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हनुमानगढ़ नगर निकाय चुनाव इस बार सिर्फ राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि आरक्षण के बाद बदलते सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों की भी परीक्षा बनने जा रहा है। हनुमानगढ़ नगरपरिषद के 60 वार्डों में आरक्षण की लॉटरी निकलने के बाद अब टिकटों की दावेदारी ने नया रंग लेना शुरू कर दिया है। खासकर अनारक्षित वार्डों में आरक्षित वर्ग से जुड़े प्रभावशाली संभावित उम्मीदवारों के नाम सामने आने के साथ ही सामान्य वर्ग के एक हिस्से में नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है।
सामान्य वर्ग से जुड़े लोगों का तर्क है कि जब एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षित वार्डों में संबंधित वर्ग के उम्मीदवारों को ही चुनाव लड़ने का अधिकार है, तो अनारक्षित वार्डों को केवल सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए क्यों नहीं रखा जाना चाहिए? उनका सवाल है कि यदि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को अनारक्षित वार्ड से चुनाव लड़ने की पूरी स्वतंत्रता है तो सामान्य वर्ग के लिए वास्तविक राजनीतिक अवसर आखिर कहां बचते हैं?

सामाजिक कार्यकर्ता अनिल अग्रवाल इस नाराजगी को सीधे तौर पर सामान्य वर्ग के हितों से जोड़ते हैं। उनका कहना है, ‘सामान्य वर्ग के हितों के खिलाफ शुरू से भेदभाव किया गया है। हर जगह आरक्षण है। अब सवर्ण समाज को राजनीति से भी विमुख किया जा रहा है। यह उचित नहीं है।’ अग्रवाल के मुताबिक सरकार को सामान्य वर्ग की स्थिति पर भी ध्यान देना चाहिए और ऐसी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए, जिसमें राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर किसी वर्ग को लगातार उपेक्षित महसूस न हो।
उनका सवाल है कि जब ओबीसी आरक्षित वार्ड में केवल ओबीसी, एससी आरक्षित वार्ड में केवल एससी वर्ग के उम्मीदवार चुनाव लड़ सकते हैं तो अनारक्षित वार्ड में सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए कोई विशेष संरक्षण क्यों नहीं? उनका दावा है कि अधिकांश अनारक्षित वार्डों में ओबीसी अथवा अन्य आरक्षित वर्ग के प्रभावशाली लोगों की दावेदारी सामने आने लगी है। ऐसे में सामान्य वर्ग के उन संभावित उम्मीदवारों के लिए मुकाबला शुरू होने से पहले ही मुश्किल खड़ी हो सकती है, जो वर्षों से अपने वार्ड में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे।

आरक्षण की लॉटरी का सबसे बड़ा असर उन राजनीतिक चेहरों पर पड़ा है, जिनके वार्ड आरक्षित हो गए हैं। इनमें कई ऐसे प्रभावशाली लोग भी हैं, जो लंबे समय से चुनावी तैयारी में जुटे थे। वार्ड आरक्षित होने के बाद उनकी राजनीतिक जमीन अचानक बदल गई। अब इनमें से कुछ दूसरे वार्डों में संभावनाएं तलाश रहे हैं तो कुछ अपने समर्थकों के जरिए राजनीतिक समीकरण बनाने में जुटे हैं।
इसी वजह से आरक्षण को लेकर चर्चा अब महज चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रही। शहर के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में इस बात को लेकर खेमेबंदी की आहट सुनाई देने लगी है कि अनारक्षित वार्डों से आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों की दावेदारी का किस तरह मुकाबला किया जाए।

नगरपरिषद के जिन वार्डों को अनारक्षित रखा गया है, उनमें वार्ड नंबर 3, 4, 5, 6, 7, 9, 11, 16, 17, 23, 24, 26, 27, 28, 30, 31, 32, 34, 39, 40, 42, 44, 51, 52 और 55 शामिल हैं। इन वार्डों में अब टिकट की लड़ाई सामान्य बनाम आरक्षित वर्ग के संभावित उम्मीदवारों के बीच नए राजनीतिक समीकरण पैदा कर सकती है।
हालांकि चुनाव में अंतिम फैसला मतदाता के हाथ में होगा और किसी उम्मीदवार की जीत या हार केवल उसकी जातीय पहचान से तय नहीं होती। व्यक्तिगत छवि, राजनीतिक संगठन, स्थानीय पकड़, सामाजिक समीकरण और वार्ड के मुद्दे भी निर्णायक भूमिका निभाएंगे। लेकिन मौजूदा माहौल यह संकेत जरूर दे रहा है कि आरक्षण की लॉटरी ने हनुमानगढ़ की चुनावी राजनीति में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या अनारक्षित वार्ड वास्तव में सभी वर्गों के लिए खुले रहेंगे या सामान्य वर्ग इसे अपने राजनीतिक अवसरों के लिए चुनौती के रूप में देखेगा? आने वाले दिनों में टिकट वितरण और उम्मीदवारों की घोषणा के साथ इस सवाल का असर और स्पष्ट दिखाई दे सकता है। फिलहाल इतना तय है कि नगरपरिषद चुनाव में मुकाबला सिर्फ दलों के बीच नहीं होगा; कई वार्डों में आरक्षण से पैदा हुए नए सामाजिक समीकरण भी चुनावी परिणाम की दिशा तय कर सकते हैं।






