



डॉ. संतोष राजपुरोहित
बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, लंबे होते सूखे, अचानक आने वाली बाढ़, लू की बढ़ती तीव्रता और शहरों में दमघोंटू हवा अब भविष्य की आशंकाएँ नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान की वास्तविकता हैं। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण प्रदूषण ने विकास की उस अवधारणा पर गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है जिसमें उत्पादन और उपभोग तो बढ़ते रहे, लेकिन उनकी पर्यावरणीय कीमत को लगभग नजरअंदाज किया गया। आज आवश्यकता इस प्रश्न पर विचार करने की है कि यदि किसी उद्योग या उपभोक्ता की गतिविधि से पूरे समाज को पर्यावरणीय नुकसान होता है, तो उसकी कीमत कौन चुकाए?
अर्थशास्त्र इस प्रश्न का उत्तर लगभग एक शताब्दी पहले तलाशना शुरू कर चुका था। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ए.सी. पिगू और बाद में नोबेल पुरस्कार विजेता रॉनाल्ड कोस के विचार आज के जलवायु संकट को समझने और उससे निपटने के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक दिखाई देते हैं।

कल्पना कीजिए कि एक कारखाना उत्पादन करके लाभ कमाता है, लेकिन उसकी चिमनियों से निकलने वाला धुआँ आसपास रहने वाले लोगों को बीमार करता है। बीमारी का इलाज परिवार करवाता है, प्रदूषित हवा का नुकसान पूरा समाज सहता है और पर्यावरण की क्षति आने वाली पीढ़ियाँ भी भुगतती हैं। लेकिन इन नुकसानों की पूरी कीमत उस वस्तु की बाजार कीमत में शामिल नहीं होती।
अर्थशास्त्र की भाषा में इसे नकारात्मक बाह्यता कहा जाता है। उत्पादक अपनी निजी लागत तो चुकाता है, लेकिन उसके कारण समाज पर पड़ने वाली बाहरी लागत का बड़ा हिस्सा दूसरे लोग वहन करते हैं। यही पर्यावरणीय बाजार विफलता की जड़ है। जब प्रदूषण करना लगभग मुफ्त हो और उसकी कीमत समाज चुका रहा हो, तो प्रदूषण कम करने के लिए बाजार के भीतर पर्याप्त आर्थिक प्रोत्साहन पैदा नहीं होता।

ब्रिटिश अर्थशास्त्री ए.सी. पिगू ने इसका सीधा समाधान सुझाया। यदि किसी आर्थिक गतिविधि से समाज को अतिरिक्त नुकसान हो रहा है तो उस गतिविधि पर उसकी बाहरी सामाजिक लागत के अनुरूप कर लगाया जाना चाहिए। इसे आज पिगू कर कहा जाता है। वर्तमान जलवायु संकट में इसका सबसे चर्चित रूप कार्बन टैक्स है। इसका मूल सिद्धांत बहुत सरल है, जो अधिक कार्बन उत्सर्जित करे, वह अधिक कीमत चुकाए।
कोयला, पेट्रोलियम और अन्य जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से होने वाले उत्सर्जन की पर्यावरणीय लागत यदि उनकी कीमत में शामिल कर दी जाए, तो प्रदूषणकारी उत्पादन अपेक्षाकृत महँगा और स्वच्छ ऊर्जा अपेक्षाकृत आकर्षक होने लगती है। इससे उद्योगों को ऊर्जा दक्ष तकनीक अपनाने, नवीकरणीय ऊर्जा की ओर जाने और कार्बन उत्सर्जन कम करने का आर्थिक प्रोत्साहन मिलता है।

यहाँ कर का उद्देश्य केवल सरकारी खजाना भरना नहीं है। वास्तविक उद्देश्य उस लागत को वापस उत्पादक और उपभोक्ता के आर्थिक निर्णय में शामिल करना है जिसे अब तक समाज मुफ्त में सह रहा था। इसे अर्थशास्त्र में बाह्य लागत का आंतरिकीकरण कहा जाता है।
पिगू कर से प्राप्त राजस्व का उपयोग यदि सार्वजनिक परिवहन, सौर और पवन ऊर्जा, हरित प्रौद्योगिकी, वनीकरण तथा प्रदूषण से अधिक प्रभावित गरीब परिवारों की सहायता में किया जाए तो यह नीति और प्रभावी हो सकती है। लेकिन समस्या इतनी सरल भी नहीं है। एक टन कार्बन उत्सर्जन से वास्तव में कितनी सामाजिक क्षति होती है, इसका सटीक आकलन कठिन है। बहुत अधिक कर उद्योग और रोजगार को प्रभावित कर सकता है, जबकि बहुत कम कर प्रदूषण रोकने में प्रभावहीन रह सकता है। ऊर्जा पर कर का भार निम्न आय वाले परिवारों पर अनुपात से अधिक पड़ने का खतरा भी रहता है।
इसलिए पिगू कर लगाना जितना महत्वपूर्ण है, उससे प्राप्त राजस्व का न्यायपूर्ण उपयोग भी उतना ही आवश्यक है। रॉनाल्ड कोस ने पर्यावरणीय बाह्यताओं को एक अलग नजरिए से देखा। उनका विचार था कि यदि संपत्ति-अधिकार स्पष्ट हों, लेन-देन की लागत कम हो और प्रभावित पक्ष आपस में बातचीत कर सकें, तो कई परिस्थितियों में वे आपसी समझौते से बाह्यता की समस्या का कुशल समाधान खोज सकते हैं।

