





डॉ. संतोष राजपुरोहित
चीनी भारतीय रसोई की ऐसी वस्तु है जिसकी कीमत में छोटा-सा बदलाव भी आम आदमी के बजट, मिठाई उद्योग, चाय-कॉफी से लेकर त्योहारों की खुशियों तक को प्रभावित करता है। पिछले कुछ सप्ताह में चीनी के दाम जिस तेजी से बढ़े हैं, उसने आर्थिक बहस के साथ-साथ राजनीतिक चिंता भी पैदा कर दी है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के अनुसार 20 जुलाई 2026 को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत 48.18 रुपए प्रति किलोग्राम थी, जो 20 अगस्त को बढ़कर 55.70 रुपए हो गई, लगभग 16 प्रतिशत की वृद्धि। वहीं कुछ बाजारों में खुदरा भाव 70 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गयी हैं।
चीनी की मौजूदा महंगाई को केवल एक कारण से समझना उचित नहीं होगा। सरकार के अनुसार इस वर्ष चीनी उत्पादन का अनुमान लगभग 306 लाख टन है, जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों के शुरुआती अनुमान में यह लगभग 343 लाख टन था। महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में अत्यधिक बारिश, जलभराव जैसी समस्याओं ने गन्ने की उत्पादकता और रिकवरी को प्रभावित किया है।

इसके साथ ही त्योहारों का मौसम सामने है। अगस्त से नवंबर तक गणेशोत्सव, दशहरा और दीपावली के कारण मिठाई, बेकरी और कन्फेक्शनरी उद्योग में चीनी की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार भी दबाव में है। सरकार के अनुसार अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमत 30 जून के लगभग 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 20 अगस्त को 552 डॉलर हो गई, यानी दो महीनों से भी कम समय में 16 प्रतिशत से अधिक वृद्धि। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, क्या चीनी को इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल करने के कारण यह संकट पैदा हुआ है?

इथेनॉल नीति ने गन्ना अर्थव्यवस्था को एक नया बाजार दिया है। अतिरिक्त चीनी को इथेनॉल में बदलने से मिलों की वित्तीय स्थिति सुधरती है और किसानों के गन्ना भुगतान में मदद मिलती है। सरकार का कहना है कि चीनी से इथेनॉल की ओर डायवर्जन का हिस्सा 2022-23 के लगभग 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में करीब 9 प्रतिशत हो गया है तथा देश में बनने वाले इथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, विशेषकर मक्का, से आता है। इसलिए सरकार मौजूदा मूल्यवृद्धि को सीधे इथेनॉल से जोड़ने को सही नहीं मानती।
फिर भी इथेनॉल बहस को पूरी तरह खारिज करना भी उचित नहीं है। उद्योग के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष लगभग 30 लाख टन चीनी इथेनॉल उत्पादन की ओर गई है। साथ ही शुरुआती स्टॉक घटा है और घरेलू उपलब्धता पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना है। रॉयटर्स के अनुसार 2026-27 की शुरुआत में शुरुआती स्टॉक लगभग 35 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि पिछले वर्ष यह करीब 50 लाख टन था। अर्थात समस्या का सही निष्कर्ष यह है कि इथेनॉल अकेला दोषी नहीं है, लेकिन चीनी-इथेनॉल संतुलन को बाजार की परिस्थितियों के अनुसार लगातार पुनःसमायोजित करना आवश्यक है।

चीनी की कीमत बढ़ने का प्रभाव उसके विकल्प गुड़ पर भी दिखाई दे रहा है। अगस्त में महाराष्ट्र में गुड़ की खुदरा कीमत 60रुपए प्रति किलो से ऊपर पहुंच गई, जबकि विभिन्न थोक बाजारों में कीमत लगभग 3,500रूपए से 5,400रुपए प्रति क्विंटल रही। राजस्थान में औसत भाव लगभग 5,400 रुपए प्रति क्विंटल बताया गया। त्योहारी मांग, बारिश के कारण परिवहन और भंडारण की कठिनाइयां तथा चीनी की बढ़ी लागत ने गुड़ को भी महंगा किया है। इसका अर्थ यह है कि उपभोक्ता के पास चीनी छोड़कर गुड़ अपनाने का विकल्प भी इस समय सस्ता विकल्प नहीं रह गया है।

