



डॉ. संतोष राजपुरोहित.
हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जिला को राजस्थान का ‘धान और गेहूँ का कटोरा; कहा जाता है। इंदिरा गांधी नहर परियोजना के बाद इन जिलों की बंजर भूमि हरे-भरे खेतों में बदल गई। यहाँ गेहूँ, कपास, सरसों, ग्वार, चना और धान जैसी फसलें बड़े पैमाने पर उगाई जाती रही हैं। कृषि ने न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया, बल्कि लाखों लोगों को रोजगार और खाद्य सुरक्षा भी प्रदान की। किन्तु वर्तमान समय में तेजी से बढ़ती फैक्ट्रियाँ, औद्योगिक क्षेत्र और रिहायशी कॉलोनियाँ इस उपजाऊ भूमि को निगलती जा रही हैं। यदि यही स्थिति जारी रही, तो आने वाले समय में यह क्षेत्र अन्न संकट और पर्यावरणीय असंतुलन का गंभीर केंद्र बन सकता है।

विकास किसी भी समाज की आवश्यकता है, परन्तु जब विकास की दिशा कृषि भूमि को समाप्त करने लगे, तब यह चिंता का विषय बन जाता है। आज हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर में शहरों के विस्तार के साथ-साथ खेतों को प्लॉटिंग में बदला जा रहा है। जहाँ कभी गेहूँ की बालियाँ लहलहाती थीं, वहाँ अब सीमेंट और कंक्रीट के जंगल दिखाई देने लगे हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे बड़ी संख्या में औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित हो रही हैं। किसानों को भूमि के अच्छे दाम मिल जाने के कारण वे अपनी जमीन बेचने लगे हैं। अल्पकालिक आर्थिक लाभ के कारण कृषि भूमि धीरे-धीरे स्थायी रूप से समाप्त हो रही है।

यह समस्या केवल भूमि परिवर्तन तक सीमित नहीं है। जब उपजाऊ भूमि पर फैक्ट्री बनती है, तब मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता नष्ट होती है। रासायनिक अपशिष्ट और प्रदूषण भूजल को प्रभावित करते हैं। दूसरी ओर रिहायशी कॉलोनियों के बढ़ने से जल की मांग बढ़ती है, जिससे सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कम हो सकती है। इंदिरा गांधी नहर पर आधारित यह क्षेत्र पहले ही जल संकट की आशंकाओं से जूझ रहा है। यदि कृषि भूमि और जल दोनों पर दबाव बढ़ता गया, तो खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट स्वाभाविक होगी।

भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में खाद्य सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज भारत विश्व में गेहूँ और चावल का प्रमुख उत्पादक है, परन्तु लगातार घटती कृषि भूमि भविष्य में गंभीर संकट उत्पन्न कर सकती है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में भी यह चेतावनी दी गई है कि तेजी से हो रहा शहरीकरण कृषि योग्य भूमि को कम कर रहा है। हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जैसे क्षेत्र, जो देश के खाद्यान्न भंडार को मजबूत करते हैं, यदि धीरे-धीरे औद्योगिक और आवासीय केंद्र बन गए, तो इसका प्रभाव केवल राजस्थान तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ेगा।

इस परिवर्तन का सामाजिक प्रभाव भी गहरा है। कृषि केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि ग्रामीण संस्कृति और जीवन शैली की आधारशिला है। खेती कम होने से ग्रामीण रोजगार के अवसर घटेंगे, किसान मजदूरों का पलायन बढ़ेगा और पारंपरिक कृषि ज्ञान समाप्त होने लगेगा। आने वाली पीढ़ियाँ खेतों और प्रकृति से दूर होकर केवल उपभोक्तावादी जीवन शैली की ओर बढ़ेंगी। इससे सामाजिक असंतुलन और आर्थिक विषमता भी बढ़ सकती है।
पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह स्थिति खतरनाक है। खेत प्राकृतिक रूप से कार्बन अवशोषित करते हैं और तापमान संतुलित रखने में सहायक होते हैं। इसके विपरीत फैक्ट्रियाँ और कंक्रीट की कॉलोनियाँ गर्मी बढ़ाती हैं तथा प्रदूषण फैलाती हैं। आज राजस्थान में बढ़ता तापमान और बदलता वर्षा चक्र पहले ही चिंता का विषय है। यदि हरित क्षेत्र घटते गए, तो जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और अधिक गंभीर होगा।

समस्या का समाधान संतुलित विकास में निहित है। सरकार को ऐसी नीतियाँ बनानी चाहिए जिनमें उपजाऊ कृषि भूमि का अंधाधुंध गैर-कृषि उपयोग रोका जा सके। औद्योगिक क्षेत्र बंजर अथवा कम उपजाऊ भूमि पर विकसित किए जाएँ। भूमि उपयोग नीति को कठोरता से लागू किया जाए और बिना वैज्ञानिक अध्ययन के कृषि भूमि का रूपांतरण न हो। किसानों को भी यह समझना होगा कि भूमि केवल व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की खाद्य सुरक्षा का आधार है। आधुनिक कृषि, जैविक खेती और कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देकर कृषि को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है ताकि किसान भूमि बेचने के बजाय खेती को ही भविष्य मानें।
यह समझना आवश्यक है कि यदि खेत समाप्त होंगे, तो केवल फसलें नहीं बल्कि मानव सभ्यता का आधार भी कमजोर होगा। फैक्ट्री और कॉलोनियाँ जीवन को सुविधाएँ दे सकती हैं, परन्तु भोजन का विकल्प नहीं बन सकतीं। हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर की उपजाऊ भूमि केवल राजस्थान की धरोहर नहीं, बल्कि देश की अन्न सुरक्षा की रीढ़ है। यदि आज इस भूमि को बचाने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए गए, तो भविष्य में अन्न संकट, जल संकट और पर्यावरणीय संकट एक साथ हमारे सामने खड़े होंगे। इसलिए विकास और कृषि के बीच संतुलन बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं




