




डॉ. संतोष राजपुरोहित
आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को विकास का सबसे महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। सरकारें, नीति-निर्माता और मीडिया अक्सर जीडीपी वृद्धि दर को आर्थिक सफलता का प्रतीक बताते हैं। लेकिन यदि हम गहराई से विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि जीडीपी केवल कुल आय का माप है, यह नहीं बताता कि आय समाज में कैसे वितरित हो रही है।
जीडीपी देश में एक निश्चित अवधि में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को दर्शाता है। यह बताता है कि अर्थव्यवस्था का आकार कितना है और वह कितनी तेजी से बढ़ रही है। परंतु यह संकेतक इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता है कि इस उत्पादन से अर्जित आय किन लोगों के पास जा रही है। यदि देश के कुछ ही अमीर वर्गों की आय अत्यधिक बढ़ती है, तो जीडीपी में वृद्धि दिखाई देगी, लेकिन आम जनता के जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं होगा।

मान लीजिए कि किसी देश में दो-तीन बड़े उद्योगपति अपनी आय कई गुना बढ़ा लेते हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हैं या कम आय पर जीवन यापन कर रहे हैं। इस स्थिति में जीडीपी वृद्धि दर सकारात्मक और प्रभावशाली दिखाई देगी, लेकिन सामाजिक वास्तविकता इसके विपरीत होगी। यही कारण है कि जीडीपी को औसत विकास का प्रतीक माना जाता है, न कि समावेशी विकास का।
भारत जैसे देश में यह समस्या और भी गहरी है। यहां आय और संपत्ति का वितरण अत्यंत असमान है। एक ओर देश में अरबपतियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर बड़ी आबादी गरीबी, बेरोजगारी और अल्प-रोजगार जैसी समस्याओं से जूझ रही है। युवा बेरोजगारी की दर लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। ऐसे में केवल जीडीपी वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करना एक अधूरी तस्वीर प्रस्तुत करता है।

इस संदर्भ में प्रति व्यक्ति आय एक बेहतर संकेतक माना जाता है, क्योंकि यह कुल आय को जनसंख्या से विभाजित कर औसत आय दर्शाता है। हालांकि, यह भी पूर्ण समाधान नहीं है, क्योंकि औसत वास्तविक असमानता को छिपा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि एक व्यक्ति अत्यधिक अमीर है और बाकी सभी गरीब हैं, तो औसत आय भ्रामक रूप से ऊंची दिखाई देगी।
विकास को समझने के लिए हमें अन्य संकेतकों पर भी ध्यान देना चाहिए, जैसे मानव विकास सूचकांक जो शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर को सम्मिलित करता है। इसके अतिरिक्त, आय असमानता को मापने के लिए गिनी गुणांक का उपयोग किया जाता है, जो यह बताता है कि समाज में आय कितनी समान या असमान रूप से वितरित है।

वास्तविक आर्थिक विकास वह है जिसमें केवल उत्पादन ही नहीं बढ़ता, बल्कि उसका लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचता है। इसे समावेशी विकास कहा जाता है। इसमें रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, गरीबी घटती है, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होती हैं, और सामाजिक सुरक्षा मजबूत होती है।
सरकार को केवल जीडीपी वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय आय के न्यायपूर्ण वितरण पर भी जोर देना चाहिए। इसके लिए प्रगतिशील कर व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा योजनाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश, तथा रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान आवश्यक है।
जीडीपी एक महत्वपूर्ण आर्थिक संकेतक है, लेकिन इसे विकास का एकमात्र पैमाना मानना गलत होगा। जब तक विकास के लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचते, तब तक आर्थिक प्रगति अधूरी ही मानी जाएगी। इसलिए, सिर्फ वृद्धि नहीं, बल्कि समान और न्यायपूर्ण विकास की दिशा में आगे बढ़ना ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं




