




डॉ. संतोष राजपुरोहित.
शिक्षा का अर्थशास्त्र उस प्रक्रिया का अध्ययन करता है जिसके माध्यम से शिक्षा किसी देश की आर्थिक प्रगति, उत्पादकता और सामाजिक विकास को प्रभावित करती है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का साधन नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास की सबसे महत्वपूर्ण नींव है। जब किसी देश की जनसंख्या को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल मिलता है, तो वही जनसंख्या ‘मानवीय पूंजी’ में बदल जाती है, जो उत्पादन और विकास को गति देती है।
भारत में मानवीय पूंजी का महत्व तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि यहां विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी है। यदि इस युवा शक्ति को उचित शिक्षा और प्रशिक्षण मिल जाए, तो यह भारत को आर्थिक महाशक्ति बना सकती है। उदाहरण के लिए, आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थान उच्च गुणवत्ता वाले इंजीनियर और प्रबंधक तैयार करते हैं, जो देश और विदेश दोनों जगह भारत की आर्थिक पहचान को मजबूत करते हैं। इसी तरह, डिजिटल शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम जैसे ‘स्किल इंडिया’ युवाओं को रोजगार के योग्य बना रहे हैं।
अर्थशास्त्री गैरी बेकर के अनुसार, शिक्षा पर किया गया व्यय वास्तव में एक निवेश है, जो भविष्य में अधिक आय और उत्पादकता के रूप में लाभ देता है। भारत में भी यह सिद्धांत स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। शिक्षित व्यक्ति अधिक कुशल होते हैं, वे बेहतर रोजगार प्राप्त करते हैं और उनकी आय अधिक होती है। इससे न केवल उनके जीवन स्तर में सुधार होता है, बल्कि देश की कुल राष्ट्रीय आय भी बढ़ती है।
भारत के संदर्भ में यदि हम अन्य देशों से तुलना करें, तो यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा में निवेश कितना महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका ने उच्च शिक्षा और अनुसंधान में निवेश करके नवाचार और तकनीकी विकास में अग्रणी स्थान प्राप्त किया है। जापान ने शिक्षा के माध्यम से युद्ध के बाद अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित किया, जबकि दक्षिण कोरिया ने कौशल विकास और तकनीकी शिक्षा पर ध्यान देकर खुद को एक विकसित राष्ट्र में बदल लिया। ये उदाहरण भारत के लिए प्रेरणा हैं कि यदि शिक्षा को प्राथमिकता दी जाए, तो तेजी से आर्थिक विकास संभव है।
भारत में शिक्षा और आर्थिक विकास के बीच सीधा संबंध देखा जा सकता है। जहां शिक्षा का स्तर अधिक है, वहां रोजगार के अवसर अधिक हैं और गरीबी कम है। उदाहरण के लिए, शहरी क्षेत्रों में जहां उच्च शिक्षा और तकनीकी संस्थान अधिक हैं, वहां आय का स्तर भी अधिक होता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की कमी के कारण आर्थिक विकास अपेक्षाकृत धीमा है। इस अंतर को कम करने के लिए सरकार विभिन्न योजनाएं चला रही है, जैसेकृनई शिक्षा नीति (एनईपी), डिजिटल शिक्षा और कौशल विकास कार्यक्रम।
हालांकि, भारत में शिक्षा के क्षेत्र में कई चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। सबसे बड़ी समस्या है, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की असमान उपलब्धता। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच शिक्षा की गुणवत्ता में बड़ा अंतर है।आज भी ग्रामीण क्षेत्र में आधारभूत संरचना का अभाव हैं। इसके अलावा, कई बार शिक्षा और रोजगार के बीच तालमेल नहीं होता, जिससे शिक्षित बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न होती है। पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 में शिक्षा पर जीडीपी का 6 फीसदी खर्च करने की बात कही गयी लेकिन आज तक किसी भी शिक्षा नीति में इतना खर्च नहीं हुआ, अधिकतम खर्च 4.3 फीसदी के आसपास ही रहा। इसलिए यह आवश्यक है कि शिक्षा को अधिक व्यावहारिक और कौशल आधारित बनाया जाए।
शिक्षा पर किया गया निवेश किसी भी देश के लिए सबसे लाभकारी निवेश होता है। भारत के लिए यह और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां विशाल युवा जनसंख्या है। यदि इस जनसंख्या को सही दिशा में शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाए, तो यह देश के आर्थिक विकास को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती है। अन्य देशों के उदाहरण यह स्पष्ट करते हैं कि शिक्षा और मानवीय पूंजी ही वास्तविक समृद्धि की कुंजी हैं। इसलिए भारत को शिक्षा की गुणवत्ता, पहुंच और कौशल विकास पर विशेष ध्यान देना चाहिए, ताकि वह एक मजबूत और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का निर्माण कर सके।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं







