



भटनेर पोस्ट ब्यूरो
पटना की सड़कों पर रविवार यानी 1 नवंबर को एक अलग ही दृश्य था। हजारों सिरों पर गुलाबी रंग का पाग, कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ते लोग और चेहरों पर गंभीरता। न कोई नारा, न शोर-शराबा और न ही किसी के खिलाफ आक्रोश का प्रदर्शन। लेकिन इस खामोशी के भीतर वर्षों की पीड़ा, अपेक्षाएं और राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल साफ महसूस किया जा सकता था। मिलर हाई स्कूल मैदान से बिहार विधानसभा के निकट सातमूर्ति चौराहे तक निकली मौन संकल्प पदयात्रा में मिथिलांचल के ब्राह्मण समाज ने अपनी एकजुटता का ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने बिहार ही नहीं, उत्तर भारत की राजनीति में भी नई चर्चा छेड़ दी है।
लोकमंच के संस्थापक एवं अध्यक्ष आशीष कुमार उर्फ बब्बू झा के नेतृत्व में आयोजित इस महाजुटान की सबसे खास बात इसका अनुशासन और मौन था। समाज के लोगों ने अपनी मांगों को नारेबाजी के बजाय सामूहिक उपस्थिति से अभिव्यक्त किया। सातमूर्ति चौराहे पर महापुरुषों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण के साथ यात्रा का समापन हुआ। आयोजकों का संदेश था-यह किसी के विरोध में निकला आंदोलन नहीं, बल्कि सरकार से संवाद स्थापित करने और समाज की उचित भागीदारी सुनिश्चित कराने का लोकतांत्रिक प्रयास है। बब्बू झा का कहना था, ‘हमारा मौन ही हमारा संकल्प है।’
लोकमंच वर्ष 2004 से सामाजिक गोलबंदी और संगठन के लिए काम कर रहा है। इस बार उठाई गई मांगों में ब्राह्मण कल्याण बोर्ड का गठन प्रमुख है। संगठन चाहता है कि समाज की वास्तविक आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक स्थिति जानने के लिए सर्वे कराया जाए तथा सरकार श्वेतपत्र जारी करे। अक्षय तृतीया यानी परशुराम जयंती पर सार्वजनिक अवकाश की मांग भी उठाई गई। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के विद्यार्थियों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में आयु सीमा और प्रयासों की संख्या में छूट, मुफ्त कोचिंग तथा नवोदय और केंद्रीय विद्यालयों में विशेष नामांकन व्यवस्था की मांग इस आंदोलन को एक अलग आयाम देती है। यह स्पष्ट करता है कि आयोजक केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात नहीं कर रहे, बल्कि शिक्षा और रोजगार के अवसरों में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की हिस्सेदारी भी चाहते हैं। 1506 एकड़ रैयती जमीन का मामला भी पदयात्रा में प्रमुखता से उठा। आयोजकों का दावा है कि वर्ष 1990 से इस जमीन पर अवैध कब्जा है। उन्होंने सरकार से कानूनी कार्रवाई कर जमीन वास्तविक हकदारों को लौटाने की मांग की।

इस आयोजन का राजनीतिक महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि ब्राह्मण समाज को भाजपा का परंपरागत समर्थक वर्ग माना जाता रहा है। उत्तर प्रदेश में भी पार्टी के सामाजिक आधार में इस समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में पटना में ब्राह्मणों की इतनी बड़ी एकजुटता और अधिकारों को लेकर मुखरता भाजपा के लिए विचार करने का विषय हो सकती है।
खासकर तब, जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीतिक तैयारियां तेज हो रही हैं। ब्राह्मण प्रतिनिधित्व, राजनीतिक नियुक्तियों, संगठन में भागीदारी और सामाजिक सम्मान जैसे सवाल चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, पटना की पदयात्रा को सीधे भाजपा के खिलाफ राजनीतिक लामबंदी मानना जल्दबाजी होगी। आयोजकों ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य किसी दल का विरोध नहीं, बल्कि सरकार से अपनी मांगों पर संवाद करना है।
फिर भी राजनीतिक दलों के लिए यह संदेश महत्वपूर्ण है कि किसी भी समुदाय का समर्थन हमेशा स्थायी नहीं माना जा सकता। सामाजिक अपेक्षाओं की अनदेखी होने पर अपने ही परंपरागत समर्थक वर्ग के भीतर सवाल उठने लगते हैं।
भाजपा के सामने सबसे अहम सवाल यह है कि वह इस तरह उठ रही मांगों पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देती है। क्या बिहार सरकार ब्राह्मण कल्याण बोर्ड और सामाजिक सर्वे जैसे प्रस्तावों पर बातचीत शुरू करेगी? क्या आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों की मांगों पर कोई ठोस पहल होगी? और क्या उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवालों को अधिक गंभीरता से लिया जाएगा? दूसरी ओर, विपक्षी दल भी इस घटनाक्रम को सामाजिक संवाद के अवसर के रूप में देख सकते हैं। लेकिन केवल असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने की कोशिश पर्याप्त नहीं होगी। समाज की मांगों पर स्पष्ट रुख और भरोसेमंद पहल जरूरी होगी।
पटना की सड़कों पर गुलाबी पाग पहनकर निकले लोगों ने कोई राजनीतिक नारा नहीं लगाया, लेकिन उनकी सामूहिक कदमताल ने कई सवाल खड़े कर दिए। इस यात्रा का वास्तविक प्रभाव इस बात से तय होगा कि सरकार उनकी मांगों पर कितना आगे बढ़ती है और राजनीतिक दल सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल को कितनी गंभीरता से लेते हैं। इतना तय है कि इस बार विप्र समाज ने अपनी बात कहने के लिए आवाज ऊंची नहीं की, बल्कि मौन को माध्यम बनाया। अब बारी सत्ता और सियासत की है कि वह इस मौन का अर्थ समझती है या इसे भी एक सामान्य आयोजन मानकर आगे बढ़ जाती है।






