



डॉ. संतोष राजपुरोहित
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र में लोकतंत्र की वास्तविक सार्थकता केवल संसद और विधानसभाओं के गलियारों तक सीमित नहीं रह सकती। लोकतंत्र की जड़ें तब मजबूत होती हैं, जब शासन की धुरी गांवों तक पहुंचे और अंतिम पंक्ति में खड़ा ग्रामीण भी विकास की प्रक्रिया में बराबर का भागीदार बने। इसी सोच के साथ शुरू हुई पंचायती राज व्यवस्था भारतीय लोकतंत्र का सबसे मजबूत आधार स्तंभ है। इस दिशा में राजस्थान का योगदान ऐतिहासिक है, जहां 2 अक्टूबर 1959 को नागौर की पावन धरा से देश में आधुनिक पंचायती राज व्यवस्था की विधिवत शुरुआत हुई थी।
आज जब भारत दुनिया की शीर्ष आर्थिक शक्तियों में शुमार होने की दिशा में अग्रसर है, तब यह समझना जरूरी है कि विकास केवल महानगरों, ऊंची इमारतों, भारी उद्योगों और आधुनिक तकनीक से संभव नहीं है। वास्तविक आर्थिक प्रगति तब तक संभव नहीं, जब तक हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत न हो। स्थानीय संसाधनों का समुचित दोहन, आजीविका के नए अवसर और आर्थिक फैसलों में स्थानीय आबादी की सक्रिय भागीदारी ही सही मायने में देश को आत्मनिर्भर बना सकती है। इसलिए पंचायती राज को सिर्फ राजनीतिक विकेंद्रीकरण के चश्मे से नहीं, बल्कि आर्थिक सशक्तिकरण के माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए।

स्थानीय समस्याओं, चाहे वह पेयजल संकट हो, सिंचाई की किल्लत, जर्जर ग्रामीण सड़कें या युवाओं में बेरोजगारी की सबसे सटीक समझ गांव के लोगों और ग्राम पंचायत को ही होती है। राजधानी में बैठकर तय की गई योजनाएं कई बार स्थानीय जरूरतों से मेल नहीं खातीं। यदि पंचायतों को पर्याप्त वित्तीय अधिकार, पारदर्शी बजट और योजनाएं तय करने की आजादी मिले, तो विकास कार्य ज्यादा असरदार और टिकाऊ साबित होंगे। संविधान के 73वें संशोधन ने पंचायतों को 29 विषयों की जिम्मेदारी देकर संवैधानिक ढांचा तो दिया, लेकिन इसका पूरा लाभ तभी मिलेगा जब राज्यों द्वारा वित्तीय संसाधन और प्रशासनिक क्षमता सीधे पंचायतों के सुपुर्द की जाए।
इसके साथ ही, पंचायती राज व्यवस्था के सामने खड़ी चुनावी विसंगतियों पर मंथन जरूरी है। लोकतंत्र की इस बुनियादी इकाई के चुनावों में बढ़ता बेहिसाब खर्च, फिजूलखर्ची, दिखावे की होड़ और धनबल का बढ़ता प्रभाव योग्य और सामान्य पृष्ठभूमि के व्यक्तियों के लिए बाधा बनता जा रहा है। पंचायत चुनाव किसी की आर्थिक हैसियत आंकने का जरिया नहीं, बल्कि सेवा और विकास की जिम्मेदारी सौंपने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। इन चुनावों को चौपाल बैठकों, आपसी संवाद और स्थानीय प्राथमिकताओं पर केंद्रित होना चाहिए, ताकि मितव्ययिता और पारदर्शिता की मिसाल कायम हो सके।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था देश की कुल मांग और उत्पादन का मजबूत आधार है। कृषि, पशुपालन, डेयरी, हस्तशिल्प और लघु उद्यम जैसे क्षेत्रों में जब आय बढ़ती है, तो ग्रामीण बाजारों में मांग का दायरा बढ़ता है, जिसका सीधा लाभ राष्ट्रीय उद्योगों और सेवा क्षेत्र को मिलता है। राजस्थान के संदर्भ में सौर ऊर्जा, ऊन, हस्तशिल्प और ग्रामीण पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं, जिन्हें ग्राम पंचायतें सामुदायिक भागीदारी के जरिए बड़े स्तर पर विकसित कर सकती हैं।
पंचायती राज की असली आत्मा ग्राम सभा में बसती है। नियमित ग्राम सभाओं के जरिए जब योजनाओं का सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) और प्राथमिकताओं का निर्धारण होगा, तब भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और जवाबदेही तय होगी। महिलाओं, युवाओं और किसानों की सक्रिय भागीदारी से निर्णय प्रक्रिया अधिक समावेशी और संवेदनशील बनती है।
नागौर से 1959 में शुरू हुआ सफर अब केवल जन-प्रतिनिधि चुनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि गांवों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर इकाई बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। जब गांव समृद्ध होंगे, पंचायतें आर्थिक रूप से सक्षम बनेंगी और स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ेगा, तभी एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित भारत का सपना धरातल पर साकार होगा।