मान लीजिए किसी औद्योगिक इकाई द्वारा नदी में छोड़े जा रहे अपशिष्ट से कुछ किसानों और मछुआरों को नुकसान हो रहा है। यदि यह स्पष्ट हो कि स्वच्छ जल पर किसका अधिकार है, नुकसान को मापा जा सकता है और संबंधित पक्षों की संख्या सीमित है, तो उद्योग और प्रभावित समुदाय आपस में समझौता कर सकते हैं। उद्योग प्रदूषण नियंत्रण उपकरण लगा सकता है, प्रभावित लोगों को क्षतिपूर्ति दे सकता है अथवा किसी अन्य पारस्परिक रूप से स्वीकार्य व्यवस्था तक पहुँचा जा सकता है।
यही कोस प्रमेय का केंद्रीय संदेश हैकृकई बार स्पष्ट अधिकार और प्रभावी सौदेबाजी भी पर्यावरणीय समस्या के समाधान का मार्ग बन सकते हैं।
कोस का समाधान छोटे और स्थानीय विवादों में जितना आकर्षक दिखाई देता है, वैश्विक जलवायु परिवर्तन में उतना ही कठिन हो जाता है। कार्बन उत्सर्जन किसी एक गाँव, शहर या देश तक सीमित नहीं रहता। एक स्थान पर किया गया उत्सर्जन पृथ्वी के दूसरे हिस्से में रहने वाले लोगों और भविष्य की पीढ़ियों को भी प्रभावित कर सकता है।
आखिर अरबों लोग एक-दूसरे से बैठकर यह सौदा कैसे करेंगे कि कौन कितना कार्बन छोड़े और किसे कितनी क्षतिपूर्ति मिले? यहीं लेन-देन लागत इतनी अधिक हो जाती है कि शुद्ध कोसियन समाधान व्यावहारिक नहीं रह जाता। इसलिए वैश्विक जलवायु परिवर्तन में सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और देशों के बीच सामूहिक कार्रवाई अनिवार्य हो जाती है।
पर्यावरण नीति में अक्सर यह बहस होती है कि समाधान सरकार दे या बाजार। लेकिन आज की चुनौती इतनी व्यापक है कि इसे ‘सरकार बनाम बाजार’ की बहस में सीमित करना उचित नहीं होगा।
जहाँ लाखों उत्पादक और उपभोक्ता प्रदूषण में योगदान कर रहे हों, वहाँ कार्बन टैक्स और प्रदूषण कर जैसे पिगूवादी उपाय उपयोगी हैं। जहाँ प्रदूषण स्थानीय है, प्रभावित पक्ष सीमित हैं और अधिकार स्पष्ट किए जा सकते हैं, वहाँ कोसियन सौदेबाजी प्रभावी हो सकती है। इनके साथ उत्सर्जन व्यापार, पर्यावरणीय मानक, हरित सब्सिडी और तकनीकी नवाचार को भी जोड़ा जा सकता है। प्रदूषण की कीमत $ स्पष्ट पर्यावरणीय अधिकार $ बाजार प्रोत्साहन $ प्रभावी नियमन $ हरित तकनीक।
भारत जैसे विकासशील देश के सामने चुनौती अधिक जटिल है। हमें आर्थिक विकास, रोजगार और ऊर्जा सुरक्षा भी चाहिए तथा स्वच्छ हवा, पानी और जलवायु सुरक्षा भी। इसलिए समाधान आर्थिक गतिविधियों को रोकना नहीं, बल्कि उनकी दिशा बदलना है।
कार्बन मूल्य निर्धारण के साथ नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा, स्वच्छ सार्वजनिक परिवहन, ऊर्जा दक्ष उद्योग, कचरा प्रबंधन और हरित तकनीक में निवेश ऐसा रास्ता प्रदान कर सकते हैं जिसमें विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी न माना जाए।
विशेष रूप से यह ध्यान रखना होगा कि पर्यावरणीय करों का भार गरीब परिवारों पर असमान रूप से न पड़े। यदि प्रदूषण से प्राप्त कर राजस्व का उपयोग हरित रोजगार, स्वच्छ ऊर्जा, सार्वजनिक परिवहन और कमजोर वर्गों की सहायता में किया जाए तो पर्यावरण नीति आर्थिक न्याय का माध्यम भी बन सकती है।
जलवायु संकट अंततः हमें अर्थशास्त्र का एक महत्वपूर्ण सबक सिखाता हैकृजिस चीज की कीमत बाजार में शून्य दिखाई देती है, उसकी सामाजिक कीमत भी शून्य हो, यह आवश्यक नहीं है। स्वच्छ हवा, स्वच्छ नदी और स्थिर जलवायु का कोई सामान्य बाजार मूल्य नहीं है, लेकिन मानव जीवन के लिए उनका मूल्य असाधारण है।
पिगू हमें बताते हैं कि प्रदूषण करने वाले को उसकी सामाजिक लागत का सामना कराना चाहिए। कोस हमें याद दिलाते हैं कि स्पष्ट अधिकार और उचित संस्थाएँ लोगों को समाधान खोजने की शक्ति दे सकती हैं।
आज आवश्यकता दोनों विचारों को साथ लेकर चलने की है। प्रदूषक को प्रदूषण की कीमत चुकानी होगी, समाज को पर्यावरण पर अपने अधिकार स्पष्ट करने होंगे और सरकार को ऐसे नियम बनाने होंगे जिनमें आर्थिक विकास की सफलता का पैमाना केवल अधिक उत्पादन नहीं, बल्कि बेहतर जीवन और सुरक्षित पर्यावरण भी हो। क्योंकि यदि किसी वस्तु की बाजार कीमत कम रखने के लिए हम स्वच्छ हवा, पानी और भविष्य की जलवायु को दाँव पर लगा रहे हैं, तो वास्तव में वह वस्तु सस्ती नहीं है, उसकी छिपी हुई कीमत समाज और आने वाली पीढ़ियाँ चुका रही हैं।





