




सुचेता जैन
बात 3 मई 2026 से शुरू होती है, जब लगभग 22.7 लाख अभ्यर्थियों के लिए नीट-यूजी परीक्षा हुई थी। जल्द ही यह सामने आया कि पहले से प्रसारित एक ‘गेस पेपर’ और असली प्रश्नपत्र में मेल खा रहे थे। जांच बैठी, सीबीआई और राजस्थान पुलिस मैदान में उतरीं, और 12 मई को परीक्षा रद्द कर दी गई।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 15 मई को इसे ‘कमांड चेन में चूक’ स्वीकार किया और 21 जून को एक ‘त्रुटि-रहित’ पुनर्परीक्षा का आश्वासन दिया। ठीक उसी दिन, 15 मई को, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की एक टिप्पणी को लेकर विवाद खड़ा हुआ, जिसमें बेरोज़गार युवाओं की तुलना ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवियों’ से की गई बताई गई। इसी टिप्पणी की प्रतिक्रिया में एक राजनीतिक रणनीतिकार अभिजीत डिप्के ने 16 मई को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम से एक सटायरिकल आंदोलन खड़ा किया, जो चुनाव आयोग में पंजीकृत दल नहीं, बल्कि सोशल मीडिया की कोख से जन्मा एक युवा आक्रोश था, जिसने कुछ ही दिनों में लाखों अनुयायी जोड़ लिए।
6 जून से इस आंदोलन ने जंतर-मंतर पर डेरा डाल दिया। दिल्ली की वह इकलौती जगह, जहाँ पुलिस को प्रदर्शन की अनुमति देना मंज़ूर है। माँगें साफ़ थीं, शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा, नीट लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये मुआवज़ा, और परीक्षा-प्रणाली में स्थायी सुधार। यह आँकड़ा, ग्यारह से इक्कीस के बीच, अलग-अलग रिपोर्टों में अलग, आंदोलन के अपने रिकॉर्ड पर आधारित है, किसी सरकारी पुष्टि पर नहीं, और यह फ़र्क़ ख़ुद अपने आप में इस पूरे मामले की एक अहम कड़ी है।

28 जून से इंजीनियर-शिक्षाविद् सोनम वांगचुक ने इसी धरने में एकजुटता जताते हुए भूख हड़ताल शुरू कर दी। तीन हफ़्तों में उनका वज़न क़रीब इक्कीस पौंड घट गया, और 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस उन्हें उठाकर सफ़दरजंग अस्पताल ले गई। 20 जुलाई, मॉनसून सत्र के पहले ही दिन, हज़ारों समर्थक ‘संसद चलो’ के नारे के साथ सड़क पर उतरे, पुलिस ने लाठी और आँसू गैस से रास्ता रोका, और उसी दिन आंदोलन के प्रतिनिधियों ने केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा को एक ज्ञापन सौंपा। नड्डा ने बात सरकार तक पहुँचाने का भरोसा दिया।

अब यहाँ से असली सवाल शुरू होते हैं, और वे किसी एक मंत्री, किसी एक जज या किसी एक कार्यकर्ता से बड़े हैं। पहला सवाल जवाबदेही की प्रकृति का है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 75(3) मंत्रिपरिषद की सामूहिक ज़िम्मेदारी की बात करता है, पर यह ज़िम्मेदारी लोकसभा के प्रति है, सीधे जनता के प्रति नहीं। किसी मंत्री का इस्तीफ़ा किसी बाध्यकारी क़ानून से तय नहीं होता, यह महज़ एक अलिखित संसदीय परंपरा है, जो पूरी तरह राजनीतिक दबाव पर टिकी है। यही वजह है कि ग़लती स्वीकार करना और पद छोड़ना, इन दोनों के बीच क़ानूनी तौर पर कोई सीधा पुल नहीं बनता। यह ठीक वही खाली जगह है, जिसे भरने के लिए हर बार सड़क पर उतरना पड़ता है, और जब तक यह संरचनात्मक खाली जगह भरी नहीं जाती, लोकतंत्र सिर्फ़ जनदबाव के भरोसे चलता रहेगा।

दूसरा सवाल विरोध के अधिकार और उसकी सीमा का है। अनुच्छेद 19(1)(इ) हर नागरिक को शांतिपूर्ण, निरायुध सभा का अधिकार देता है, पर अनुच्छेद 19(3) राज्य को ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ के नाम पर उस पर उचित प्रतिबंध लगाने की छूट भी देता है। दिल्ली में यह प्रतिबंध व्यवहार में इस शक्ल में सामने आया कि असहमति को सिर्फ़ जंतर-मंतर तक सीमित कर दिया गया, यानी विरोध की इजाज़त तो है, मगर एक तयशुदा घेरे के भीतर। 20 जुलाई का मार्च ठीक उसी घेरे की सीमा-रेखा का इम्तिहान था, ‘अनुमति-प्राप्त असहमति’ और ‘सार्वजनिक व्यवस्था के लिए ख़तरा’ के बीच फ़ासला आख़िर कितना है। यह बहस नई नहीं है, शाहीन बाग़ से लेकर किसान आंदोलन तक, भारतीय अदालतें बार-बार इसी उलझन से जूझती रही हैं कि सार्वजनिक स्थान पर लंबा चलने वाला विरोध कब ‘सार्वजनिक असुविधा’ में बदल जाता है, और तब राज्य की जवाबी कार्रवाई कितनी आनुपातिक होनी चाहिए।

तीसरा सवाल भूख हड़ताल की क़ानूनी हैसियत का है। भारत में इसे गांधीवादी विरासत के चलते नैतिक वैधता ज़रूर मिलती है, पर क़ानून की नज़र में यह आज भी एक धूसर क्षेत्र है। इरोम शर्मिला का मामला यही उलझन वर्षों पहले उजागर कर चुका है, जब राज्य ने यह तर्क देकर उन्हें बरसों ज़बरन नाक की नली से भोजन दिया कि आत्महत्या के प्रयास को रोकना उसका कर्तव्य है। वांगचुक के मामले में भी ठीक वही टकराव दोहराया गया। एक तरफ़ व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता और अपनी शर्तों पर विरोध जताने का अधिकार, दूसरी तरफ़ राज्य का यह तर्क कि किसी सार्वजनिक हस्ती की जान जोखिम में डालने की छूट नहीं दी जा सकती। दोनों पक्षों के पास तर्क है, और यही वजह है कि ‘अस्पताल ले जाना’ कभी संरक्षण जैसा दिखता है तो कभी दमन जैसा, क़ानून ख़ुद इस पर स्पष्ट, सर्वमान्य जवाब नहीं देता।

इस पूरे प्रकरण को केवल ‘सरकार बनाम आंदोलन’ के चश्मे से देखना अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि जब संस्थागत ढांचे, चाहे परीक्षा एजेंसी हो, मंत्रालय हो, या न्यायिक भाषा, युवा पीढ़ी के भरोसे को बार-बार चोट पहुँचाते हैं, तो जवाबदेही की कोई बाध्यकारी, पारदर्शी और समयबद्ध प्रक्रिया अब तक क्यों नहीं बनाई गई, न परीक्षा-प्रणाली में, न मंत्रिपरिषद के भीतर। यह सवाल किसी एक व्यक्ति के सही या ग़लत होने से कहीं बड़ा है; यह एक संरचनात्मक ख़ालीपन का सवाल है, और इसका जवाब भी संरचनात्मक ही हो सकता है, परीक्षा एजेंसियों की स्वतंत्र निगरानी, मंत्रिस्तरीय विफलताओं की समयबद्ध संसदीय जांच, ऐसे उपायों में।
और दूसरी तरफ़, एक 59 वर्षीय व्यक्ति का बिना किसी निजी लाभ के अपने शरीर को दांव पर लगाकर युवा पीढ़ी के साथ खड़ा हो जाना यह भी बताता है कि जब औपचारिक तंत्र चुप रहते हैं, तो नैतिक नेतृत्व अक्सर उसी तंत्र के बाहर से उभरता है। यही अंतर-पीढ़ीगत एकजुटता का वह रूप है, जिस पर किसी भी स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज को गंभीरता से सोचना चाहिए, क्या हमारी संस्थाएँ युवाओं और बुज़ुर्गों को एक-दूसरे का बोझ मानती रहेंगी, या साझेदार।
नागरिक के तौर पर हमारा काम यह तय करना नहीं कि इस टकराव में कौन जीता, बल्कि यह पूछना है कि अगली बार जब कोई परीक्षा लीक हो, तो क्या जवाब पाने के लिए हमें फिर एक भूख हड़ताल और लाठीचार्ज का इंतज़ार करना पड़ेगा, या हमारे पास पहले से कोई बेहतर, तयशुदा तंत्र मौजूद होगा। यही वह सवाल है, जो सोशल मीडिया के ट्रेंड ठंडे पड़ने के बाद भी ज़िंदा रहेगा।




