




डॉ. एमपी शर्मा
हर साल परीक्षा परिणाम के साथ लाखों घरों में खुशियों की गूंज सुनाई देती है, लेकिन कुछ घर ऐसे भी होते हैं, जहां सन्नाटा हमेशा के लिए बस जाता है। अपेक्षा से कम अंक आने या परीक्षा में असफल होने के कारण किसी विद्यार्थी के आत्महत्या करने की खबर केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं होती, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी होती है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कुछ अंकों के कारण किसी बच्चे का जीवन समाप्त हो जाना स्वीकार्य हो सकता है? उत्तर स्पष्ट है, कदापि नहीं। फिर भी हमारी शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक सोच और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने परीक्षा को जीवन-मरण का प्रश्न बना दिया है।
परीक्षा जीवन का अंतिम निर्णय नहीं, बल्कि सीखने की यात्रा का एक पड़ाव है। कोई भी परीक्षा किसी बच्चे की बुद्धिमत्ता, संवेदनशीलता, रचनात्मकता, नेतृत्व क्षमता या मानवीय गुणों का पूरा आकलन नहीं कर सकती। इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहां महान वैज्ञानिकों, खिलाड़ियों, साहित्यकारों और उद्योगपतियों ने शुरुआती असफलताओं के बावजूद असाधारण सफलता हासिल की।

समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब माता-पिता अनजाने में अपने प्रेम को अंकों और उपलब्धियों से जोड़ देते हैं। बार-बार तुलना करना, अधिक अंक लाने का दबाव बनाना या दूसरे बच्चों का उदाहरण देना बच्चों के आत्मविश्वास को कमजोर कर देता है। हर माता-पिता को अपने बच्चे से यह अवश्य कहना चाहिए कि उसका जीवन किसी भी परीक्षा परिणाम से अधिक मूल्यवान है और हर परिस्थिति में परिवार उसके साथ खड़ा रहेगा।

हर बच्चे की रुचि और क्षमता अलग होती है। सभी चिकित्सक, अभियंता या प्रशासनिक अधिकारी नहीं बन सकते और न ही बनना चाहिए। किसी की प्रतिभा खेल में है, किसी की संगीत में, किसी की लेखन, कला, विज्ञान या व्यापार में। जब बच्चों पर अभिभावकों की अधूरी महत्वाकांक्षाएं थोपी जाती हैं, तब वे अपनी वास्तविक पहचान खोने लगते हैं।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बढ़ता तंत्र भी मानसिक दबाव बढ़ा रहा है। श्रेष्ठ विद्यार्थियों के प्रचार और चयन की होड़ के बीच हजारों ऐसे विद्यार्थी होते हैं, जिनका चयन नहीं हो पाता। इसका अर्थ यह नहीं कि वे असफल हैं। इसलिए तैयारी कराने वाले संस्थानों की जिम्मेदारी केवल परिणाम देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, नियमित परामर्श और तनाव प्रबंधन पर भी समान ध्यान देना चाहिए।

विद्यालय भी केवल शिक्षा देने के केंद्र नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण के संस्थान हैं। यदि कोई विद्यार्थी अचानक उदास रहने लगे, पढ़ाई से दूरी बनाने लगे या स्वयं को निरर्थक समझने लगे, तो इसे अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य का संकेत समझना चाहिए। जीवन कौशल, भावनात्मक शिक्षा और आत्मविश्वास विकसित करने वाली गतिविधियां प्रत्येक विद्यालय का अनिवार्य हिस्सा बननी चाहिए।
समाज की सोच में बदलाव भी उतना ही आवश्यक है। आज बच्चों से सबसे पहले उनके प्रतिशत और रैंक के बारे में पूछा जाता है, लेकिन बहुत कम लोग यह जानना चाहते हैं कि वे मानसिक रूप से कैसे हैं। जब तक सफलता की परिभाषा केवल अंकों तक सीमित रहेगी, तब तक बच्चों पर अनावश्यक दबाव बना रहेगा।

यदि कोई बच्चा निराशा व्यक्त करे, स्वयं को बोझ बताए या जीवन से हार मानने जैसी बातें करे, तो उसकी बात को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उसे धैर्य से सुनना, भावनात्मक सहारा देना और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञ की सहायता लेना अत्यंत आवश्यक है।
बच्चों को यह समझाना होगा कि असफलता केवल एक घटना है, पहचान नहीं। परिवार, विद्यालय, सरकार, शिक्षण संस्थान, समाचार माध्यम और समाजकृसभी की साझा जिम्मेदारी है कि ऐसा वातावरण तैयार करें, जहां बच्चे अंकों से नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व, प्रयास और मानवीय गुणों से पहचाने जाएं। आखिर जीवन किसी भी परीक्षा से कहीं अधिक मूल्यवान है।
-लेखक सीनियर सर्जन, आईएमए के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष व एसएलजी हॉस्पिटल हनुमानगढ़ टाउन से संबद्ध हैं






