







गोपाल झा
भटनेर का किला। वक्त की एक लंबी कहानी। यह युद्धों का साक्षी है। यह शौर्य का प्रतीक है। यह उन स्त्रियों की स्मृति भी है, जिन्होंने अस्मिता की रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए।
आज भटनेर दुर्ग जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। दीवारों पर समय की मार दिखाई देती है। बुर्ज खामोश हैं। लेकिन इतिहास खामोश नहीं हुआ। उसकी आवाज आज भी इन पत्थरों से सुनाई देती है।
कहा जाता है कि तैमूर लंग ने भटनेर को भारत का सबसे मजबूत किला बताया था। वर्ष 1398 में तैमूर ने भटनेर दुर्ग पर आक्रमण किया। उस समय यहां राजपूत शासक दुलचंद भाटी का शासन था। भाटी ने अपने सैनिकों के साथ उसका सामना किया। युद्ध भयंकर था। असंख्य सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। किले की महिलाओं ने भी अपने सामने आने वाली नियति को स्वीकार करने के बजाय जौहर का मार्ग चुना।
भटनेर के इतिहास की यह घटना उसे विशिष्ट बनाती है। कहा जाता है कि इस जौहर में हिंदू महिलाओं के साथ मुस्लिम महिलाओं ने भी भाग लिया था। उन्होंने भी अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए अग्निकुंड में प्राण समर्पित किए। यह प्रसंग इतिहास के पन्नों पर एक असाधारण अध्याय के रूप में दर्ज है।
भटनेर की कथा इससे भी पुरानी है। ऐतिहासिक स्रोतों में यहां वर्ष 479 में हुए पहले जौहर का उल्लेख मिलता है। उस समय देवराज भाटी यहां के शासक थे।
एक उजबेक राजा ने भटनेर पर आक्रमण किया था। युद्ध की विभीषिका के बीच रानियों और अन्य महिलाओं ने जौहर किया। यह घटना बताती है कि भटनेर केवल सत्ता का दुर्ग नहीं था। यहां सम्मान और अस्मिता को भी सर्वाेच्च माना जाता था।
भटनेर का भूगोल भी उसके इतिहास जितना महत्वपूर्ण था। यह उत्तर-पश्चिम भारत की ओर आने वाले आक्रमणों के रास्ते में एक मजबूत प्रहरी था।
इतिहास के जानकार डॉ. श्यामसुंदर शर्मा के अनुसार, यह दुर्ग प्रवेश द्वार की तरह था। इसी कारण अनेक शासकों की नजर इस पर रही। महमूद गजनवी आया। पृथ्वीराज चौहान आए। कुतुबुद्दीन ऐबक ने भी यहां दस्तक दी। शेर खान सहित कई आक्रमणकारियों ने भटनेर को जीतने का प्रयास किया। हर बार किले ने इतिहास की एक नई इबारत लिखी।
फिर वर्ष 1805 आया। बीकानेर के शासक सूरत सिंह ने भाटियों को पराजित कर भटनेर पर अधिकार कर लिया। कहा जाता है कि विजय का दिन मंगलवार था, यानी वीर हनुमान का दिन। इसी कारण भटनेर का नाम हनुमानगढ़ पड़ा।
नाम बदल गया। लेकिन किले की पहचान नहीं बदली। दुर्भाग्य यही है कि जिस दुर्ग ने सदियों का इतिहास देखा, आज वही उपेक्षा की धूल ओढ़े खड़ा है। हमने उसकी कहानी सुनना कम कर दिया। हमने उसके गौरव को महसूस करना कम कर दिया। नई पीढ़ी के सामने उसके इतिहास को जीवित रखना अब हमारी जिम्मेदारी है।
इसी स्मृति को फिर जगाने का प्रयास है भटनेर जौहर स्मृति महोत्सव। आयोजन 4 अक्टूबर को शाम 4 बजे होगा। यह हनुमानगढ़ में इस तरह का पहला आयोजन है। सामाजिक कार्यकर्ता अभिमन्यु सिंह राजवी ऐसे आयोजनों को आगे बढ़ा रहे हैं।
राजवी का कहना है कि पूर्वजों को याद करना केवल अतीत को याद करना नहीं है। यह अपनी जड़ों से जुड़ना है। यह आने वाली पीढ़ी को अपनी विरासत सौंपना है।
भटनेर का किला आज भी खड़ा है। थका हुआ है। टूटा हुआ है। लेकिन झुका नहीं है। उसकी दीवारों पर समय के निशान हैं। उनमें शौर्य की चमक भी है। जौहर की अग्नि भी है। बलिदान की गाथा भी है। जरूरत केवल इतनी है कि हम उन पत्थरों की भाषा फिर से पढ़ें। क्योंकि इतिहास मिटता नहीं। बस कभी-कभी उसे याद करने वाले कम हो जाते हैं।







