




भटनेर पोस्ट डेस्क
भारतीय फिल्म संगीत में कुछ आवाज़ें केवल सुनाई नहीं देतीं, वे महसूस होती हैं। मोहम्मद रफी की आवाज़ ऐसी ही विरल धरोहर है। किसी गीतकार की कल्पना को स्वर, लय और भाव के माध्यम से श्रोताओं के हृदय तक पहुँचाना एक पार्श्वगायक की सबसे बड़ी कसौटी होती है। रफी साहब ने इसे केवल निभाया ही नहीं, बल्कि ऐसी ऊँचाई दी कि उनके गाए गीत आज भी भावों की जीवित धरोहर बनकर सुनाई देते हैं।
‘आज पुरानी राहों से कोई हमें आवाज़ न दे’ गीत में विरक्ति और आत्मसंयम का भाव है। यहाँ रफी की गायकी में लो-डायनेमिक कंट्रोल और मंद्र से मध्य सप्तक तक का सहज प्रवाह श्रोता को बीते समय की कसक से जोड़ देता है। वहीं ‘मेरा तो जो भी कदम है, वो तेरी राहों में’ समर्पण का गीत है, जिसमें उनकी आवाज़ का लेगाटो फ्रेज़िंग प्रेम की निरंतरता को संगीतात्मक रूप देती है।

‘कोई सागर दिल को बहलाता नहीं’ सुनते समय स्पष्ट होता है कि रफी केवल सुर नहीं गाते थे, वे शब्दों के भीतर छिपी रिक्तता को भी स्वर देते थे। उनकी वॉइस मॉड्यूलेशन और नियंत्रित कंपन गीत की उदासी को कभी कृत्रिम नहीं बनने देते। दूसरी ओर ‘नफरत की दुनिया को छोड़ के प्यार की दुनिया में’ में उनका स्वर आशावाद का प्रतीक बन जाता है। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे गीत के भावानुसार अपनी आवाज़ का रंग बदल लेते थे।
‘क्या हुआ तेरा वादा’ में शिकायत है, लेकिन कटुता नहीं। रफी ने इसमें डायनेमिक एक्सप्रेशन का अद्भुत संतुलन रखा है। ऊँचे स्वरों पर भी उनकी आवाज़ में आक्रोश नहीं, बल्कि टूटे हुए विश्वास की पीड़ा सुनाई देती है। इसी प्रकार ‘बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है’ में उनकी गायकी उत्सवधर्मिता का उत्कृष्ट उदाहरण है। खुला गला, सशक्त उच्चारण और चमकदार टोन इस गीत को आज भी विवाह और उत्सवों का स्थायी हिस्सा बनाए हुए हैं।

‘चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे’ और ‘दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर’ दोनों गीत प्रेम की अलग-अलग अवस्थाओं का संगीतात्मक चित्रण हैं। पहले गीत में निष्ठा और जीवनपर्यंत साथ निभाने का वादा है, जबकि दूसरे में स्मृतियों का कोमल संसार। दोनों में रफी की ब्रीथ कंट्रोल और शब्दों की स्पष्ट अभिव्यक्ति यह सिद्ध करती है कि वे हर अक्षर को भाव के साथ गाते थे।
‘इशारों इशारों में दिल लेने वाले’ जैसे चुलबुले गीत में उनकी आवाज़ की चंचलता देखते ही बनती है। यहाँ रिदमिक सिंक्रोनाइजेशन और हल्की मुस्कान लिए गायन शैली गीत को संवाद जैसा बना देती है। इसके विपरीत ‘खुश रहे तू सदा, ये दुआ है मेरी’ त्याग और निस्वार्थ प्रेम का गीत है। इसमें उनकी गायकी करुण रस को बिना अतिनाटकीय हुए अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है।

‘दिन ढल जाए, हाय रात न जाए’ को हिंदी फिल्म संगीत में विरह गायन का मानदंड माना जाता है। इस गीत में रफी का इमोशनल टिंबर, नियंत्रित आलाप और सूक्ष्म स्वर-उतार-चढ़ाव श्रोता के भीतर अकेलेपन की अनुभूति जगा देते हैं। वहीं ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया’ जीवन-दर्शन का गीत है। इसमें उनकी सहज, मुक्त और आत्मविश्वासी प्रस्तुति बताती है कि गायकी केवल तकनीक नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का विस्तार भी होती है।

‘जो वादा किया, वो निभाना पड़ेगा’, ‘तुझको पुकारे मेरा प्यार’ और ‘तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे’ जैसे गीतों में प्रेम, प्रतीक्षा, विश्वास और स्मृति के अलग-अलग रंग दिखाई देते हैं। इन सभी गीतों में एक समान तत्व है, रफी की आवाज़ कभी गीतकार के शब्दों पर हावी नहीं होती, बल्कि उन्हें और अधिक प्रभावशाली बना देती है। यही एक महान पार्श्वगायक की पहचान है।
आज, उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल एक महान गायक को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस संगीत परंपरा को नमन करना है जिसमें गायन का उद्देश्य अपनी कला का प्रदर्शन नहीं, बल्कि गीतकार के भाव, संगीतकार की धुन और श्रोता के हृदय के बीच एक अदृश्य सेतु बनना था। मोहम्मद रफी ने अपनी अनुपम स्वर-साधना से यह सेतु इतने मजबूत ढंग से बनाया कि समय बदल गया, पीढ़ियाँ बदल गईं, लेकिन उनके गीतों के भाव आज भी उतने ही ताज़ा, सजीव और स्पंदित हैं, जितने अपने सृजन के समय थे।





