







गोपाल झा
राजस्थान शांत प्रदेश है। लोग भी आम तौर पर शांत रहते हैं। लेकिन इस बार निकाय चुनाव के बाद सियासत कुछ ज्यादा ही गरम है। नतीजे आ गए। जनता अपना फैसला सुना चुकी। अब असली लड़ाई बोर्ड बनाने की है। यहीं से सवाल खड़े हो रहे हैं।
भाजपा 4,179 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी है। कांग्रेस के खाते में 3,613 और निर्दलीयों के खाते में 2,273 वार्ड गए हैं। यानी मुकाबला सिर्फ दो पार्टियों के बीच नहीं रहा। निर्दलीयों ने भी अपनी ताकत दिखाई है। 309 निकायों में से 177 में भाजपा या कांग्रेस अकेले बहुमत तक नहीं पहुंच सकी। मतलब साफ है। कई जगह बोर्ड की चाबी निर्दलीयों के हाथ में है। और चाबी जिसके हाथ में हो, उसकी कीमत अचानक बढ़ जाती है। बस यहीं से राजस्थान में एक नया खेल शुरू होता दिखाई दे रहा है।
पार्षदों की बाड़ेबंदी। होटलों में ठहराव। फोन कॉल। समर्थन जुटाने की कोशिशें। और अब पुलिस के पहुंचने के आरोप। राजनीति में यह सब नया नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि लोकतंत्र की सीमा कहां खत्म होती है और सत्ता की ताकत कहां से शुरू होती है?
संगरिया का घटनाक्रम इसी सवाल को सामने लाता है। विधायक अभिमन्यु पूनिया ने पुलिस पर पार्षदों पर दबाव बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने पुलिस से सीधा टकराव भी लिया। दूसरी तरफ पुलिस की कार्रवाई को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखिए। जब चुने हुए पार्षदों को लेकर पुलिस और राजनीतिक नेताओं के बीच आधी रात को टकराव की नौबत आए, तो सवाल उठेंगे ही। पार्षद कोई सामान नहीं हैं। उन्हें इधर से उठाकर उधर रखने की वस्तु नहीं माना जा सकता। वे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं। उनका समर्थन खरीदना गलत है। उन्हें डराना गलत है। उन्हें धमकाना गलत है। और अगर कोई सरकारी एजेंसी राजनीतिक दबाव के लिए इस्तेमाल होती है, तो वह उससे भी बड़ा सवाल है।
ध्यान रहे, यह सिर्फ विपक्ष का सवाल नहीं है। यह लोकतंत्र का सवाल है।
हनुमानगढ़ में भी हालात सामान्य नहीं हैं। निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल के खिलाफ पुराने मामले में प्राथमिकी दर्ज हुई। उसके बाद जांच एजेंसी की सक्रियता ने राजनीतिक बहस को और गरमा दिया। विधायक समर्थकों ने इसे राजनीतिक दबाव बताया। प्रशासन की ओर से कहा गया कि कार्रवाई कानून के तहत है और किसी के साथ दुर्भावना नहीं होगी।
कानून को अपना काम करना चाहिए। पुराने मामले हों तो भी उनकी जांच होनी चाहिए। लेकिन समय और परिस्थितियां भी राजनीति में सवाल पैदा करती हैं। जब चुनाव परिणामों के तुरंत बाद किसी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ पुराना मामला सक्रिय होता है, तो संदेह की गुंजाइश पैदा होती है। उस संदेह को दूर करने की जिम्मेदारी भी सरकार और जांच एजेंसी की ही है। क्योंकि लोकतंत्र में सिर्फ न्याय होना काफी नहीं है। न्याय होता हुआ दिखाई देना भी जरूरी है।
अब राजस्थान के चुनाव परिणामों पर लौटिए। भाजपा ने इसे सरकार के काम पर जनता की मुहर बताया है। यह उसका राजनीतिक दावा है। आंकड़े बताते हैं कि वह राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। लेकिन वही आंकड़े यह भी बताते हैं कि तस्वीर पूरी तरह एकरंगी नहीं है।
मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र भरतपुर में निर्दलीयों ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को पीछे छोड़ा। केंद्रीय कानून मंत्री के बीकानेर में कांग्रेस ने बढ़त बनाई। केंद्रीय मंत्रंी भागीरथ चौधरी के अजमेर में कांग्रेस 36 साल बाद सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई। बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष के गृह क्षेत्र पाली में भी कांग्रेस आगे रही। पूर्व सीएम के प्रभाव वाले झालावाड़ में कांग्रेस की जीत हुई। इसलिए चुनाव परिणाम को केवल एक नारे में समेटना ठीक नहीं होगा।
जनता ने भाजपा को भी वोट दिया। कांग्रेस को भी वोट दिया। और बड़ी संख्या में निर्दलीयों को भी चुना। यह स्थानीय राजनीति का संदेश है। मतदाता शायद यह भी कह रहा है कि पार्टी से बड़ा मुद्दा स्थानीय चेहरा है। स्थानीय काम है। स्थानीय भरोसा है।
अब सरकार के सामने असली परीक्षा है। क्या वह इन नतीजों को जनादेश की तरह लेगी या केवल बोर्डों की संख्या बढ़ाने के लक्ष्य की तरह? दोनों में बड़ा फर्क है। सत्ता में रहकर ज्यादा से ज्यादा बोर्ड बनाना राजनीति का हिस्सा हो सकता है। निर्दलीयों से समर्थन लेना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन रास्ता साफ होना चाहिए। समर्थन बातचीत से मिले। विश्वास से मिले। काम के वादे पर मिले। डर से नहीं।
सरकारी मशीनरी लोकतंत्र की चौकीदार है। किसी दल की चुनावी टीम नहीं।
यही बात भाजपा को भी समझनी होगी। कांग्रेस की सरकारों के समय भी सत्ता के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठते रहे हैं। भाजपा की पिछली सरकारों पर भी आरोप लगते रहे हैं। राजनीति में यह सिलसिला पुराना है। लेकिन पुरानी गलतियां नई गलतियों का लाइसेंस नहीं बन सकतीं।
आज सोशल मीडिया का दौर है। हर होटल की तस्वीर बाहर आ जाती है। हर पुलिस टीम कैमरे में कैद हो जाती है। हर बयान कुछ मिनट में पूरे प्रदेश तक पहुंच जाता है। अब पर्दा लगाना मुश्किल है। इसलिए पर्दे के पीछे का खेल भी जनता की नजर से बच नहीं सकता।
राजस्थान ने भैरोंसिंह शेखावत, अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे जैसे नेताओं के लंबे राजनीतिक दौर देखे हैं। मतभेद भी देखे हैं। सत्ता संघर्ष भी देखे हैं। लेकिन राजनीति में एक मर्यादा का भाव भी रहा है। आज सबसे बड़ी जरूरत उसी मर्यादा की है।
अगले महीने पंचायतीराज चुनाव होने हैं। गांवों में भी यही संदेश जाएगा कि सत्ता चुनाव जीतने के बाद क्या करती है। अगर चुनाव जीतने के बाद सरकार का पहला लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा बोर्ड बनाना है तो जनता सवाल करेगी। और अगर सरकार कहेगी कि हर पार्षद स्वतंत्र है, हर वोट स्वतंत्र है और हर जांच कानून के मुताबिक होगी, तो भरोसा बढ़ेगा।
फैसला आखिर जनता ही करेगी। आज नहीं तो कल। क्योंकि लोकतंत्र में कुर्सियां पांच साल के लिए होती हैं। लेकिन जनता की याददाश्त उससे कहीं लंबी होती है। सत्ता की ताकत बड़ी होती है। लेकिन जनमत उससे बड़ा होता है। और राजस्थान की राजनीति में इस समय सबसे जरूरी बात यही है, बोर्ड कितने बने, यह बाद की बात है। बोर्ड बनाने के लिए रास्ता कौन सा अपनाया गया, इतिहास उसे जरूर याद रखेगा।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं







