





डॉ. संतोष राजपुरोहित
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सरकार द्वारा समय-समय पर गरीबों, किसानों, महिलाओं, विद्यार्थियों, श्रमिकों, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएँ शुरू की जाती हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि लोगों के जीवन स्तर में सुधार करना, अवसरों की समानता बढ़ाना और सामाजिक-आर्थिक विकास को गति देना है। पिछले कुछ वर्षों में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण अर्थात डायरेक्ट बेनिफिट ट्रान्सफर (डीबीटी) ने लाभार्थियों तक सीधे धन पहुँचाने की व्यवस्था को मजबूत किया है और पारंपरिक बिचौलियों की भूमिका को काफी हद तक कम किया है।
फिर भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न आज भी हमारे सामने है, क्या सरकारी योजना घोषित होने का अर्थ यह है कि उसका पूरा लाभ प्रत्येक पात्र व्यक्ति तक पहुँच गया? इसका उत्तर हमेशा हाँ नहीं हो सकता। समस्या अब केवल बिचौलियों की नहीं है; समस्या योजना की पूरी प्रक्रिया को प्रभावी बनाने की है। पुरानी व्यवस्था में अनेक प्रकार के भुगतान कई प्रशासनिक स्तरों से होकर लाभार्थी तक पहुँचते थे। इस प्रक्रिया में देरी, गलत लाभार्थी, फर्जी नाम और धन के दुरुपयोग जैसी समस्याओं की संभावना रहती थी। डीबीटी ने इस व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। अब पात्र लाभार्थी के बैंक खाते में सहायता राशि सीधे भेजी जा सकती है।
जनधन खाते, आधार और मोबाइल जैसी व्यवस्थाओं ने इस प्रक्रिया को और मजबूत किया है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि सरकार द्वारा भेजी गई राशि के रास्ते में अनावश्यक बिचौलियों की भूमिका कम हुई है। भुगतान की डिजिटल निगरानी संभव हुई है और सरकारी धन के प्रवाह में पारदर्शिता बढ़ी है। इस दृष्टि से यह कहना उचित होगा कि डीबीटी ने “पैसा किसके हाथ से होकर गया” वाली समस्या को काफी हद तक कम किया है। लेकिन इसके साथ ही एक नई और अधिक महत्वपूर्ण चुनौती सामने आती है, क्या सही व्यक्ति की पहचान हुई? क्या उसका नाम लाभार्थी सूची में है? क्या वह योजना के लिए पात्र है? क्या उसका बैंक खाता सही है? क्या उसे समय पर लाभ मिला?
मान लीजिए सरकार ने किसी परिवार को आर्थिक सहायता देने की योजना बनाई। यदि सहायता राशि सीधे उसके बैंक खाते में पहुँच जाती है, तो डीबीटी सफल माना जाएगा। लेकिन यदि पात्र परिवार का नाम ही लाभार्थी सूची में नहीं है, तो उसे डीबीटी मिलेगा ही नहीं। इसलिए सरकारी योजना की सफलता को केवल बैंक खाते में पैसा पहुँचने से नहीं मापा जा सकता। योजना की पूरी प्रक्रिया को देखना होगा।
योजना,पात्र व्यक्ति की पहचान, आवेदन या पंजीकरण, सत्यापन ,स्वीकृति, डीबीटी, लाभ का वास्तविक उपयोग, परिणाम इस पूरी श्रृंखला में किसी एक चरण की कमजोरी अंतिम परिणाम को प्रभावित कर सकती है।
भारत की जनसंख्या बहुत बड़ी और सामाजिक-आर्थिक रूप से विविध है। गरीब और जरूरतमंद परिवारों की स्थिति भी समय के साथ बदलती रहती है। किसी परिवार की आय बढ़ सकती है, किसी परिवार की आय कम हो सकती है, कोई व्यक्ति रोजगार खो सकता है और कोई नया परिवार सहायता का पात्र बन सकता है।
इसलिए लाभार्थी सूची का समय-समय पर अद्यतन होना आवश्यक है। यदि डेटा पुराना है, तो दो प्रकार की समस्या पैदा हो सकती है, पात्र व्यक्ति छूट सकता है और अपात्र व्यक्ति लाभ प्राप्त कर सकता है। इसलिए भविष्य की योजनाओं में केवल डिजिटल डेटा बनाना पर्याप्त नहीं होगा; डेटा की गुणवत्ता और उसका नियमित अद्यतन भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
डीबीटी और ऑनलाइन सेवाओं ने सरकारी योजनाओं को अधिक पारदर्शी बनाया है, लेकिन डिजिटल व्यवस्था की अपनी चुनौतियाँ भी हैं। हर व्यक्ति के पास स्मार्टफोन, इंटरनेट, डिजिटल ज्ञान या ऑनलाइन आवेदन करने की क्षमता नहीं होती। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्ग, अत्यंत गरीब, अशिक्षित और तकनीकी रूप से कमजोर लोग डिजिटल प्रक्रिया में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। इसलिए डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य ‘सरकार से नागरिक की दूरी बढ़ाना’ नहीं, बल्कि ‘सरकार को नागरिक के और करीब लाना’ होना चाहिए। ऑनलाइन व्यवस्था के साथ ग्राम पंचायत, सेवा केंद्र और स्थानीय सहायता व्यवस्था मजबूत करना आवश्यक है, ताकि डिजिटल सुविधा से वंचित व्यक्ति भी अपने अधिकार से वंचित न हो।
डीबीटी ने भुगतान के स्तर पर मध्यस्थता को कम किया है, लेकिन योजना का क्रियान्वयन केवल बैंक खाते तक सीमित नहीं है। स्कूल, अस्पताल, राशन, आवास, सिंचाई, रोजगार, कृषि सेवाएँ और सामाजिक सुरक्षा जैसी अनेक योजनाओं में स्थानीय प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। यदि किसी योजना के लिए प्रमाणपत्र चाहिए, सत्यापन चाहिए, जमीन का रिकॉर्ड चाहिए, स्वास्थ्य सुविधा चाहिए या स्थानीय स्तर पर कोई सेवा उपलब्ध करानी है, तो प्रशासनिक व्यवस्था की क्षमता निर्णायक हो जाती है। इसलिए डीबीटी के बाद भी ‘मध्यस्थता’ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है; उसका स्वरूप बदल गया है। अब चुनौती यह है कि प्रशासनिक प्रक्रिया नागरिक के लिए सरल, पारदर्शी और जवाबदेह बने।
सरकारी योजनाओं की चर्चा होते ही अक्सर भ्रष्टाचार की बात होती है। भ्रष्टाचार निश्चित रूप से एक गंभीर समस्या हो सकता है, लेकिन हर असफलता को भ्रष्टाचार का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। कई बार योजना का लाभ इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि कर्मचारी पर्याप्त नहीं हैं, प्रक्रिया जटिल है, डेटा अपडेट नहीं है, तकनीकी समस्या है, आवेदन अधूरा है या विभागों के बीच समन्वय कमजोर है। इसलिए सुधार की रणनीति केवल भ्रष्टाचार रोकने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। प्रशासनिक दक्षता, प्रशिक्षण, तकनीकी क्षमता और जवाबदेही पर भी समान ध्यान देना होगा।
सरकारी योजनाओं की सफलता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितनी राशि खर्च हुई या कितने लोगों के खाते में पैसा भेजा गया।
असली प्रश्न होना चाहिए, क्या उस सहायता से परिवार की आय बढ़ी? क्या बच्चे की शिक्षा बेहतर हुई? क्या किसान की उत्पादकता बढ़ी? क्या महिला की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ी? क्या स्वास्थ्य में सुधार आया? क्या गरीबी वास्तव में कम हुई? अर्थात हमें इनपुट और आउटपुट से आगे बढ़कर आउटकम और इम्पेक्ट पर ध्यान देना होगा।
यदि किसी योजना पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए लेकिन लोगों के जीवन में अपेक्षित परिवर्तन नहीं आया, तो केवल खर्च की मात्रा को सफलता नहीं माना जा सकता। सरकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कुछ बुनियादी सुधार आवश्यक हैं। पहला, लाभार्थियों का डेटा नियमित रूप से अपडेट होना चाहिए। दूसरा, आवेदन और सत्यापन की प्रक्रिया सरल होनी चाहिए। तीसरा, डीबीटी को मजबूत करते हुए बैंकिंग और डिजिटल सुविधा से वंचित लोगों के लिए वैकल्पिक सहायता व्यवस्था होनी चाहिए।
चौथा, सामाजिक अंकेक्षण और सार्वजनिक निगरानी को बढ़ावा देना चाहिए। पाँचवाँ, शिकायतों का समयबद्ध समाधान होना चाहिए। छठा, प्रत्येक बड़ी योजना का मूल्यांकन केवल खर्च और लाभार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि वास्तविक सामाजिक-आर्थिक परिणामों से किया जाना चाहिए।
भारत में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की दिशा में डीबीटी एक महत्वपूर्ण सुधार है। इसने सीधे भुगतान, पारदर्शिता और बिचौलियों पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसलिए आज सरकारी योजनाओं की समस्या को केवल ‘बिचौलियों के कारण लाभ नहीं पहुँचता’ कहकर समझना पर्याप्त नहीं है।
आज की वास्तविक चुनौती अधिक व्यापक है, सही व्यक्ति की पहचान, पात्रता का निर्धारण, सरल प्रक्रिया, डिजिटल समावेशन, मजबूत स्थानीय प्रशासन, समयबद्ध शिकायत निवारण और अंततः वास्तविक परिणाम।
सरकार की योजना तभी सफल मानी जानी चाहिए जब वह कागज से निकलकर पात्र नागरिक तक पहुँचे और नागरिक के जीवन में वास्तविक परिवर्तन पैदा करे।
विकास का सही पैमाना यह नहीं है कि सरकार ने कितनी योजनाएँ बनाईं, बल्कि यह है कि उन योजनाओं से आम नागरिक के जीवन में कितना सुधार आया। यही ‘योजना से परिणाम’ की वह यात्रा है, जो भारत के कल्याणकारी राज्य को वास्तव में प्रभावी और जन-केंद्रित बना सकती है।






