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हनुमानगढ़ जिले की आठों शहरी निकायों में बोर्ड बन गए हैं। सभापति और अध्यक्ष चुन लिए गए हैं। अब चुनाव खत्म हो चुका है। लेकिन चुनाव ने कई सवाल छोड़ दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जनादेश का मतलब क्या है?
290 सीटों के चुनाव में भाजपा को 64 सीटें मिलीं। कांग्रेस के खाते में 91 सीटें आईं। निर्दलीयों ने 134 सीटें जीत लीं। यानी सबसे बड़ा समूह निर्दलीयों का रहा। यही निर्दलीय कई जगह सत्ता की चाबी बन गए।
भाजपा ने भादरा, नोहर, पीलीबंगा और गोलूवाला में बोर्ड बना लिया। कांग्रेस ने संगरिया, टिब्बी और रावतसर में अपना बोर्ड बना लिया। हनुमानगढ़ में निर्दलीयों ने दोनों बड़े दलों को किनारे कर अपना बोर्ड बना लिया।
यहीं से निकाय चुनाव का असली खेल समझ में आता है। लोकतंत्र में संख्या महत्वपूर्ण है। लेकिन संख्या अकेले काफी नहीं होती। बहुमत जुटाना भी पड़ता है। और यही वजह है कि नोहर और संगरिया के नतीजे खासे दिलचस्प हैं। नोहर में भाजपा को सिर्फ दो सीटें मिलीं। फिर भी बोर्ड भाजपा का बन गया। कांग्रेस ने 20 सीटें जीतीं। फिर भी वह बोर्ड नहीं बना सकी। संगरिया में कांग्रेस को महज आठ सीटें मिलीं। फिर भी उसने बोर्ड बना लिया। यानी चुनाव के बाद की राजनीति ने चुनावी नतीजों की तस्वीर ही बदल दी। इसे लोकतंत्र का गणित कहें या सत्ता का समीकरण। लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जाएगा कि जनता ने किसे चुना और बोर्ड किसका बना?
निर्दलीयों की भूमिका ने इस सवाल को और महत्वपूर्ण बना दिया है। 134 निर्दलीय पार्षदों ने साबित किया कि बड़े दलों के बीच भी स्थानीय राजनीति की अपनी ताकत होती है। कई जगह उन्होंने तय किया कि सत्ता किसके हाथ जाएगी।
हनुमानगढ़ नगरपरिषद का घटनाक्रम तो और भी ज्यादा महत्वपूर्ण रहा।
यहां निर्दलीयों ने अपना बोर्ड बनाने का फैसला किया। इसके बाद राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गईं। विधायक गणेशराज बंसल के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। उनकी गिरफ्तारी हुई। उनके समर्थकों के खिलाफ भी कार्रवाई हुई। इन घटनाओं को लेकर आरोप-प्रत्यारोप हुए। एक पक्ष ने इसे राजनीतिक दबाव से जोड़कर देखा। दूसरी तरफ कानून-व्यवस्था और कानूनी कार्रवाई का पक्ष सामने रखा गया।
लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता।
अगर निर्वाचित पार्षदों को मतदान से पहले डर का अहसास होने लगे तो लोकतंत्र की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यही वजह रही कि सभापति पद की प्रत्याशी मंजू रणवां को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अदालत से राहत मिली। फिर भी तनाव कम नहीं हुआ।
माकपा ने इस पूरे मामले में निर्दलीय पार्षदों के समर्थन में जनता से अपील की। लोगों ने सड़क पर उतरकर पार्षदों को नगरपरिषद कार्यालय तक पहुंचाया। यह दृश्य सामान्य नहीं था। नगरपरिषद का चुनाव आम तौर पर सड़क पर शक्ति प्रदर्शन का विषय नहीं बनता। यहां ऐसा हुआ। सवाल सिर्फ सभापति चुनने का नहीं रह गया। सवाल यह भी बन गया कि चुने हुए पार्षद अपनी पसंद से वोट कर पाएंगे या नहीं।
आखिरकार बोर्ड बन गया। सभापति भी चुन ली गईं। अब असली परीक्षा शुरू है।
राजनीति में चुनाव जीतना एक बात है। बोर्ड चलाना दूसरी। और पांच साल तक शहर का कामकाज चलाना उससे भी बड़ी चुनौती है। हनुमानगढ़ नगरपरिषद में आने वाले दिनों में राजनीतिक खींचतान की गुंजाइश से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन जनता के लिए असली सवाल यह नहीं है कि कौन किसके साथ है। सवाल यह है कि शहर के साथ कौन खड़ा है। सड़कें बनेंगी या नहीं। सफाई होगी या नहीं। पानी की समस्या दूर होगी या नहीं। स्ट्रीट लाइटें जलेंगी या नहीं। विकास के काम समय पर होंगे या नहीं। इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक समझौते से नहीं मिलेगा। काम से मिलेगा।
यह भी ध्यान रखना होगा कि सरकार और स्थानीय निकाय के बीच तालमेल विकास के लिए जरूरी है। लेकिन तालमेल और राजनीतिक दबाव में फर्क होता है। लोकतंत्र में सत्ता का इस्तेमाल कानून और संस्थाओं के दायरे में होना चाहिए। यही उसकी बुनियादी कसौटी है।
हनुमानगढ़ का घटनाक्रम इस मायने में एक सबक जरूर देता है। स्थानीय चुनाव को सिर्फ छोटी राजनीति समझना भूल होगी। यहां भी जनादेश है। यहां भी सत्ता के समीकरण हैं। और यहां भी जनता अपनी भूमिका निभा सकती है। लेकिन जनता की ताकत सिर्फ सड़क पर उतरने में नहीं है। उसकी सबसे बड़ी ताकत वोट है। और वोट के बाद उसकी नजर अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के काम पर होनी चाहिए। अब बहाने ज्यादा नहीं चलेंगे।
चुनाव हो गया। बोर्ड बन गया। सभापति चुन ली गईं। अब देखना यह है कि हनुमानगढ़ की नगरपरिषद राजनीतिक अखाड़ा बनती है या शहर के काम की जगह। जनता ने अपना फैसला सुना दिया है। अब प्रतिनिधियों की बारी है।
क्योंकि आखिरकार लोकतंत्र में असली सवाल यह नहीं कि बोर्ड किसका है।
असली सवाल यह है कि बोर्ड शहर के लिए क्या करता है।







