





रोहित अग्रवाल
हनुमानगढ़ नगर परिषद चुनाव का रंग अब केवल गली-मोहल्लों, नुक्कड़ बैठकों और घर-घर जनसंपर्क तक सीमित नहीं रहा। चुनावी मैदान में एक नया साथी भी उतर आया है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई। नगर परिषद चुनाव लड़ रहे कई प्रत्याशी अब प्रचार सामग्री तैयार करने, नारे गढ़ने, सामाजिक माध्यमों के लिए संदेश लिखने और मतदाताओं को आकर्षित करने की रणनीति बनाने में एआई आधारित साधनों की मदद ले रहे हैं।
पहले चुनावी पर्चे, पोस्टर या भाषण तैयार करने के लिए प्रत्याशी और समर्थक घंटों बैठकर विचार-विमर्श करते थे। वार्ड की समस्याओं को लेकर क्या लिखा जाए, कौन सा नारा प्रभावी रहेगा और सामाजिक माध्यमों पर किस तरह की सामग्री डाली जाए, इस पर काफी समय खर्च होता था। अब यही काम कुछ ही क्षणों में एआई के जरिए किया जा रहा है।
प्रत्याशी का नाम, वार्ड का नाम और कुछ प्रमुख मुद्दे लिखते ही एआई ऐसा भाषण तैयार कर देता है, जिसमें विकास, सेवा, बदलाव और जनसमस्याओं का पूरा खाका नजर आता है। कई बार भाषा इतनी प्रभावशाली होती है कि ऐसा लगता है जैसे प्रत्याशी ने वर्षों तक वार्ड की समस्याओं पर अध्ययन किया हो।

‘वार्ड के विकास का संकल्प’, ‘जनता की सेवा का मौका’ और ‘आपका अपना प्रत्याशी’ जैसे पारंपरिक नारों के साथ अब नए और भावनात्मक नारे भी एआई से तैयार करवाए जा रहे हैं। चुनावी शुभकामना संदेश, जनसंपर्क अभियान की घोषणाएं, सामाजिक माध्यमों की सामग्री और विरोधियों पर राजनीतिक तंज तक तैयार कराने में प्रत्याशी एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। यानी चुनावी रणनीति में अब प्रत्याशी और उसके समर्थकों के साथ एक ऐसा साथी भी शामिल हो गया है, जो न सभा में दिखाई देता है और न घर-घर वोट मांगता है, लेकिन प्रचार सामग्री तैयार करने में तेजी से काम करता है।

एआई की सबसे बड़ी खूबी उसकी गति है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी सीमा भी यही है कि वह जमीन पर जाकर हकीकत नहीं देखता। उसे यह जानकारी नहीं होती कि किस वार्ड की कौन सी सड़क टूटी हुई है, कहां नाली जाम है, किस इलाके में कचरे का ढेर लगा है या कौन सी गली महीनों से अंधेरे में है। एआई वही लिखता है, जो उसे बताया जाता है। यदि प्रत्याशी अपने वार्ड की समस्याओं और प्रस्तावित विकास कार्यों की जानकारी देगा तो एआई उसी आधार पर प्रभावशाली सामग्री तैयार कर देगा। ऐसे में प्रचार सामग्री और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर की संभावना भी बनी रहती है।

यही वजह है कि इस चुनाव में एक दिलचस्प सवाल सामने आया है, जो विकास एआई से तैयार की गई पोस्ट में दिखाई दे रहा है, वह वार्ड की गलियों में कब दिखाई देगा? चुनावी प्रचार में तकनीक का इस्तेमाल नया नहीं है, लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इसे एक नया रूप जरूर दे दिया है। अब कम समय में ज्यादा सामग्री तैयार की जा सकती है। छोटे प्रत्याशी भी अपेक्षाकृत बेहतर भाषा और आकर्षक प्रचार सामग्री तैयार करवा सकते हैं। इससे चुनाव प्रचार का तरीका बदल रहा है।
लेकिन मतदाता के लिए चुनौती यह है कि वह चमकदार डिजिटल प्रचार और वास्तविक काम के बीच अंतर कैसे करे। किसी पोस्ट में विकास की तस्वीर या प्रभावशाली भाषण अपने आप में विकास की गारंटी नहीं हो सकता।

चुनाव में एआई प्रत्याशी की भाषा को बेहतर बना सकता है, लेकिन उसके काम का मूल्यांकन नहीं कर सकता। वह भाषण लिख सकता है, मगर सड़क नहीं बना सकता। वह नाली की समस्या पर शानदार संदेश तैयार कर सकता है, लेकिन नाली साफ नहीं कर सकता। वह विकास का वादा लिख सकता है, लेकिन उसे जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी प्रत्याशी की ही होगी।
मजेदार स्थिति तब होगी, जब चुनाव जीतने के बाद जनता प्रत्याशी से पूछे, ‘साहब, एआई ने तो विकास पूरा बता दिया था, अब जमीन पर कब दिखाई देगा?;
आखिरकार चुनाव में अंतिम फैसला सामाजिक माध्यमों की पसंद, प्रचार पोस्ट या कृत्रिम बुद्धिमत्ता नहीं करेगी। फैसला उस मतदाता के हाथ में होगा, जो अपने वार्ड की वास्तविक स्थिति को सबसे अच्छी तरह जानता है। इसलिए इस नगर परिषद चुनाव में असली मुकाबला केवल प्रत्याशियों के बीच नहीं, बल्कि डिजिटल दावों और जमीनी हकीकत के बीच भी दिखाई देगा।