सरकार ने पहले ही ड्यूटी-फ्री कच्ची चीनी के 10 लाख टन आयात की अनुमति देने तथा अक्टूबर से पेराई जल्द शुरू करने जैसे कदम उठाए हैं। लेकिन केवल तत्काल उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। पहला, जमाखोरी और सट्टेबाजी पर कठोर निगरानी होनी चाहिए। यदि पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, तो बाजार-व्यवहार की जांच आवश्यक है।
दूसरा, इथेनॉल नीति में लचीला तंत्र होना चाहिए। जब चीनी उत्पादन कम हो तो इथेनॉल डायवर्जन की मात्रा को बाजार की उपलब्धता के अनुरूप समायोजित किया जा सकता है। तीसरा, आयात-निर्यात नीति को पूर्वानुमेय बनाया जाना चाहिए। अचानक प्रतिबंध या अचानक आयात बाजार में अनिश्चितता बढ़ाते हैं। एक पारदर्शी ट्रिगर-आधारित व्यवस्था अधिक प्रभावी होगी।

चौथा, गन्ने की खेती में जलवायु-लचीली किस्मों, बेहतर सिंचाई, रोग नियंत्रण और फसल विविधीकरण पर निवेश बढ़ाना होगा। मौजूदा संकट का एक बड़ा हिस्सा उत्पादन संबंधी जोखिमों से जुड़ा है। और सबसे महत्वपूर्ण, उपभोक्ता तथा किसान के हितों में संतुलन बनाना होगा। बहुत कम चीनी कीमत किसान को नुकसान पहुंचाएगी, जबकि बहुत अधिक कीमत उपभोक्ता को।
भारत का राजनीतिक इतिहास बताता है कि रसोई की महंगाई को हल्के में लेना किसी सरकार के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। 1980 में प्याज की महंगाई विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक हथियार बनी और 1998 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्याज की कीमतों ने तत्कालीन भाजपा सरकार के खिलाफ जनभावना को प्रभावित किया। विश्व बैंक ने भी 1998 के प्याज संकट को दिल्ली में सत्तारूढ़ दल की हार से जोड़ते हुए इसे खाद्य कीमतों और राजनीति के महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में दर्ज किया है।
चीनी और प्याज की राजनीतिक संवेदनशीलता भारतीय समाज मे लगभग समान है। प्याज रोजमर्रा की भारतीय भोजन-व्यवस्था में अधिक प्रत्यक्ष और व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है। लेकिन चीनी का मामला भी अलग नहीं हैकृत्योहारों के ठीक पहले इसकी कीमत बढ़ना जनता की महंगाई की धारणा को प्रभावित करता है। खासकर तब, जब इसके साथ गुड़, मिठाई और अन्य खाद्य वस्तुओं के दाम भी बढ़ रहे हों।
राजनीति में जनता केवल यह नहीं देखती कि कीमत क्यों बढ़ी; वह यह भी देखती है कि सरकार ने कीमत बढ़ने से पहले क्या किया और बढ़ने के बाद कितनी तेजी से प्रतिक्रिया दी। यही कारण है कि चीनी की मौजूदा तेजी को सरकार के लिए केवल आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रबंधन की परीक्षा भी माना जाना चाहिए।
चीनी की वर्तमान महंगाई को ‘इथेनॉल बनाम उपभोक्ता’ की सरल बहस में सीमित करना गलत होगा। उत्पादन में कमी, मौसमीय क्षति, कम शुरुआती स्टॉक, त्योहारी मांग, वैश्विक कीमतें और बाजार की सट्टेबाजी, सभी ने मिलकर परिस्थिति बनाई है। सरकार के पास फिलहाल पर्याप्त स्टॉक होने की बात कही जा रही है, इसलिए वास्तविक चुनौती कमी से अधिक बाजार-विश्वास और कीमतों की अपेक्षाओं को नियंत्रित करने की है।
सरकार यदि समय रहते आपूर्ति बढ़ाती है, जमाखोरी रोकती है, इथेनॉल और चीनी के बीच संतुलन बनाती है तथा किसान और उपभोक्ता दोनों के हितों की रक्षा करती है, तो यह संकट नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन यदि रसोई की महंगाई लंबे समय तक बनी रही, तो इतिहास का सबक स्पष्ट है, जनता आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन अंततः अपनी रसोई के बजट से करती है।
चीनी की मिठास इसलिए केवल बाजार का विषय नहीं है; यह किसान की आय, उपभोक्ता की जेब और सरकार के प्रति जनविश्वास, तीनों का प्रश्न है।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं







