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हनुमानगढ़ जिले में निकाय चुनाव के तहत श्शहर की सरकारश् के गठन की सरगर्मियां तेज हो गई हैं। हर चुनाव की तरह इस बार भी मतदाताओं के बीच योग्य, शिक्षित और ईमानदार जनप्रतिनिधि चुनने को लेकर चर्चाएं गर्म हैं। हालांकि, इस बार चुनावी चौपालों पर एक नया विमर्श देखने को मिल रहा है, क्या केवल उच्च शिक्षा ही बेहतर नेतृत्व की गारंटी है?
शहर के जागरूक नागरिकों का एक वर्ग जहां पढ़े-लिखे नेतृत्व को नीति-निर्माण और आधुनिक प्रशासनिक समझ के लिए अनिवार्य मान रहा है, वहीं दूसरा वर्ग इससे पूरी तरह सहमत नहीं दिखता। दूसरे पक्ष का तर्क है कि हर उच्च शिक्षित व्यक्ति ईमानदार या व्यवहारिक रूप से समझदार हो, यह जरूरी नहीं। कई बार कम औपचारिक शिक्षा वाले लोग भी सामाजिक सरोकारों, जमीनी समझ और ईमानदारी के पैमाने पर कहीं अधिक खरे उतरते हैं। शिक्षा बनाम व्यवहारिकता की यही बहस इस बार के चुनाव का मुख्य आकर्षण बनी हुई है।
हनुमानगढ़ नगर परिषद के कुल 60 वार्डों में इस बार 277 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। निर्वाचन विभाग को सौंपे गए हलफनामों के विश्लेषण से साफ है कि चुनावी मैदान में उच्च शिक्षित उम्मीदवारों का अच्छा-खासा दबदबा है।
वार्ड 1रू यहां मुकाबला बेहद दिलचस्प है; जहां निर्दलीय प्रत्याशी मनजिंद्र सिंह लेघा पेशे से वकील हैं, वहीं उनके सामने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की प्रत्याशी बलविंद्र कौर एम.एससी (मेडिकल) जैसी उच्च योग्यता रखती हैं।
वार्ड 11 इस वार्ड में मुकाबला तकनीकी बनाम प्रबंधन शिक्षा का बन गया है। कांग्रेस ने यहां एम.टेक डिग्रीधारी गौरव जैन पर दांव खेला है, तो उनके मुकाबले निर्दलीय मैदान में उतरे सोनू बंसल एमबीए डिग्रीधारक हैं।
वार्ड 21 व 40 कानूनी पेचीदगियों और नगर पालिका अधिनियमों को समझने वाले चेहरे भी चुनावी दौड़ में हैं। वार्ड 21 से सिद्धार्थ और वार्ड 40 से जयंत पारख दोनों ही लॉ ग्रेजुएट (एलएलबी) हैं।
मैदान में डटे 277 प्रत्याशियों की शैक्षणिक योग्यता का दायरा केवल साक्षर से लेकर तकनीकी व स्नातकोत्तर तक फैला हुआ है, 89 ग्रेजुएट (स्नातक), 87 साक्षर सामान्य पढ़ाई, 39 पोस्ट ग्रेजुएट (स्नातकोत्तर), 10वीं पास 39, 12वीं पास 30 व
प्राथमिक से मिडिल (1ली से 9वीं तक) 30 प्रत्याशी हैं।
इस चुनाव का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि उच्च शिक्षित उम्मीदवारों को टिकट देने में प्रमुख राजनीतिक दल निर्दलीयों से पिछड़ते नजर आ रहे हैं। सर्वाधिक पढ़े-लिखे चेहरे किसी दल के सिंबल के बजाय स्वतंत्र रूप से ताल ठोक रहे हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, मैदान में उतरे कुल ग्रेजुएट प्रत्याशियों में से सबसे ज्यादा 23 निर्दलीय हैं, जबकि पोस्ट ग्रेजुएट वर्ग में भी 16 निर्दलीय शामिल हैं। इसकी तुलना में बीजेपी ने 17 और कांग्रेस ने केवल 8 ग्रेजुएट उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। वहीं, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी और आम आदमी पार्टी ने एक-एक ग्रेजुएट तथा दो-दो पोस्ट ग्रेजुएट उम्मीदवारों पर भरोसा जताया है।
शैक्षणिक योग्यता बनाम जनसेवा के इस द्वंद्व पर राजनीतिक विश्लेषक ओम बिश्नोई का मानना है कि औपचारिक शिक्षा का अपना महत्व है, लेकिन इसे ही अंतिम पैमाना नहीं बनाया जा सकता। उनका कहना है कि पढ़ाई-लिखाई से तकनीकी और सैद्धांतिक ज्ञान अवश्य बढ़ता है, जो आधुनिक शहरी नियोजन और बजट प्रबंधन में काम आ सकता है। लेकिन इसका यह कतई अर्थ नहीं कि कम पढ़े-लिखे लोगों के पास ज्ञान या विवेक की कमी होती है।
बिश्नोई के अनुसार, कई बार व्यावहारिक जीवन का अनुभव और जमीनी संघर्ष व्यक्ति को किताबी ज्ञान से कहीं अधिक परिपक्व बना देता है। ऐसे में मतदाताओं को वोट डालते समय केवल कागजी डिग्रियों से प्रभावित होने के बजाय प्रत्याशी के चरित्र, उसकी उपलब्धता, ईमानदारी और काम करने की शैली पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अब देखना यह होगा कि हनुमानगढ़ की जनता अपने वार्डों की कमान उच्च डिग्रियों वाले चेहरों को सौंपती है या फिर जमीनी पकड़ रखने वाले व्यवहारिक नेताओं पर अपना भरोसा जताती है।








