक आखिर हैं कहाँ? किसी को कुछ पता नहीं। पुलिस के हाथ खाली हैं। बड़े-बड़े अफसर कह रहे हैं कि उन्हें भनक तक नहीं। एक जनप्रतिनिधि का यूं अचानक ओझल हो जाना क्या छोटी बात है? उन्हें ढूंढना किसका काम है? जाहिर है, पुलिस का। लेकिन चर्चा यह है कि तंत्र ढूंढने से ज्यादा ‘वफादारी’ साबित करने में जुटा है।
शहर के बुजुर्ग सिर धुन रहे हैं। वे कहते हैं कि ऐसी उठापटक ताउम्र नहीं देखी। न पहले कभी कांग्रेस के दौर में, न भाजपा के राज में। घरों में आधी रात को पुलिस की गाड़ियां दौड़ रही हैं। सायरन की आवाज से बच्चे चौंक कर उठते हैं। रणनीति बनाने वालों को हिरासत में लिए जाने की बातें हैं। फोन बंद आ रहे हैं। परिजनों के चेहरों पर हवाइयां उड़ रही हैं। इसे देखकर मन में खटका लगना लाजिमी है।
प्रशासन और पुलिस किसी भी निजाम की रीढ़ होते हैं। उनकी साख निष्पक्षता पर टिकती है। अगर खाकी पर किसी एक दल की ‘चाकरी’ का ठप्पा लग जाए, तो लोकतंत्र का क्या होगा? सत्ताएं आज किसी की हैं, कल किसी और की होंगी। लेकिन महकमे की साख एक बार गई तो फिर लौटती नहीं।
कानून अपना काम करे, इसमें किसी को एतराज नहीं। अगर कोई विधायक या पार्षद कानून की नजर में गुनहगार है, तो उसे सलाखों के पीछे होना ही चाहिए। कानून से बड़ा कोई नहीं। लेकिन कार्रवाई का वक्त तो देखिए। जब सिर पर सभापति का चुनाव हो, ठीक उसी वक्त पुरानी फाइलें खुलना संदेह पैदा करता है। दो दिन का सब्र क्या पहाड़ तोड़ देता? बस, 21 तारीख गुजर जाती, फिर कानून अपना शिकंजा कस लेता। तब शायद कोई उंगली भी न उठाता।
राजस्थान की तासीर हमेशा से शांत रही है। यहाँ राजनीति में नोकझोंक होती है, पर दिलों में जहर नहीं घुलता। मगर अब जो हो रहा है, वह चिंता बढ़ाता है। बाड़ेबंदी के किस्से नए नहीं हैं। पर होटलों के कमरों तक आधी रात को पुलिस का पहुंचना नया है। पार्षदों के घरों पर पहरे बैठना नया है। प्रबुद्ध तबका अंदर ही अंदर घुट रहा है। वे सोच रहे हैं कि क्या हमारा शांत शहर व प्रदेश भी उसी रास्ते पर जा रहा है, जहाँ सिर्फ लाठी और डर का राज चलता है?
राजनीति में लोकलाज सबसे बड़ा गहना होती है। सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को यह भूलना नहीं चाहिए। जनता सब देखती है। वह भले आज खामोश दिखे, पर मन ही मन सब हिसाब दर्ज कर रही है। कल फिर चुनाव की डुगडुगी बजेगी। फिर वही नेता हाथ जोड़कर इन्हीं गलियों में वोट मांगने आएंगे। तब अगर किसी नागरिक ने टोक दिया कि जब हमारे वोट का मोल ही नहीं था, तो फिर यह नाटक क्यों? तब क्या जवाब दिया जाएगा? चाल, चरित्रत्र और चेहरे की दुहाई कैसे दी जाएगी?
तटस्थ नजरिये से देखें तो यह टकराव किसी के हक में नहीं है। सत्ता हासिल करना लोकतंत्र का हिस्सा है। पर उसे पाने का जरिया भी पाक-साफ होना चाहिए। न किसी पर झूठा दबाव बने, न किसी को जबरन डराया जाए। पार्षदों को अपनी मर्जी से वोट डालने की छूट मिलनी चाहिए। और अगर किसी ने अपराध किया है, तो निष्पक्ष जांच से सच सामने आए। हनुमानगढ़ का यह इम्तिहान केवल एक बोर्ड बनाने का नहीं है। यह इस बात का इम्तिहान है कि हमारी व्यवस्था जनमत के आगे कितनी झुकती है। फैसला अब जिम्मेदारों के हाथ में है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं








