




डॉ. अर्चना गोदारा
जब हम सन् 2000 से पहले के जीवन को याद करते हैं तो दोस्ती के लिए किसी विशेष व्यवस्था की जरूरत नहीं पड़ती थी। मोहल्ले में रहने वाला बच्चा दोस्त था, विद्यालय की बेंच पर साथ बैठने वाला दोस्त था और शाम को घर के बाहर खेलने वाला भी। किसी के घर जाना हो तो दूरभाष करके समय लेने की आवश्यकता नहीं थी। गर्मियों की शामें छतों पर, सर्दियों की धूप आंगन में और छुट्टियां रिश्तेदारों के घर बीत जाती थीं। उस समय मनुष्य के सामाजिक संबंध उसके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थे।
धीरे-धीरे शहर बदलने लगे, परिवार छोटे होते गए, रोजगार के लिए पलायन बढ़ा और जीवन की गति तेज होती गई। मोबाइल फोन और सामाजिक माध्यमों ने संपर्क आसान किया, लेकिन संपर्क और आत्मीयता एक ही चीज नहीं हैं। आज किसी व्यक्ति के दूरभाष में सैकड़ों नंबर और सामाजिक माध्यमों पर हजारों संपर्क हो सकते हैं, फिर भी उसके पास ऐसा कोई व्यक्ति न हो जिसके सामने वह बिना किसी भूमिका के अपने मन की बात कह सके।
यह बदलाव केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। हमारे छोटे शहरों और कस्बों में भी इसके संकेत रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देने लगे हैं। कुछ दशक पहले किसी घर में शादी होती थी तो मोहल्ले की महिलाएं और लड़कियां अपने आप गीत गाने पहुंच जाती थीं। किसी को बुलाने के लिए औपचारिक निमंत्रण की भी जरूरत नहीं होती थी। शादी के कई दिन पहले से घर में चहल-पहल शुरू हो जाती थी। पड़ोस की महिलाएं मिलकर गीत गातीं, रिश्तेदारों के साथ काम बांटतीं और पूरे समारोह को अपना ही आयोजन समझती थीं।
अब कई जगह यही सामूहिकता धीरे-धीरे आयोजन की सेवाओं में बदल रही है। शादी में गीत गाने के लिए संगीत मंडली बुलाई जाती है, मेहमानों के स्वागत से लेकर कार्यक्रम के संचालन तक के लिए अलग-अलग लोग उपलब्ध हैं। यह बदलाव अपने आप में बुरा नहीं है, क्योंकि बदलती जीवन-शैली के साथ सुविधाएं भी बढ़ी हैं। लेकिन इसके भीतर एक महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन जरूर छिपा है। जिस काम को कभी समुदाय मिलकर करता था, उसके लिए अब सेवा खरीदी जाने लगी है। यही बात दोस्ती के बदलते स्वरूप को समझने में भी मदद करती है।
इसी बदलती सामाजिक परिस्थिति से दुनिया में एक अजीब, लेकिन वास्तविक सेवा सामने आई है, जिसे ‘किराए पर दोस्त’ या ‘भुगतान के बदले साथ’ कहा जा सकता है। सुनने में यह विचार विचित्र लगता है कि दोस्त भी किराए पर मिल सकता है, लेकिन जापान में इसका वास्तविक उदाहरण एक दशक से अधिक पुराना है। टकानोबु निशिमोतो ने ‘ओसान रेंटल’ नाम से ऐसी सेवा शुरू की, जिसमें मध्यम आयु के पुरुषों को बातचीत और साथ के लिए उपलब्ध कराया जाता था। वर्ष 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार, उनके समूह में लगभग 60 पुरुष थे और निशिमोतो स्वयं हर महीने लगभग 30 से 40 ग्राहकों से मिलते थे।
ग्राहकों में ऐसे लोग भी थे जिन्हें केवल किसी के साथ बातचीत करनी थी। अस्सी वर्ष से अधिक उम्र की एक महिला उन्हें नियमित रूप से पार्क में टहलने के लिए बुलाती थी। इस उदाहरण की सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि किसी ने दोस्त किराए पर लिया, बल्कि यह है कि लोग किसी अजनबी से बात करने के लिए पैसे देने को तैयार क्यों हुए।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसका एक कारण यह हो सकता है कि परिचित संबंधों में व्यक्ति अनेक सामाजिक भूमिकाओं से बंधा होता है। परिवार के सामने वह माता-पिता या संतान है, बच्चों के सामने अभिभावक है, कार्यस्थल पर कर्मचारी या अधिकारी है और मित्रों के सामने भी उसके संबंधों का एक लंबा इतिहास होता है। अजनबी के सामने इन भूमिकाओं का दबाव कुछ कम हो सकता है। वहां व्यक्ति अपने मन की वह बात कह सकता है जिसे वह अपने परिचितों से कहने में संकोच करता है।
उसे यह डर भी कम होता है कि सामने वाला नाराज होगा, पुराने विवादों को याद करेगा या उसकी कही बात का भविष्य में किसी तरह इस्तेमाल करेगा। इसीलिए कई बार मनुष्य को सलाह देने वाले से अधिक केवल सुनने वाले की जरूरत होती है। यहां भुगतान के बदले साथ देने वाली सेवा एक सुविधा के रूप में सामने आती है।
भारत में भी यह विचार अब पूरी तरह काल्पनिक नहीं रह गया है। मुंबई स्थित एक साथ देने वाली सेवा कॉफी पर मिलने, बातचीत करने और साथ घूमने के लिए 699 रुपये प्रति घंटे की दर सूचीबद्ध करती है। इसी सेवा में सामाजिक कार्यक्रम में साथ जाने और अस्पताल में साथ रहने जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। भारत में यह अभी कोई व्यापक सामाजिक चलन नहीं है, लेकिन ऐसी सेवाओं का अस्तित्व बदलती सामाजिक जरूरतों की ओर संकेत जरूर करता है।
जुलाई 2026 में प्रकाशित एक राष्ट्रव्यापी अध्ययन में 24 राज्यों के 4,500 से अधिक 15 से 29 वर्ष की आयु वाले युवाओं को शामिल किया गया। अध्ययन में लगभग 75 प्रतिशत युवाओं ने दोस्तों के बीच रहते हुए भी अकेलापन महसूस करने की बात कही। लगभग 80 प्रतिशत युवाओं ने भावनात्मक परेशानी के समय परिवार की अपेक्षा दोस्तों की ओर पहले जाने की बात कही। यह आंकड़ा बताता है कि नई पीढ़ी के लिए दोस्ती आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ जुड़ी भावनात्मक अपेक्षाएं और सामाजिक परिस्थितियां बदल रही हैं।
आज के बच्चों और युवाओं में इसका एक दूसरा रूप भी दिखाई देता है। वे एक-दूसरे से लगातार जुड़े हुए हैं, लेकिन बातचीत का बड़ा हिस्सा पर्दे पर स्थानांतरित हो गया है। साथ बैठना, बिना किसी उद्देश्य के घंटों बातें करना, पड़ोस में घूमना या किसी दोस्त के घर अचानक पहुंच जाना जैसी सहज सामाजिक आदतें कई जगह कम हुई हैं।
यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरी नई पीढ़ी संवेदनहीन हो रही है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि उसके सामाजिक अनुभवों का माध्यम बदल रहा है। आभासी संपर्क बढ़ने के साथ प्रत्यक्ष संबंधों के लिए समय निकालना कठिन हुआ है और यही अंतर कई बार अकेलेपन को जन्म देता है।
यह स्थिति हमें हिंदी साहित्य और सिनेमा में दिखाई गई दोस्ती भी याद दिलाती है। कृष्ण और सुदामा की मित्रता में कोई मूल्य तय नहीं था। प्रेमचंद की ‘पंच परमेश्वर’ में मित्रता केवल साथ बैठने का नाम नहीं, बल्कि संबंध और उत्तरदायित्व का आधार है। सिनेमा में ‘शोले’ की जय-वीरू की दोस्ती हो या ‘दिल चाहता है’ और ‘थ्री इडियट्स’ की मित्रता, दोस्ती जीवन की कठिनाइयों में सहारा देने वाली सामाजिक शक्ति के रूप में सामने आती है।
फर्क यह है कि आज मनुष्य के पास संपर्क अधिक हैं, लेकिन संबंधों के लिए समय और सहज अवसर कम होते जा रहे हैं।
इसलिए ‘किराए की दोस्ती’ को केवल बाजार की विचित्रता मानना ठीक नहीं होगा। यह बदलते समाज का आईना है। बाजार ने शायद अकेलापन पैदा नहीं किया, लेकिन उसने अकेलेपन के भीतर एक जरूरत और उस जरूरत के भीतर एक व्यवसाय जरूर खोज लिया है।
शादी में गीत गाने वाली मंडली हो, किसी कार्यक्रम में साथ चलने वाला भुगतान प्राप्त साथी हो या अस्पताल में मरीज के साथ रहने के लिए उपलब्ध व्यक्तिकृये सभी उदाहरण एक ही बड़े सामाजिक बदलाव की ओर संकेत करते हैं। हमारे जीवन से वे सामुदायिक भूमिकाएं धीरे-धीरे कम हो रही हैं, जिन्हें कभी परिवार, पड़ोस और मित्र अपने आप निभा लिया करते थे।
सवाल यह नहीं है कि किसी व्यक्ति ने कुछ घंटे का साथ खरीद लिया। बड़ा सवाल यह है कि जिस समाज में कभी पड़ोसी का दरवाजा बिना झिझक खुल जाता था, दोस्त बिना बुलाए आ जाता था और दुख में लोग अपने आप पहुंच जाते थे, वहां अब किसी के साथ बैठने के लिए भी भुगतान करने की जरूरत क्यों पड़ने लगी है?
शायद भविष्य में सबसे मूल्यवान चीज कोई डिजिटल सुविधा या महंगी सेवा नहीं होगी, बल्कि वह मनुष्य होगा जो आपके पास बिना किसी शुल्क, बिना किसी समय-सीमा और बिना किसी स्वार्थ के बैठ सके।
समय नहीं, भावनाएं भाग रही हैं,
आधुनिकता के इस दौर में
कहीं भीतर से मानवता भी भाग रही है।
वक्त रहते संभल जाएं तो अच्छा है,
वरना एक दिन ऐसा आएगा
जब मनुष्य को मनुष्य की नहीं,
मशीन की जरूरत होगी।








