



शंकर सोनी
भारतीय संविधान निर्माताओं ने समाज के वंचित और शोषित वर्गों को मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए शिक्षा और सरकारी सेवाओं में आरक्षण की व्यवस्था की थी। तदोपरांत ठीक इसी तरह से अन्य पिछड़े वर्गों के हितार्थ ओबीसी लोगों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था की गई। समय के साथ यह अनुभव किया गया कि सामान्य वर्ग में भी ऐसे अनेक परिवार हैं जो आर्थिक रूप से अत्यंत कमजोर हैं और संसाधनों के अभाव में शिक्षा तथा रोजगार के अवसरों से वंचित रह जाते हैं। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2019 में संविधान के 103वें संशोधन द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को शिक्षा और सरकारी सेवाओं में 10 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया गया। इस व्यवस्था का उद्देश्य आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों को अवसर प्रदान करना था, परन्तु इसके क्रियान्वयन में कुछ ऐसे व्यवहारिक विरोधाभास सामने आए हैं जो विवाद का कारण बने हुए हैं।

केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार जिस परिवार की वार्षिक सकल आय 8 लाख रुपये से कम है, उसे ईडब्ल्यूएस के लिए पात्र माना जा सकता है। यदि परिवार के पास 5 एकड़ या उससे अधिक कृषि भूमि, 1000 वर्ग फुट या उससे बड़ा आवासीय फ्लैट, अधिसूचित नगर पालिका क्षेत्र में 100 वर्ग गज या उससे बड़ा आवासीय भूखंड अथवा अन्य क्षेत्रों में 200 वर्ग गज या उससे बड़ा आवासीय भूखंड है, तो आय 8 लाख रुपये से कम होने पर भी वह परिवार ईडब्ल्यूएस की पात्रता से बाहर हो जाता है।

दूसरी ओर राजस्थान सरकार ने अक्टूबर 2019 की अधिसूचना के माध्यम से संपत्ति संबंधी इन अयोग्यता शर्तों को हटाते हुए मुख्य रूप से 8 लाख रुपये से कम वार्षिक आय को ही आधार माना है। परिणामस्वरूप एक ही व्यक्ति राज्य सरकार की दृष्टि में ईडब्ल्यूएस हो सकता है, जबकि केंद्र सरकार के मानदंडों के अनुसार वह ईडब्ल्यूएस की पात्रता से बाहर हो सकता है। यही स्थिति अनेक विवादों और भ्रमों को जन्म देती है।

वास्तविक समस्या यह है कि वर्तमान मानदंड संपत्ति के क्षेत्रफल को महत्व देते हैं, उसकी आर्थिक उपयोगिता को नहीं। उदाहरण के लिए, राजस्थान के किसी सिंचित क्षेत्र की 5 एकड़ कृषि भूमि और किसी शुष्क क्षेत्र की 5 एकड़ कृषि भूमि की आय क्षमता में भारी अंतर हो सकता है। इसी प्रकार जयपुर, दिल्ली या मुंबई में स्थित 1000 वर्ग फुट के फ्लैट का बाजार मूल्य और किराया किसी छोटे नगर के समान आकार के फ्लैट से कई गुना अधिक हो सकता है। केवल क्षेत्रफल के आधार पर दोनों को समान आर्थिक स्थिति वाला मान लेना व्यवहारिक दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।

इसी प्रकार भूखंडों के संबंध में भी यही स्थिति है। किसी महानगर के बाहरी क्षेत्र में स्थित 100 वर्ग गज का भूखंड करोड़ों रुपये का हो सकता है, जबकि किसी छोटे कस्बे में उससे बड़े भूखंड का मूल्य उसके एक छोटे भाग के बराबर भी नहीं होता।
स्पष्ट है कि आर्थिक स्थिति का सही आकलन केवल भूमि या संपत्ति के आकार से नहीं किया जा सकता। आर्थिक कमजोरी का निर्धारण करते समय परिवार की वास्तविक परिस्थितियों पर भी विचार होना चाहिए।
कई परिवार ऐसे होते हैं जिनकी आय सीमित होती है, जिन पर वृद्ध माता-पिता की जिम्मेदारी होती है, गंभीर बीमारियों पर नियमित व्यय होता है या जो किराये के मकान में रहकर अपनी आय का बड़ा भाग आवास पर खर्च करते हैं। ऐसी परिस्थितियाँ भी किसी परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती हैं।
इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि ईडब्ल्यूएस की पात्रता निर्धारित करते समय केवल आय और संपत्ति के क्षेत्रफल को ही आधार न बनाया जाए। कृषि भूमि के मामले में उसकी उत्पादकता, सिंचाई की उपलब्धता और वास्तविक आय को देखा जाए। शहरी संपत्तियों के मामले में उनके बाजार मूल्य और किराया क्षमता को महत्व दिया जाए। साथ ही परिवार की वास्तविक आर्थिक जिम्मेदारियों और अनिवार्य खर्चों को भी मूल्यांकन का हिस्सा बनाया जाए।
संविधान का उद्देश्य केवल नियम बनाना नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है। यदि किसी कानून या नीति के प्रावधान व्यवहारिक जीवन की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाते, तो समय-समय पर उनकी समीक्षा आवश्यक हो जाती है। ईडब्ल्यूएस आरक्षण की अवधारणा सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, किन्तु इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आर्थिक पिछड़ेपन की पहचान कितनी यथार्थवादी, पारदर्शी और न्यायसंगत तरीके से की जाती है।
जब तक आय, संपत्ति और वास्तविक आर्थिक क्षमता के बीच संतुलन स्थापित नहीं होगा, तब तक ईडब्ल्यूएस की पात्रता से जुड़े विवाद बने रहने की संभावना रहेगी। अतः समय की मांग है कि केंद्र और राज्यों के मानदंडों में अधिक स्पष्टता, एकरूपता और व्यवहारिकता लाई जाए, ताकि आरक्षण का लाभ वास्तव में उन लोगों तक पहुँच सके जिनके लिए यह व्यवस्था बनाई गई है।
-लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता व नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक हैं





