






डॉ. संतोष राजपुरोहित
भारत आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जब उसकी जनसंख्या संरचना देश के आर्थिक भविष्य को प्रभावित करने की असाधारण क्षमता रखती है। बड़ी युवा आबादी भारत के लिए केवल जनसंख्या संबंधी विशेषता नहीं, बल्कि आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण अवसर है। यही अवसर डेमोग्राफिक डिविडेंड यानी जनसांख्यिकीय लाभांश कहलाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या युवाओं की बड़ी संख्या अपने आप आर्थिक समृद्धि में बदल जाएगी? इसका उत्तर हैकृनहीं। युवा आबादी तभी आर्थिक डिविडेंड में बदल सकती है, जब उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य और पर्याप्त रोजगार के अवसर मिलें।
डेमोग्राफिक डिविडेंड का अर्थ उस संभावित आर्थिक लाभ से है जो किसी देश को तब मिल सकता है, जब उसकी कामकाजी आयु की आबादी का अनुपात बढ़ता है और आश्रित आबादी का अनुपात अपेक्षाकृत कम होता है। ऐसी स्थिति में श्रमशक्ति बढ़ती है, उत्पादन की क्षमता बढ़ती है और परिवारों तथा देश की बचत और निवेश की संभावनाएँ मजबूत होती हैं।
भारत के लिए यह अवसर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में बड़ी संख्या में युवा हर वर्ष शिक्षा पूरी करके रोजगार बाजार में प्रवेश कर रहे हैं। यदि इन युवाओं को उनकी क्षमता के अनुरूप काम मिलता है, तो वे केवल स्वयं की आय नहीं बढ़ाएंगे, बल्कि देश की उत्पादन क्षमता, उपभोग, बचत और निवेश को भी बढ़ावा देंगे।
लेकिन यहीं से भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी शुरू होती है। युवा आबादी का होना और युवा आबादी का उत्पादक होना दो अलग-अलग बातें हैं। यदि बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार या अल्परोजगार रहते हैं, तो जनसांख्यिकीय लाभांश का अवसर आर्थिक दबाव में बदल सकता है। विशेष रूप से शिक्षित युवाओं में रोजगार और उनकी योग्यता के अनुरूप काम के बीच अंतर एक गंभीर चुनौती है।
इसलिए भारत के लिए आने वाले वर्षों में रोजगार सृजन सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक प्राथमिकताओं में से एक रहेगा। केवल सरकारी नौकरियों के माध्यम से इतनी बड़ी युवा आबादी को रोजगार देना संभव नहीं है। विनिर्माण, आधुनिक कृषि, पर्यटन, निर्माण, स्वास्थ्य, शिक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल सेवाओं और छोटे एवं मध्यम उद्यमों में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे।
इसके साथ ही रोजगार की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना होगा। केवल किसी व्यक्ति का रोजगार में होना पर्याप्त नहीं है। स्थिर आय, बेहतर कार्य परिस्थितियाँ, सामाजिक सुरक्षा और उत्पादक कार्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यदि युवा कम उत्पादक और अस्थिर रोजगार में फँसे रहते हैं, तो उनकी आर्थिक क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाएगा।
यहाँ शिक्षा और कौशल विकास की भूमिका निर्णायक हो जाती है। बदलती अर्थव्यवस्था में केवल पारंपरिक डिग्री पर्याप्त नहीं है। डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विश्लेषण, संचार कौशल, तकनीकी प्रशिक्षण, व्यावसायिक शिक्षा और समस्या समाधान जैसी क्षमताओं की मांग लगातार बढ़ रही है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था को रोजगार बाजार की बदलती जरूरतों के साथ जोड़ना जरूरी है।
भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश की एक और महत्वपूर्ण कड़ी महिलाओं की आर्थिक भागीदारी है। यदि कामकाजी आयु की महिलाओं को शिक्षा, कौशल, सुरक्षित कार्यस्थल, परिवहन और रोजगार के समान अवसर मिलते हैं, तो देश की प्रभावी श्रमशक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। महिलाओं की आय बढ़ने का प्रभाव परिवार की बचत, बच्चों की शिक्षा और जीवन स्तर पर भी पड़ता है।
युवा आबादी भारत की उद्यमिता और नवाचार की क्षमता को भी बढ़ा सकती है। आज का युवा डिजिटल तकनीक और नए व्यावसायिक मॉडल को तेजी से अपनाता है। स्टार्टअप, ई-कॉमर्स, फिनटेक और डिजिटल सेवाओं ने युवाओं के लिए रोजगार के साथ-साथ स्वयं रोजगार और उद्यमिता के नए रास्ते खोले हैं। यदि इस ऊर्जा को सही संस्थागत और वित्तीय सहयोग मिले, तो यह आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।
हालाँकि भारत के सामने एक और चुनौती क्षेत्रीय असमानता की है। देश के सभी राज्यों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन एक समान नहीं है। कुछ राज्यों में युवा आबादी का अनुपात अधिक है, जबकि कुछ राज्य तेजी से वृद्ध होती आबादी की ओर बढ़ रहे हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर की नीति के साथ-साथ राज्यों की अलग-अलग जनसांख्यिकीय परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति बनाना भी आवश्यक है।
आर्थिक डिविडेंड केवल युवाओं की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी उत्पादकता से पैदा होता है। स्वस्थ, शिक्षित और कुशल युवा अधिक उत्पादक होते हैं। इसलिए स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और कौशल पर किया गया निवेश केवल सामाजिक क्षेत्र का खर्च नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक क्षमता में निवेश है।
वास्तव में डेमोग्राफिक डिविडेंड को आर्थिक डिविडेंड में बदलना एक सीमित अवधि का अवसर है। कामकाजी आबादी का अनुपात हमेशा नहीं बढ़ता। जैसे-जैसे आर्थिक विकास आगे बढ़ता है और जनसंख्या की आयु संरचना बदलती है, वृद्ध आबादी का अनुपात बढ़ सकता है। इसलिए भारत के लिए यह आवश्यक है कि युवा आबादी के उपलब्ध अवसर का प्रभावी उपयोग समय रहते किया जाए।
भारत की युवा आबादी देश के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। यदि युवाओं को अच्छी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, उपयोगी कौशल और सम्मानजनक रोजगार मिलता है, तो वे भारत की आर्थिक प्रगति के सबसे महत्वपूर्ण वाहक बन सकते हैं। लेकिन यदि शिक्षा और रोजगार के बीच अंतर बना रहता है, तो यही जनसांख्यिकीय अवसर अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएगा।
भारत के सामने वास्तविक लक्ष्य केवल युवा भारत बनना नहीं, बल्कि कुशल, रोजगारयुक्त और उत्पादक युवा भारत बनाना होना चाहिए। जनसांख्यिकीय लाभांश तभी वास्तविक आर्थिक लाभांश बनेगा, जब देश अपने युवाओं की संख्या को उनकी क्षमता और उत्पादकता में बदलने में सफल होगा। यही भारत की युवा शक्ति की वास्तविक आर्थिक परीक्षा है।







