




रोहित अग्रवाल
चुनाव जीतने के लिए प्रत्याशी क्या-क्या नहीं करते! पांच साल तक मतदाता को ढूंढने में मुश्किल हो सकती है, लेकिन चुनाव आते ही वही मतदाता अचानक सबसे खास हो जाता है। नगर परिषद चुनाव में इस बार हनुमानगढ़ की गलियों में कुछ ऐसे नजारे दिखाई दे रहे हैं, जो शहर के चुनावी इतिहास में शायद पहली बार चर्चा का विषय बने हैं। वोट मांगने की पुरानी परंपरा, हाथ जोड़ना, पैर छूना और आशीर्वाद मांगना, अब आधुनिक सुविधाओं के साथ कदमताल करती नजर आ रही है।
मतदाता को साधने के लिए कुछ प्रत्याशियों की ओर से ‘स्विगी’ और ‘ब्लिकिट’ जैसी सामान घर तक पहुंचाने वाली सेवाओं का सहारा लिए जाने की चर्चा है। किसी को सुबह का मनपसंद नाश्ता चाहिए तो वह घर तक पहुंच रहा है। किसी की पसंद कुछ अलग है तो उसका भी इंतजाम किया जा रहा है। मतलब साफ है, अब प्रत्याशी केवल मतदाता के दरवाजे तक नहीं पहुंच रहे, बल्कि मतदाता की पसंद तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।

चुनावी मौसम में मतदाताओं की पसंद का ख्याल रखने का अंदाज भी खासा दिलचस्प है। शहर में चर्चा है कि मनपसंद नाश्ते से लेकर पसंदीदा पेय पदार्थ तक की फरमाइशें पूरी करने की कोशिश की जा रही है। जिसे देसी पसंद है, उसके लिए देसी अंदाज और जिसे अंग्रेजी नाम वाला ब्रांड पसंद है, उसके लिए उसका इंतजाम।
यह सब इतनी आसानी से हो रहा है कि पहली नजर में लगता है जैसे चुनाव नहीं, कोई बड़ा पारिवारिक आयोजन चल रहा हो। फर्क बस इतना है कि यहां मेहमानों की सूची में पूरा वार्ड शामिल है और मेजबानी का मकसद भी साफ है, मतदाता खुश तो उम्मीद मजबूत।

हालांकि प्रत्याशियों के लिए यह सब करना शायद उतना आसान भी नहीं है। हर मतदाता की अलग पसंद, अलग उम्मीद और अलग शिकायत। किसी को नाश्ता चाहिए, किसी को वार्ड की नाली याद आ रही है तो किसी को सड़क की चिंता है। प्रत्याशी भी मन मारकर सबकी सुन रहे हैं और यथासंभव सबका इंतजाम करने में जुटे हैं। आखिर जीतने के लिए चुनावी मैदान में सारे पापड़ तो बेलने ही पड़ते हैं।
मतदाताओं को खुश करने की कवायद सिर्फ खान-पान तक सीमित नहीं है। चुनाव के साथ वार्डों में विकास की रफ्तार भी अचानक बढ़ती दिखाई दे रही है। कहीं नाली की सफाई के लिए जेसीबी पहुंच रही है, कहीं मिट्टी हटाई जा रही है और कहीं रास्ते की समस्या दूर करने की कोशिश हो रही है।

जो काम लंबे समय से शिकायतों और फाइलों के बीच अटके हुए थे, वे चुनाव नजदीक आते ही जमीन पर दिखाई देने लगे हैं। ऐसा लगता है जैसे जेसीबी को भी चुनाव की तारीख का इंतजार था। चुनाव आया और उसकी ड्यूटी लग गई।
वार्डवासियों के बीच इस तेजी को लेकर चर्चा भी है और सवाल भी। आखिर विकास की ऐसी रफ्तार चुनाव के समय ही क्यों दिखाई देती है? यदि नाली की सफाई, मिट्टी हटाने या सड़क की छोटी-मोटी समस्या का समाधान इतनी जल्दी संभव है तो सामान्य दिनों में इसके लिए इतना इंतजार क्यों?
नगर परिषद चुनाव का सीधा संबंध आम आदमी की रोजमर्रा की समस्याओं से है। सड़क, नाली, सफाई, रोशनी और पेयजल जैसे मुद्दे मतदाता के सामने हर दिन रहते हैं। यही कारण है कि चुनाव आते ही प्रत्याशी इन्हीं समस्याओं को लेकर अपनी सक्रियता दिखाने लगते हैं।

इस बार फर्क इतना है कि जनसंपर्क का तरीका ज्यादा व्यक्तिगत और जरूरत आधारित दिखाई दे रहा है। मतदाता के घर पहुंचकर केवल वोट मांगने के बजाय उसकी पसंद पूछी जा रही है। उसकी छोटी जरूरतों का ख्याल रखा जा रहा है। वार्ड की समस्या दिखाई दे तो उसे तत्काल दूर कराने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रत्याशियों की मजबूरी भी कम नहीं। मुकाबला कड़ा है और हर वोट महत्वपूर्ण। ऐसे में कोई भी प्रत्याशी मतदाता को नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहता। नतीजा यह कि जो काम सामान्य दिनों में धीरे चलते हैं, चुनावी दिनों में उनकी गति अचानक तेज हो जाती है। लेकिन इस पूरे चुनावी नजारे का सबसे महत्वपूर्ण किरदार मतदाता है। वह सब देख रहा है। किसने कब दरवाजा खटखटाया, किसने क्या खिलाया-पिलाया, किसने उसकी समस्या सुनी और किसने चुनाव से पहले अचानक विकास की चिंता शुरू कर दी, इन सबका हिसाब कहीं न कहीं उसके मन में दर्ज हो रहा है।

चुनावी मौसम की यह नई तस्वीर कई सवाल भी छोड़ रही है। क्या मनपसंद नाश्ता मतदाता का मन बदल पाएगा? क्या अचानक चली जेसीबी पांच साल की नाराजगी दूर कर पाएगी? क्या चुनाव के बाद भी यही सक्रियता बनी रहेगी?
फिलहाल हनुमानगढ़ में चुनावी माहौल का दृश्य बड़ा दिलचस्प है। एक तरफ मतदाता की पसंद का नाश्ता घर पहुंच रहा है, पसंद के सामान का इंतजाम हो रहा है, दूसरी तरफ वार्ड में जेसीबी दौड़ रही है। प्रत्याशी घर-घर पहुंच रहे हैं और हर संभव तरीके से मतदाता को साधने में जुटे हैं। पहली बार दिखाई दे रहे इस बदले चुनावी अंदाज पर शहर में एक सवाल खूब तैर रहा है, अगर चुनाव जीतने के लिए इतना कुछ करना पड़ रहा है, तो जीतने के बाद पांच साल तक मतदाता के लिए कितना कुछ किया जाएगा?




