




गोपाल झा
गांव में एक बात बड़े-बूढ़े अक्सर कहते थे, ‘जब बेटा बाप की जूती पहनने लगे, तब उसे बच्चा मत समझो।’ हमारे शास्त्र ने तो इसे और पहले कह दिया था, ‘प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रं वदाचरेत।’ यानी सोलह साल का होते ही पुत्र से मित्र जैसा व्यवहार करो। मित्र की बात सुनी जाती है। उसे चुप नहीं कराया जाता।
यही बात घर पर लागू होती है। यही देश पर भी।
सरकार भी आखिर एक अभिभावक ही तो है। लेकिन अभिभावक की सबसे बड़ी पहचान क्या है? अधिकार नहीं, धैर्य। डांटना नहीं, समझाना। और सबसे बढ़कर, सुनना।
यहीं सरकार चूक गई।
उसे लगा कि किसान आंदोलन निकल गया। विपक्ष का शोर भी थम गया। अब कुछ छात्र सड़क पर हैं, दो-चार दिन में घर चले जाएंगे। लेकिन सरकार शायद भूल गई कि ये वही बच्चे हैं, जो कल वोट डालेंगे। वही बच्चे हैं, जिनके हाथ में मोबाइल है, जिनकी बात मिनटों में पूरे देश में पहुंच जाती है। उन्हें केवल पुलिस से नहीं, भरोसे से संभाला जाता है।
सोनम वांगचुक बीस दिन तक अनशन पर बैठे रहे। उनकी हर मांग सही है या गलत, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन उनकी बात सुनना सरकार का धर्म था। लोकतंत्र में विरोध करने वाले से असहमति हो सकती है, उपेक्षा नहीं।
फिर छात्रों पर लाठियां चलीं।
लाठी शरीर पर पड़ती है, लेकिन उसकी आवाज़ समाज के मन में गूंजती है। टीवी पर, मोबाइल पर, सोशल मीडिया पर जब वे तस्वीरें पहुंचीं तो लाखों मां-बाप ने अपने बेटे-बेटियों का चेहरा उन छात्रों में देखा। आंदोलन वहीं से बड़ा हो गया। सरकार जिस आग को चिंगारी समझ रही थी, वह देखते-देखते लपट बन गई।
लोकतंत्र में पुलिस की ताकत से ज्यादा संवाद की ताकत होती है। जिसने यह बात भूला दी, उसने लोकतंत्र की आत्मा को नहीं समझा।
एक और बीमारी हमारे सार्वजनिक जीवन में घर कर गई है। जो सवाल पूछे, उसे देशद्रोही कह दो। जो विरोध करे, उसे विदेशी एजेंट बता दो। जो सरकार से असहमत हो, उसकी नीयत पर शक कर दो। इससे सत्ता को कुछ समय का सुख मिल सकता है, सम्मान नहीं।
लोकतंत्र में विरोधी दुश्मन नहीं होता। वह आईना होता है। आईना चेहरा खराब नहीं करता, केवल दिखाता है।
नीट पेपर लीक का मामला भी ऐसा ही है। एक बार गलती हो जाए तो लोग माफ कर देते हैं। दूसरी बार भी उम्मीद रखते हैं कि सुधार होगा। लेकिन जब बार-बार लाखों विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर लगने लगे, तब सवाल उठेंगे ही। युवा पूछेंगे कि जिम्मेदारी किसकी है। यह सवाल किसी दल का नहीं, पूरे देश का है।
प्रधानमंत्री सक्रिय हुए। बैठकों का दौर चला। देर रात संदेश दिए गए। कानून सख्त करने की बातें हुईं। इसका मतलब साफ है कि सरकार ने खतरे को महसूस किया। लेकिन राजनीति में समझदारी आग बुझाने में नहीं, आग लगने से पहले पानी डालने में होती है।
आज भारतीय जनता पार्टी बचाव की मुद्रा में दिखाई दे रही है। सरकार के अहंकार व अपनी कार्यशैली के कारण। सत्ता का सबसे बड़ा शत्रु विपक्ष नहीं होता, अहंकार होता है। जब सत्ता को यह लगने लगता है कि जनता केवल सुनने के लिए है, बोलने के लिए नहीं, तब उसके पतन की शुरुआत हो जाती है।
युवाओं की मांग कोई असंभव मांग नहीं है। वे निष्पक्ष परीक्षा चाहते हैं। अपने परिश्रम का सम्मान चाहते हैं। अपने भविष्य की सुरक्षा चाहते हैं। जिम्मेदार मंत्री का इस्तीफा चाहते हैं ? क्या यह मांग ज्यादा है?
सरकार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र चुनाव जीतने से नहीं चलता। लोकतंत्र विश्वास से चलता है। विश्वास आदेश से नहीं मिलता, संवाद से मिलता है।
घर में भी वही पिता सम्मान पाता है, जो बड़े हो चुके बेटे की बात सुन लेता है। जो केवल अपनी ही सुनाता रहे, उसके घर में भी दूरी पैदा हो जाती है।
देश भी एक घर है।
इस घर के बच्चे अब बड़े हो गए हैं। वे सवाल पूछ रहे हैं। उन्हें डांटिए मत। देशद्रोही मत कहिए। लाठी मत दिखाइए। उनके साथ बैठिए। उनकी आंखों में देखिए। उनकी बात सुनिए।
क्योंकि लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी ताकत उसकी कुर्सी नहीं, जनता का विश्वास होता है। और विश्वास टूटने की आवाज़ सुनाई नहीं देती, लेकिन उसकी गूंज बहुत दूर तक जाती है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं









