



डॉ. एमपी शर्मा
भारतीय संस्कृति में नारी को केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि शक्ति, ज्ञान और सृजन का जीवंत स्वरूप माना गया है। हमारे शास्त्रों में जहाँ नारी को देवी का स्थान दिया गया, वहीं व्यवहारिक जीवन में उसके अधिकार और सम्मान को लेकर विरोधाभास भी दिखाई देता है। माँ, बहन, बेटी और पत्नी यानी हर रूप में नारी परिवार और समाज की धुरी रही है। फिर भी यह प्रश्न आज भी सामने खड़ा है कि क्या हम वास्तव में उसे वही सम्मान और अवसर दे पाए हैं, जिसकी हम पूजा-पाठ में बात करते हैं? सच कड़वा है, पर जरूरी है, क्योंकि बिना आत्ममंथन के सुधार संभव नहीं।
आज की भारतीय महिला किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। विज्ञान, शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, खेल, चिकित्सा, सेना और अंतरिक्ष, हर जगह उसने अपनी प्रतिभा का परचम लहराया है। यह उपलब्धियाँ यह साबित करती हैं कि क्षमता के स्तर पर नारी किसी से कम नहीं। समस्या क्षमता की नहीं, अवसरों की है। आज भी अनेक परिवारों में पुत्र जन्म को उत्सव और पुत्री जन्म को चिंता की दृष्टि से देखा जाता है। हालाँकि स्थितियाँ बदली हैं, पर कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, पोषण और शिक्षा में असमानता जैसी सामाजिक कुरीतियाँ अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।

लड़कों को बचपन से आत्मनिर्भर, निर्णय लेने वाला और साहसी बनने की सीख दी जाती है, जबकि लड़कियों को ‘संभलकर रहना’, ‘समझौता करना’ और ‘सीमा में रहना’ सिखाया जाता है। यही फर्क आगे चलकर उनके आत्मविश्वास और अवसरों को प्रभावित करता है। यह असमानता केवल समाज की नहीं, घर के भीतर की भी है और यहीं से बदलाव की असली शुरुआत होनी चाहिए।
महिलाओं के प्रति भेदभाव का सारा दोष पुरुषों पर डाल देना समस्या को सरल बनाना है, समाधान नहीं। यह स्वीकार करना होगा कि कई बार महिलाएँ स्वयं भी सामाजिक बुराइयों को आगे बढ़ाती हैं, चाहे वह दहेज की माँग हो, बहू-बेटी में भेदभाव हो या पुत्र मोह। इसका अर्थ महिलाओं को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यह समझना है कि मानसिकता का परिवर्तन दोनों पक्षों में आवश्यक है।

आज के समय में सफलता को केवल आय से जोड़ दिया गया है। परिणामस्वरूप घर और परिवार को संभालने वाली गृहिणी का योगदान कम आँका जाता है। जबकि वास्तविकता यह है कि गृहिणी परिवार की पहली शिक्षिका, प्रबंधक, पोषण विशेषज्ञ और संस्कार निर्माता होती है। यदि उसके कार्य का आर्थिक मूल्यांकन किया जाए, तो वह किसी भी पेशे से कम नहीं। सम्मान का पैमाना आय नहीं, योगदान होना चाहिए, इतनी सी बात समझ ली जाए तो आधी लड़ाई यहीं जीत ली जाए।
कामकाजी महिलाएँ अक्सर दो मोर्चों पर लड़ती हैं, कार्यालय और घर। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे दोनों जगह पूर्णता दिखाएँ। यह दोहरी जिम्मेदारी मानसिक और शारीरिक दबाव बढ़ाती है। ऐसे में परिवार के अन्य सदस्यों, विशेषकर पुरुषों का सहयोग अनिवार्य है। घर केवल महिला की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि साझा उत्तरदायित्व है।

यह मान लेना भ्रम है कि केवल अशिक्षित समाज में ही लैंगिक भेदभाव होता है। शिक्षित और संपन्न वर्गों में भी वेतन असमानता, कार्यस्थल पर उत्पीड़न और निर्णय प्रक्रिया से महिलाओं की दूरी जैसी समस्याएँ मौजूद हैं। डिग्रियाँ ज्ञान देती हैं, लेकिन सोच को संवेदनशील बनाने के लिए संस्कारों की जरूरत होती है।
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ एक महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन असली लक्ष्य यहीं समाप्त नहीं होता। बेटी को आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और निर्णय लेने में सक्षम बनाना ही वास्तविक सशक्तिकरण है। साथ ही लड़कों को भी समानता, सम्मान और सहभागिता के मूल्य सिखाना उतना ही आवश्यक है।

किसी भी समाज की प्रगति का सही पैमाना वहाँ की महिलाओं की स्थिति होती है। महिला और पुरुष समाज के दो पहिए हैं, एक कमजोर होगा तो गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी। आवश्यकता है समानता, सम्मान और सहयोग की। जिस दिन बेटी के जन्म पर वही खुशी होगी जो बेटे के जन्म पर होती है, जिस दिन गृहिणी और कामकाजी महिला दोनों को समान सम्मान मिलेगा, उसी दिन सच्चे अर्थों में महिला सशक्तिकरण का सपना साकार होगा।
-लेखक सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष हैं





